Advertisement

साइंस न्यूज़

बर्फ नहीं, मार्बल... राजस्थान की ये सफेद 'जमीन' बनी टूरिस्ट स्पॉट, रोज डंप होता है 5500 टन कचरा

आजतक साइंस डेस्क
  • नई दिल्ली,
  • 20 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 8:46 AM IST
  • 1/8

राजस्थान के किशनगढ़ में मार्बल कचरे का एक बड़ा डंपिंग एरिया इन दिनों लोगों के लिए आकर्षण बन गया है. यहां जमा सफेद मार्बल स्लरी दूर से बर्फ से ढकी जमीन जैसी दिखती है. इसी वजह से टूरिस्ट, कपल्स और फिल्म बनाने वाले लोग यहां पहुंच रहे हैं. Photo: AFP

  • 2/8

करीब 82 एकड़ में फैले इस इलाके में रोज 5500 टन से ज्यादा मार्बल स्लरी जमा होती है. यह कचरा किशनगढ़ की 1200 से ज्यादा मार्बल यूनिट्स से आता है. सोशल मीडिया पर यहां की फोटो और वीडियो आने के बाद इस जगह की लोकप्रियता और बढ़ गई है. Photo: AFP

  • 3/8

लोग यहां सफेद जमीन के बीच फोटो और वीडियो बना रहे हैं. कपल्स प्री-वेडिंग फोटोशूट के लिए भी यहां पहुंचते हैं. फिल्म और म्यूजिक वीडियो बनाने वाले लोग भी इस जगह को शूटिंग के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं. Photo: AFP

Advertisement
  • 4/8

किशनगढ़ राजस्थान में मार्बल के काम के लिए काफी जाना जाता है. यहां मार्बल को काटने और चमकाने के दौरान पानी और पत्थर के बारीक कण मिलकर स्लरी बनाते हैं. इसी स्लरी को बाद में इस डंपिंग एरिया में जमा किया जाता है. Photo: AFP

  • 5/8

जब स्लरी का पानी सूख जाता है तो इसके बारीक पत्थर जमीन पर सफेद परत बना देते हैं. इसी वजह से पूरा इलाका दूर से बर्फ जैसा दिखाई देता है. सोशल मीडिया पर इसकी तस्वीरें और वीडियो देखकर कई लोग यहां घूमने और फोटो लेने पहुंच रहे हैं. Photo: AFP

  • 6/8

लेकिन इस सफेद नजारे के पीछे पर्यावरण से जुड़ी चिंता भी है। स्लरी सूखने के बाद उसके बारीक कण हवा में उड़ सकते हैं और आसपास धूल बढ़ा सकते हैं. खुले में कचरा जमा होने से जमीन और भूजल पर भी असर पड़ने का खतरा रहता है. Photo: AFP

Advertisement
  • 7/8

मार्बल कचरे को सही तरीके से संभालना जरूरी है. इसे खुले में जमा करने के बजाय दोबारा इस्तेमाल करने के तरीके अपनाए जा सकते हैं. इससे कचरे की मात्रा कम होगी और पर्यावरण पर पड़ने वाला असर भी घटाया जा सकेगा. Photo: AFP

  • 8/8

किशनगढ़ की यह जगह अब सोशल मीडिया की वजह से एक अलग तरह का टूरिस्ट स्पॉट बन गया है. लेकिन असल में यह मार्बल कचरे का बड़ा डंपिंग एरिया है, जहां हर दिन हजारों टन स्लरी पहुंचती है. इसलिए इसकी सफेदी के साथ इसके पर्यावरणीय असर को भी समझना जरूरी है. Photo: AFP

Advertisement

लेटेस्ट फोटो

Advertisement