डोप टेस्ट से खुलते हैं कई राज... कैसे पता चलता है पायलट ने किया है नशा?

एअर इंडिया के पायलट के डोप टेस्ट ने सवाल उठाए हैं कि आखिर शरीर में नशे का पता कैसे चलता है? कितने तरह की जांच होती है, सैंपल कैसे लिया जाता है. टेस्ट पॉजिटिव आने पर क्या होता है?

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कॉमर्शियल पायलट विमान के कॉकपिट में एयर मास्क पहने हुए. (Photo: Representative/Getty) कॉमर्शियल पायलट विमान के कॉकपिट में एयर मास्क पहने हुए. (Photo: Representative/Getty)

आजतक साइंस डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 14 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 12:58 PM IST

एअर इंडिया की फुकेट-दिल्ली फ्लाइट के कैप्टन के ड्रग टेस्ट में मारिजुआना पॉजिटिव पाए जाने के बाद एअरलाइन ने अपने सभी पायलटों की ड्रग जांच कराने का फैसला किया है. यह जांच मौजूदा नियमों से आगे बढ़कर की जा रही है. डीजीसीए के नियमों में पायलटों और फ्लाइट क्रू की ड्रग और नशे से जुड़ी जांच का प्रावधान पहले से है.

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इस मामले के बाद सवाल है कि आखिर पायलट का डोप टेस्ट होता क्या है? इसमें क्या जांच होती है, सैंपल कैसे लिया जाता है और टेस्ट पॉजिटिव आने पर क्या होता है? सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि पायलट की अल्कोहल और ड्रग्स की जांच अलग-अलग होती है.

दो तरह की जांच होती है

पायलट की नशे से जुड़ी जांच को आसान भाषा में दो हिस्सों में समझ सकते हैं...

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  • पहली है अल्कोहल टेस्टिंग. इसके लिए ब्रेथ एनालाइजर का इस्तेमाल होता है. पायलट इसमें सांस छोड़ता है. मशीन से पता चलता है कि शरीर में शराब है या नहीं.
  • दूसरी है ड्रग टेस्टिंग. इसमें यह देखा जाता है कि पायलट ने कोई ऐसा ड्रग या नशीला पदार्थ तो नहीं लिया है, जो उड़ान के दौरान उसकी अलर्टनेस और फैसला लेने की क्षमता पर असर डाल सकता है.

डीजीसीए ने इसके लिए अलग रूल्स बनाए हैं. इसे सीएआर सेक्शन 5, सीरीज एफ, पार्ट 5 के तहत रखा गया है. इसमें एविएशन पर्सनल में साइकोएक्टिव सब्सटेंसेज के इस्तेमाल का पता लगाने की प्रक्रिया बताई गई है.

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कैसे होती है ड्रग टेस्टिंग, क्या यूरिन सैंपल भी लेते हैं?

पायलट के ड्रग टेस्ट में यूरिन सैंपल लिया जाता है. इस सैंपल को दो अलग कंटेनर में रखा जाता है. पहले सैंपल की तुरंत स्क्रीनिंग की जाती है. अगर इसमें किसी साइकोएक्टिव सब्सटेंस के होने का संकेत मिलता है, तो रिजल्ट को नॉन-निगेटिव माना जाता है. ऐसे में कन्फर्मेशन होने तक पायलट को उड़ान ड्यूटी से हटा दिया जाता है. 

इसके बाद दूसरे सैंपल को तय लैब में भेजकर कन्फर्मेटरी टेस्ट किया जाता है. इसमें जीसी/एमएस और एलसी-एमएस जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है. अगर यह टेस्ट भी पॉजिटिव आता है, तो मेडिकल रिव्यू ऑफिसर यह जांचता है कि रिजल्ट किसी वैध दवा के इस्तेमाल की वजह से तो नहीं आया.

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डीजीसीए का क्या रूल है?

डीजीसीए के रूल्स के तहत फ्लाइट क्रू का कम से कम 10 फीसदी का हर साल रैंडम ड्रग टेस्ट किया जाना है. इसका मतलब यह नहीं है कि हर पायलट का हर फ्लाइट से पहले ड्रग टेस्ट होता है.

एअर इंडिया ने इस मामले के बाद इससे आगे बढ़कर अपने और एअर इंडिया एक्सप्रेस के सभी पायलटों की ड्रग टेस्टिंग कराने का फैसला किया है. यह एक बार की बड़ी स्क्रीनिंग है.

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टेस्ट पॉजिटिव आए तो क्या होता है?

इनिशियल स्क्रीनिंग पॉजिटिव आने का मतलब तुरंत फाइनल कन्फर्मेशन नहीं होता. ऐसे मामले में सैंपल की कन्फर्मेटरी टेस्टिंग की जाती है. अगर इसमें भी ड्रग की पुष्टि होती है, तो एअरलाइन और डीजीसीए के रूल्स के मुताबिक आगे का एक्शन होता है. एअर इंडिया के मामले में भी पहले इनिशियल स्क्रीनिंग हुई और फिर कन्फर्मेटरी टेस्ट किया गया. इसमें कैप्टन का टेस्ट मारिजुआना के लिए पॉजिटिव पाया गया.

क्यों जरूरी है डोप टेस्ट?

पायलट सीधे एयरक्राफ्ट और पैसेंजर्स की सेफ्टी से जुड़ा होता है. ऐसे में यह जरूरी है कि वह ड्यूटी के दौरान किसी ड्रग या नशीले पदार्थ के असर में न हो.

इसी वजह से डीजीसीए ने पायलटों और दूसरे एविएशन पर्सनल के लिए ड्रग और अल्कोहल टेस्टिंग के रूल्स बनाए हैं. इसका मकसद साफ है पायलट पूरी तरह सेफ और अलर्ट हालत में ही एअरक्राफ्ट उड़ाए.   रिपोर्टः साक्षी प्रजापति

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