अल-नीनो का कहर... यूरोप में गर्मी से इस साल 50 हजार मौतें हुईं

यूरोप में बढ़ती भीषण गर्मी अब जानलेवा साबित हो रही है. 2026 की गर्मियों में 50 हजार से अधिक लोगों की मौत का अनुमान है, जिनमें करीब 32 हजार मौतें जलवायु परिवर्तन से जुड़ी हैं. विशेषज्ञों के मुताबिक, जीवाश्म ईंधन का बढ़ता इस्तेमाल तापमान को खतरनाक बना रहा है. बुजुर्गों के साथ युवाओं की जान पर भी गर्मी का खतरा बढ़ रहा है.

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यूरोप में जानलेवा हुई लू से बुजुर्गों पर सबसे ज्यादा खतरा (Photo: AP) यूरोप में जानलेवा हुई लू से बुजुर्गों पर सबसे ज्यादा खतरा (Photo: AP)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 24 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 11:51 AM IST

यूरोप में इस साल 2026 में गर्मियों के दौरान पड़ी रिकॉर्ड तोड़ गर्मी के कारण 50 हजार से अधिक लोगों की मौत हुई. एक नए अध्ययन के मुताबिक, इनमें से करीब 32,619 मौतों के लिए इंसानों की वजह से हो रहा जलवायु परिवर्तन जिम्मेदार है. कोयला, तेल और गैस जैसे जीवाश्म ईंधन जलाने से धरती का तापमान बढ़ रहा है, जिससे लू और भी अधिक जानलेवा हो रही है. 

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‘नेचर हेल्थ’ में प्रकाशित होने वाले इस अध्ययन में जून, जुलाई और अगस्त के दौरान यूरोप के 854 शहरों में गर्मी से हुई मौतों का विश्लेषण किया गया. शोधकर्ताओं के अनुसार, 2025 में यूरोप के 854 शहरों में गर्मी के कारण करीब 24,400 लोगों की मौत होने का अनुमान लगाया गया था. इनमें से लगभग 16,500 मौतों के लिए जलवायु परिवर्तन को जिम्मेदार माना गया. 

अध्ययन में इटली, फ्रांस, स्पेन और जर्मनी में सबसे अधिक मौतें दर्ज की गईं. शोधकर्ताओं का कहना है कि वास्तविक आंकड़ा इससे भी ज्यादा हो सकता है, क्योंकि अध्ययन में मई में पड़ी भीषण गर्मी को शामिल नहीं किया गया है. इसके अलावा, इसमें केवल 854 शहरों के आंकड़े लिए गए हैं, जहां यूरोप की करीब 40 प्रतिशत आबादी रहती है. इन मौसमी बदलावों के पीछे अल-नीनो भी एक वजह है. 

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इंपीरियल कॉलेज लंदन की जलवायु वैज्ञानिक और अध्ययन की मुख्य लेखिका क्लेयर बार्न्स ने कहा कि पश्चिमी और उत्तरी यूरोप के कई हिस्सों में इमारतें और बुनियादी ढांचा इतनी तेज गर्मी का सामना करने के लिए तैयार नहीं हैं. जलवायु परिवर्तन के कारण अब तापमान खतरनाक स्तर तक पहुंच रहा है. अध्ययन के अनुसार, 17 जून से 1 जुलाई के बीच करीब एक-तिहाई मौतें हुईं. 

बुजुर्गों पर इसका कितना खतरा?

इस दौरान तापमान सामान्य से 5.3 डिग्री सेल्सियस तक अधिक था. गर्मी से मरने वालों में आधे से ज्यादा लोग 85 वर्ष या उससे अधिक उम्र के थे. हालांकि, भीषण गर्मी ने 20 से 44 वर्ष की उम्र के 800 से अधिक लोगों की जान भी ले ली. शोधकर्ताओं ने कंप्यूटर मॉडल की मदद से यह अनुमान लगाया कि जलवायु परिवर्तन के बिना दुनिया का तापमान कितना होता और उससे कितनी मौतें होतीं. 

दोनों स्थितियों की तुलना करके जलवायु परिवर्तन से जुड़ी मौतों का आंकड़ा निकाला गया. विशेषज्ञों का कहना है कि जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल कम करना और गर्मी से बचाव के बेहतर इंतजाम करना जरूरी है. बढ़ते तापमान के कारण आने वाले वर्षों में गर्मी से होने वाली मौतों का खतरा और बढ़ सकता है.

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