वैज्ञानिक डॉ. रॉबर्ट लैंजा की किताब 'बायोसेंट्रिज्म: हाउ लाइफ एंड कॉन्शसनेस आर द कीज टू अंडरस्टैंडिंग द नेचर ऑफ द यूनिवर्स' ने इंटरनेट पर काफी चर्चा पैदा की है. इसमें दावा किया गया है कि शरीर की मौत के साथ जीवन खत्म नहीं होता और चेतना हमेशा बनी रह सकती है. यानी कुछ लोग इसे आत्मा भी कहते हैं. लैंजा के अनुसार चेतना ब्रह्मांड की मूलभूत चीज है. भौतिक ब्रह्मांड चेतना से पैदा होता है, न कि उलटा. यह सिद्धांत वैज्ञानिक समुदाय में विवादास्पद है क्योंकि यह मुख्यधारा की भौतिकी से अलग खड़ा है.
डॉ. रॉबर्ट लैंजा चिकित्सा के विशेषज्ञ हैं. पहले स्टेम सेल तथा लुप्तप्राय प्रजातियों की क्लोनिंग पर काम कर चुके हैं. बाद में उन्होंने भौतिकी, क्वांटम यांत्रिकी और एस्ट्रोफिजिक्स की ओर रुख किया. उनके बायोसेंट्रिज्म सिद्धांत के अनुसार जीवन और चेतना ब्रह्मांड की नींव हैं. ब्रह्मांड के नियम और स्थिर जीवन के अनुकूल दिखते हैं, जिससे लगता है कि बुद्धिमत्ता पदार्थ से पहले मौजूद थी.
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लैंजा कहते हैं कि स्थान और समय वस्तुएं नहीं बल्कि हमारी समझ के औजार हैं. हम इन्हें कछुए के खोल की तरह साथ लेकर चलते हैं. जब शरीर (खोल) खत्म होता है तो भी चेतना बनी रहती है. अगर शरीर चेतना पैदा करता है तो मौत के साथ सब खत्म हो जाना चाहिए. लेकिन अगर शरीर केवल रिसीवर की तरह चेतना ग्रहण करता है, जैसे केबल बॉक्स सैटेलाइट सिग्नल लेता है, तो चेतना शरीर की मौत से प्रभावित नहीं होती. यह समय और स्थान की सीमाओं से परे है और गैर-स्थानीय है, ठीक वैसे ही जैसे क्वांटम वस्तुएं.
मल्टीवर्स और मौत के बाद की संभावना
सिद्धांत यह भी कहता है कि कई ब्रह्मांड एक साथ मौजूद हो सकते हैं. एक ब्रह्मांड में शरीर मर सकता है, लेकिन दूसरे में वह जीवित रहता है और चेतना वहां चली जाती है. इस तरह व्यक्ति सुरंग जैसी यात्रा के बाद नरक या स्वर्ग में नहीं बल्कि अपने जैसे ही किसी जीवित संसार में पहुंच जाता है. यह प्रक्रिया अनंत बार दोहराई जा सकती है.
यह विचार ह्यू एवरेट की मल्टीवर्स थ्योरी से जुड़ा है, जिसमें हर पल ब्रह्मांड अनगिनत समान प्रतियों में बंट जाता है. कुछ भौतिक विज्ञानी समानांतर दुनियाओं की संभावना मानते हैं क्योंकि कोई भौतिक नियम उन्हें मना नहीं करता. लैंजा का कहना है कि हमारी आत्माएं ब्रह्मांड के ताने-बाने से बनी हैं और शायद समय की शुरुआत से मौजूद हैं. दिमाग सिर्फ रिसीवर और एम्प्लिफायर का काम करता है.
क्वांटम चेतना और निकट-मृत्यु अनुभव
डॉ. स्टुअर्ट हैमेरोफ जैसे कुछ शोधकर्ताओं का भी जिक्र आता है. उनके अनुसार हृदय रुकने पर माइक्रोट्यूबुल्स में क्वांटम जानकारी नष्ट नहीं होती बल्कि ब्रह्मांड में फैल जाती है. अगर मरीज को बचा लिया जाए तो यह जानकारी वापस आ सकती है और निकट-मृत्यु अनुभव होता है. अगर नहीं बचाया गया तो यह जानकारी शरीर के बाहर बनी रह सकती है, शायद आत्मा के रूप में. लैंजा इसे दूसरे ब्रह्मांड से जोड़ते हैं.
यह व्याख्या निकट-मृत्यु अनुभव, शरीर से बाहर की यात्रा और पुनर्जन्म जैसी घटनाओं को धार्मिक आस्था के बिना समझाने की कोशिश करती है. चेतना की ऊर्जा किसी स्तर पर बनी रहती है और बाद में किसी दूसरे शरीर में जा सकती है.
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बायोसेंट्रिज्म रोचक और आशा देने वाला विचार है, लेकिन यह मुख्यधारा की विज्ञान में स्थापित नहीं है. क्वांटम यांत्रिकी में गैर-स्थानीयता और मल्टीवर्स व्याख्याएं मौजूद हैं, लेकिन वे चेतना के जीवित रहने या दूसरे ब्रह्मांड में जाने को साबित नहीं करतीं. ज्यादातर भौतिक विज्ञानी चेतना को मस्तिष्क की जैविक प्रक्रिया मानते हैं. कोई प्रत्यक्ष प्रयोग या सबूत नहीं है जो लैंजा के दावे की पुष्टि करे.
यह सिद्धांत दार्शनिक और स्पेकुलेटिव ज्यादा है. वैज्ञानिक पद्धति अनुभवजन्य सबूतों पर टिकी होती है, जबकि यहां व्याख्या और संभावनाओं पर जोर है. फिर भी यह चर्चा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह जीवन, मौत और ब्रह्मांड के बारे में गहरे सवाल उठाती है. लोग अमर होने की इच्छा रखते हैं, इसलिए ऐसे विचार लोकप्रिय हो जाते हैं.
लैंजा का सिद्धांत चेतना को ब्रह्मांड का केंद्र मानता है. मौत को सिर्फ शरीर का अंत बताता है. चाहे यह सही हो या नहीं, यह हमें याद दिलाता है कि विज्ञान अभी भी कई रहस्यों को पूरी तरह नहीं समझ पाया है. आगे के शोध ही तय करेंगे कि ये विचार कितने ठोस हैं.
आजतक साइंस डेस्क