Hindu Dharam: आपने अक्सर लोगों से दुनिया खत्म होने यानी प्रलय की बातें सुनी होंगी. हर व्यक्ति इस विषय पर अलग-अलग राय देता है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि आज के समय में भी कुछ ऐसे शिवलिंग मौजूद हैं, जिनसे जुड़ी मान्यताओं में प्रलय के संकेत बताए जाते हैं?
देवों के देव महादेव की कृपा पाने के लिए भक्त ज्योतिर्लिंग हो या कोई भी शिव मंदिर, हर जगह श्रद्धा से पहुंचते हैं. देश में कई ऐसे स्वयंभू शिवलिंग हैं, जिनके बारे में कहा जाता है कि उनका आकार समय के साथ बदलता रहता है. आज हम आपको ऐसे दो रहस्यमयी शिव मंदिरों के बारे में बताएंगे, जहां स्थापित शिवलिंग के बढ़ते आकार को प्रलय से जोड़ा जाता है.
मृदेश्वर महादेव मंदिर
सबसे पहले बात करते हैं गुजरात के गोधरा स्थित मृदेश्वर महादेव मंदिर की. मान्यता है कि यहां का शिवलिंग धीरे-धीरे बढ़ रहा है. कहा जाता है कि यह वृद्धि कलयुग में बढ़ते पापों का संकेत है. लोगों का विश्वास है कि जिस दिन यह शिवलिंग 80 फीट ऊंचा होकर मंदिर की छत को छू लेगा, उस दिन कलयुग अपने अंतिम चरण में पहुंच जाएगा. हालांकि, यह भी कहा जाता है कि यह गति बहुत धीमी है, चावल के दाने के बराबर. ऐसे में छत तक पहुंचने में अभी लाखों साल लग सकते हैं. इस शिवलिंग की एक खास बात यह भी है कि इसमें से लगातार जलधारा निकलती रहती है, जिस पर मौसम का कोई प्रभाव नहीं पड़ता. हालांकि, इन मान्यताओं के ठोस प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं.
पाताल भुवनेश्वर गुफा मंदिर
अब बात करते हैं उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में स्थित पाताल भुवनेश्वर गुफा मंदिर की. इस गुफा का उल्लेख पुराणों में भी मिलता है. मान्यता है कि इस गुफा में दुनिया के अंत का रहस्य छिपा हुआ है. गुफा का प्रवेश मार्ग बेहद संकरा है. कथा के अनुसार, त्रेता युग में सूर्यवंशी राजा ऋतुपर्ण ने इस गुफा की खोज की थी. उन्हें यहां नागों के राजा शेषनाग मिले, जिन्होंने उन्हें गुफा के भीतर ले जाकर देवी-देवताओं के दर्शन कराए. ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव स्वयं इस गुफा में निवास करते हैं और सभी देवी-देवता उनकी पूजा करने यहां आते हैं.
कलयुग में इस गुफा की पुनः खोज आदि शंकराचार्य ने 8वीं शताब्दी में की थी और यहां तांबे का शिवलिंग स्थापित किया था. इस गुफा में ब्रह्मा, विष्णु और महेश की प्रतीक संरचनाएं हैं, जिन पर प्राकृतिक रूप से जल टपकता रहता है. यहां चार पत्थर भी हैं, जो सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलयुग के प्रतीक माने जाते हैं. इनमें से कलयुग का पत्थर सबसे ऊंचा है. मान्यता है कि जिस दिन यह पत्थर ऊपर की संरचना से टकरा जाएगा, उसी दिन कलयुग का अंत और प्रलय होगा.
शिवलिंग से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण रहस्य
पहला
शिवलिंग को ब्रह्मांड का प्रतीक माना जाता है. इसकी आकृति पूरे ब्रह्मांड और उसमें स्थित ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करती है. वायु पुराण के अनुसार, प्रलय काल में संपूर्ण सृष्टि जिस तत्व में लीन हो जाती है और सृष्टि के समय जिससे पुनः उत्पन्न होती है, वही शिवलिंग है.
दूसरा
शिवलिंग शिव के आदि और अनादि स्वरूप का प्रतीक है. यह निराकार, अनंत और ब्रह्मांडीय शक्ति का संकेत है. स्कंद पुराण में कहा गया है कि आकाश स्वयं लिंग है और पृथ्वी उसकी आधारशिला है.
तीसरा
शिवलिंग को ज्योति का प्रतीक माना गया है. इसे प्रकाश स्तंभ, अग्नि स्तंभ और ऊर्जा स्तंभ जैसे कई नामों से जाना जाता है. वेदों के अनुसार, ज्योतिर्लिंग व्यापक प्रकाश का प्रतीक है, जो सृष्टि के मूल तत्वों से जुड़ा है.
चौथा
शिवलिंग पूजा की शुरुआत एक दिव्य घटना से मानी जाती है. जब ब्रह्मा और विष्णु के बीच श्रेष्ठता का विवाद हुआ, तब भगवान शिव ने एक अनंत ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट होकर उन्हें अपने परम स्वरूप का ज्ञान कराया. तभी से शिवलिंग की पूजा प्रारंभ हुई.
पांचवां
शिवलिंग की संरचना तीन भागों में होती है. इसका निचला भाग भूमिगत रहता है, मध्य भाग आधार होता है और शीर्ष अंडाकार भाग पूजनीय होता है.
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