Monsoon Returns: देशभर में होगी तगड़ी बारिश! सैटेलाइट तस्वीरों में दिख रहे बादल ही बादल

ISRO के INSAT-3DR सैटेलाइट इमेज में 19 जुलाई को भारत के दो-तिहाई हिस्से पर घने बादल छाए दिखे. मॉनसून एक्टिव दिख रहा है. जम्मू-कश्मीर से पूर्वोत्तर तक ठंडे तूफानी बादल छाए हैं. भारी बारिश की संभावना है.

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मॉनसूनी बादलों का घेरा पूरे देश के अधिकतर हिस्से में दिखाई दे रहा है. (Photo: IMD) मॉनसूनी बादलों का घेरा पूरे देश के अधिकतर हिस्से में दिखाई दे रहा है. (Photo: IMD)

आजतक साइंस डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 19 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 11:18 AM IST

19 जुलाई को ISRO के INSAT-3DR सैटेलाइट ने भारत के ऊपर एक बड़ा बदलाव दिखाया. पूरे देश के लगभग दो-तिहाई हिस्से पर घने बादल छाए हुए हैं. जम्मू-कश्मीर से लेकर गंगा के मैदान तक, बिहार, पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर राज्यों तक मॉनसून के बादल फैले हुए हैं. यह स्थिति बताती है कि मॉनसून अब पूरी तरह सक्रिय हो गया है. इन बादलों के कारण कई इलाकों में तेज बारिश, आंधी और भारी बारिश की संभावना बढ़ गई है. मौसम विभाग लगातार निगरानी कर रहा है. 

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ISRO के सैटेलाइट इमेज के विश्लेषण से पता चलता है कि भारत के लगभग 60 से 70 प्रतिशत भूभाग पर बादल छाए हुए हैं. यानी देश का करीब दो-तिहाई हिस्सा बादलों की चादर से ढका है. सबसे घने बादल उत्तरी मैदानों में हैं – पंजाब, उत्तर प्रदेश, बिहार से होते हुए पश्चिम बंगाल तक. पूर्वोत्तर राज्य भी पूरी तरह बादलों से घिरे हुए हैं. दक्षिणी प्रायद्वीप में अरब सागर से आने वाली नमी वाली हवाओं के कारण लंबी बादलों की पट्टियां दिख रही हैं.

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पश्चिमी राजस्थान और तमिलनाडु के कुछ हिस्से साफ हैं. यह आंकड़ा पूरे दिन बदलता रहता है क्योंकि बादल बनते-बिगड़ते रहते हैं. सुबह के इमेज में यह कवरेज ज्यादा दिख रहा था. INSAT-3DR के इंफ्रारेड इमेज में जम्मू-कश्मीर, गंगा के मैदान और पूर्वोत्तर में लाल और बैंगनी रंग के ठंडे और ऊंचे तूफानी बादल साफ दिख रहे हैं.

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सैटेलाइट बादलों को कैसे देखते हैं?

INSAT-3DR भारत का मौसम निगरानी सैटेलाइट है, जिसे इसरो ने बनाया है. यह भू-स्थिर कक्षा में 36,000 किलोमीटर ऊपर से लगातार भारत की निगरानी करता है. हर आधे घंटे में तस्वीरें लेता है. भारत मौसम विभाग (IMD) इन तस्वीरों का इस्तेमाल करके मौसम पूर्वानुमान तैयार करता है.

सैटेलाइट के दो मुख्य कैमरे हैं. पहला विजिबल चैनल, जो सूर्य की रोशनी से परावर्तित प्रकाश को पकड़ता है. जितने सफेद और चमकदार बादल दिखें, उतने ही मोटे होते हैं. दूसरा थर्मल इंफ्रारेड चैनल, जो रोशनी नहीं बल्कि गर्मी को मापता है. यह दिन-रात काम करता है. यह 10.8 माइक्रोमीटर फ्रिक्वेंसी पर काम करता है. बादल के ऊपरी सतह का तापमान बताता है.

क्लाउड टॉप ब्राइटनेस टेम्परेचर क्या बताता है?

क्लाउड टॉप ब्राइटनेस टेम्परेचर (CTBT) बादल की ऊपरी सतह का तापमान होता है, जो सैटेलाइट देखता है. यह जमीन पर महसूस होने वाला तापमान नहीं है. हवा जितनी ऊपर जाती है, उतनी ठंडी होती जाती है- हर किलोमीटर ऊंचाई पर करीब 6.5 डिग्री सेल्सियस तापमान गिरता है. 

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जितना ठंडा बादल का ऊपरी हिस्सा, उतना ही ऊंचा और खतरनाक बादल. माइनस 40 डिग्री सेल्सियस से नीचे के बादल गहरे तूफानी बादल होते हैं. माइनस 70 या उससे नीचे के बादल बहुत हिंसक तूफान का संकेत देते हैं, जो वायुमंडल के ऊपरी हिस्से तक पहुंच जाते हैं.

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19 जुलाई के इमेज में जम्मू-कश्मीर में माइनस 80 डिग्री सेल्सियस से भी ठंडे बादल दिखे. उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पूर्वोत्तर और दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में माइनस 50 से नीचे के बादल हैं.

क्या हर जगह बादल मतलब बारिश?

नहीं. बादलों से ढका दो-तिहाई हिस्सा हर जगह तेज बारिश नहीं ला रहा है. कुछ हल्के बादल या सामान्य मॉनसूनी बादल सिर्फ हल्की बूंदाबांदी कराते हैं. तेज और भारी बारिश सिर्फ सबसे गहरे तूफानी बादलों के नीचे होती है, जो पूरे देश के दसवें हिस्से से भी कम क्षेत्र में होते हैं. 

ये तूफान खुद को ऊर्जा देते हैं. जब पानी की वाष्प जमा होती है तो भारी मात्रा में गर्मी निकलती है, जो हवा को ऊपर की ओर धकेलती है. इससे बादल 15 किलोमीटर तक ऊंचे हो जाते हैं. मॉनसून ट्रफ उत्तरी भारत में सक्रिय होने से यह प्रक्रिया तेज हो गई है.

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मॉनसून की ट्रफ लाइन उत्तरी भारत में सक्रिय है, जिससे जम्मू-कश्मीर, हिमाचल, उत्तराखंड, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार और पूर्वोत्तर में भारी बारिश हो रही है. अरब सागर से नमी वाली हवाएं पश्चिमी तट और मध्य भारत को प्रभावित कर रही हैं. बंगाल की खाड़ी अभी शांत है, लेकिन बदलाव हो सकता है.

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अगले कुछ दिनों में इन इलाकों में भारी बारिश, आंधी और ओले पड़ने की संभावना है. निचले इलाकों में जलभराव, नदियों में उफान और पहाड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन का खतरा रहेगा. किसानों को फसलों की सुरक्षा करनी होगी. शहरों में ड्रेनेज सिस्टम पर दबाव बढ़ेगा.

INSAT-3DR जैसी सैटेलाइट टेक्नोलॉजी मौसम पूर्वानुमान को बेहद सटीक बनाती है. इससे पहले कई घटनाओं में समय पर चेतावनी देकर जान-माल का नुकसान कम किया जा सका है. इसरो के इन सैटेलाइट्स से IMD को रीयल टाइम डेटा मिलता है, जो किसानों, यात्रियों, राहत एजेंसियों और सरकार के लिए बेहद उपयोगी है. भविष्य में और एडवांस सैटेलाइट्स से और बेहतर भविष्यवाणी संभव होगी.

जलवायु परिवर्तन और मॉनसून

वैज्ञानिकों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण मॉनसून का पैटर्न बदल रहा है. कभी-कभी सूखा तो कभी अचानक भारी बारिश. ऐसे में सैटेलाइट निगरानी और सटीक पूर्वानुमान ज्यादा जरूरी हो गए हैं. आम नागरिकों को IMD की चेतावनियों का पालन करना चाहिए और अनावश्यक बाहर न निकलना चाहिए.

यह स्थिति पूरे देश को प्रभावित कर रही है. उत्तरी और पूर्वी भारत में बारिश से राहत मिली है, लेकिन नुकसान भी हो रहा है. दक्षिणी भागों में मॉनसून की प्रगति अच्छी है. कुल मिलाकर मॉनसून इस साल सामान्य से बेहतर दिख रहा है, लेकिन स्थानीय स्तर पर सतर्कता जरूरी है.

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