Krishna Janmashtami 2026: जन्माष्टमी का पवित्र पर्व केवल भगवान श्रीकृष्ण के प्राकट्य का ही उत्सव नहीं है, बल्कि यह उनके संपूर्ण और प्रेरणादायी जीवन दर्शन को समझने का एक पावन अवसर है. भाद्रपद मास की अष्टमी तिथि को जब पूरा देश कृष्ण कन्हैया के स्वागत में सराबोर होता है, तब उनके जीवन से जुड़ी कई ऐसी गाथाएं भी चर्चा में आती हैं जो अक्सर लोगों को अचंभित और विस्मित कर देती हैं.
श्रीकृष्ण का जीवन केवल उनकी बाल-लीलाओं या माखन चोरी तक सीमित नहीं था. बल्कि, उनके जीवन का हर अध्याय चाहे वह धर्म की स्थापना हो, सामाजिक चेतना हो या संबंधों का निर्वाह गहरे अर्थ समेटे हुए है. जन्माष्टमी के इस शुभ अवसर पर आइए जानते हैं भगवान श्रीकृष्ण के विवाह, उनकी आठ प्रमुख रानियों (अष्टभार्या) और 16,108 पत्नियों से जुड़ी उस पौराणिक एवं सामाजिक कथा के बारे में, जो आज भी कौतूहल और श्रद्धा का विषय बनी हुई है.
भगवान श्रीकृष्ण की कितनी पत्नियां थीं? यह सवाल सुनने में भले ही आसान लगता हो, लेकिन इसका जवाब लोगों को अक्सर हैरान कर देता है. धार्मिक ग्रंथों और लोकप्रिय मान्यताओं में भगवान श्रीकृष्ण की 16,108 पत्नियों का उल्लेख मिलता है. इनमें उनकी आठ प्रमुख पत्नियां थीं, जिन्हें अष्टभार्या या अष्टमहिषी कहा जाता है.
पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर के बंदीगृह से हजारों महिलाओं को मुक्त कराया था. इसके बाद इन महिलाओं ने समाज में सम्मानजनक स्थान पाने के लिए श्रीकृष्ण को अपना पति स्वीकार करने की इच्छा व्यक्त की. इसी प्रसंग को श्रीकृष्ण के 16,000 या 16,100 से अधिक विवाहों से जोड़कर देखा जाता है. आइए जानते हैं भगवान श्रीकृष्ण की अष्टभार्या कौन थीं और 16,108 पत्नियों के पीछे की पौराणिक कथा क्या कहती है.
कौन थीं भगवान श्रीकृष्ण की आठ प्रमुख पत्नियां?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण की आठ प्रमुख पत्नियां थीं. इन्हें अष्टभार्या कहा जाता है. उनके नाम इस प्रकार बताए जाते हैं.
- रुक्मिणी
- सत्यभामा
- जाम्बवती
- कालिंदी
- मित्रविंदा
- नाग्नजिती या सत्या
- भद्रा
- लक्ष्मणा
रुक्मिणी और श्रीकृष्ण का विवाह
रुक्मिणी को भगवान श्रीकृष्ण की प्रमुख पत्नियों में माना जाता है. पौराणिक कथा के अनुसार, रुक्मिणी श्रीकृष्ण को अपना पति मान चुकी थीं, लेकिन उनके भाई रुक्मी उनका विवाह शिशुपाल से कराना चाहते थे. कथा के अनुसार, रुक्मिणी ने श्रीकृष्ण को संदेश भेजकर उनसे सहायता की प्रार्थना की. इसके बाद श्रीकृष्ण विदर्भ पहुंचे और रुक्मिणी को अपने साथ ले गए. बाद में दोनों का विवाह हुआ. धार्मिक परंपरा में रुक्मिणी और श्रीकृष्ण के संबंध को प्रेम, समर्पण और भक्ति का प्रतीक माना जाता है.
सत्यभामा से कैसे हुआ श्रीकृष्ण का विवाह?
सत्यभामा को श्रीकृष्ण की प्रमुख रानियों में गिना जाता है. उनका संबंध सत्राजित और स्यमंतक मणि की कथा से भी जोड़ा जाता है. सत्यभामा के व्यक्तित्व से जुड़ी कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं. कुछ परंपराओं में उन्हें दृढ़ निश्चयी और स्वाभिमानी व्यक्तित्व के रूप में वर्णित किया गया है.
जाम्बवती से विवाह की कहानी
जाम्बवती, जाम्बवान की पुत्री थीं. स्यमंतक मणि से जुड़ी कथा में भगवान श्रीकृष्ण और जाम्बवान के बीच लंबे समय तक युद्ध होने का वर्णन मिलता है. बाद में जब जाम्बवान को श्रीकृष्ण के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान हुआ, तो उन्होंने अपनी पुत्री जाम्बवती का विवाह श्रीकृष्ण से कर दिया.
कालिंदी ने श्रीकृष्ण को पति के रूप में चुना
कालिंदी सूर्यदेव की पुत्री मानी जाती हैं. पौराणिक कथा के अनुसार, वह भगवान विष्णु को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए तपस्या कर रही थीं. जब श्रीकृष्ण को उनके संकल्प के बारे में पता चला, तो उन्होंने कालिंदी को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया.
मित्रविंदा, नाग्नजिती, भद्रा और लक्ष्मणा
श्रीकृष्ण की अन्य प्रमुख पत्नियों के संबंध में भी विभिन्न पौराणिक कथाएं मिलती हैं. मित्रविंदा का विवाह श्रीकृष्ण से स्वयंवर प्रसंग से जोड़ा जाता है. वहीं नाग्नजिती, जिन्हें सत्या भी कहा जाता है, के विवाह से संबंधित कथा में सात शक्तिशाली बैलों को वश में करने की शर्त का उल्लेख मिलता है. भद्रा को श्रीकृष्ण की रिश्तेदारी से जुड़ा बताया जाता है, जबकि लक्ष्मणा के विवाह का उल्लेख भी स्वयंवर प्रसंगों में मिलता है.
आखिर 16,000 महिलाओं से विवाह क्यों किया?
भगवान श्रीकृष्ण के 16,000 या उससे अधिक विवाहों का सबसे चर्चित प्रसंग नरकासुर से जुड़ा हुआ है. पौराणिक कथाओं के अनुसार, नरकासुर ने हजारों महिलाओं को बंदी बनाकर रखा था. भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर का वध करने के बाद इन महिलाओं को मुक्त कराया था. कथा के अनुसार, इन महिलाओं को भय था कि समाज उन्हें स्वीकार नहीं करेगा. उन्होंने श्रीकृष्ण से प्रार्थना की कि वे उन्हें अपने संरक्षण में लें.
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने उनकी प्रार्थना स्वीकार की और उन्हें अपनी पत्नियों के रूप में सम्मान प्रदान किया. यही कारण है कि इस प्रसंग को केवल विवाहों की संख्या के रूप में नहीं, बल्कि उस समय की सामाजिक परिस्थितियों और पौराणिक कथा के संदर्भ में भी देखा जाता है.
श्रीकृष्ण ने राधा रानी से विवाह क्यों नहीं किया था?
भगवान श्रीकृष्ण की पत्नियों की चर्चा हो और राधा का नाम न आए, ऐसा संभव नहीं है. लोगों के मन में अक्सर सवाल उठता है कि यदि राधा और कृष्ण का प्रेम इतना प्रसिद्ध है, तो दोनों का विवाह क्यों नहीं हुआ?
राधा और कृष्ण के संबंध को विभिन्न धार्मिक और भक्ति परंपराओं में अलग-अलग रूपों में समझा गया है. विशेष रूप से भक्ति परंपरा में राधा-कृष्ण का संबंध सांसारिक प्रेम से ऊपर आत्मा और परमात्मा के मिलन का प्रतीक माना जाता है. इसलिए भक्तों के लिए राधा और कृष्ण का संबंध केवल विवाह के बंधन से परिभाषित नहीं होता. उनके प्रेम में समर्पण, भक्ति और पूर्ण एकत्व का भाव देखा जाता है.
क्या भगवान श्रीकृष्ण का परिवार बहुत बड़ा था?
धार्मिक ग्रंथों में भगवान श्रीकृष्ण के विशाल परिवार का वर्णन मिलता है. उनकी रानियां, पुत्र और वंशज द्वारका के इतिहास और यदुवंश से जुड़ी पौराणिक कथाओं का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. हालांकि, बाद में यदुवंश के विनाश का भी वर्णन मिलता है. पौराणिक कथाओं के अनुसार, यदुवंश के लोगों के बीच आपसी संघर्ष और परिस्थितियों के कारण उनका अंत हुआ.
इस प्रसंग को धार्मिक दृष्टि से कर्म, अहंकार और अधर्म के परिणामों से जोड़कर देखा जाता है. संदेश यही माना जाता है कि शक्ति और सामर्थ्य के बावजूद व्यक्ति को अपने कर्मों के परिणामों का सामना करना पड़ता है.
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