Ramayan: मां सीता को बचाने के लिए रावण से भिड़ गए! कौन थे गिद्धराज जटायु? फिल्म रामायण में अनुपम खेर ने दी है आवाज

Ramayan: रामायण का वो महान पक्षीराज, जिसने अपनी जान की बाजी लगाकर रावण को भी जख्मी कर दिया था और जिसकी मृत्यु पर स्वयं भगवान श्रीराम भी रो पड़े थे. आइए जानते हैं वीर जटायु की कथा के बारे में.

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गिद्धराज जटायु (Photo: Screengrab) गिद्धराज जटायु (Photo: Screengrab)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 04 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 1:27 PM IST

Ramayan: हाल ही में फिल्म रामायण का ट्रेलर लॉन्च हुआ है. जिसकी पूरी कास्ट चर्चा का विषय बनी हुई है. फिल्म में सिर्फ मुख्य कलाकार ही नहीं, बल्कि सपोर्टिंग कास्ट की भी काफी चर्चा हो रही है. जिसमें रणबीर कपूर श्रीराम का रोल प्ले करेंगे. वहीं, रामायण फिल्म की कॉमिक बुक के मुताबिक, जटायु को आवाज अनुपम खेर ने दी है.

वैसे तो, अधिकतर लोग गिद्धराज जटायु के बारे में सिर्फ इतना ही जानते हैं कि उन्होंने रावण से लड़कर माता सीता को बचाने की कोशिश की थी, जब रावण उन्हें लंका ले जा रहा था. लेकिन, जटायु का परिचय इससे कहीं ज्यादा है. रामायण और अन्य पौराणिक ग्रंथों में जटायु को एक वीर और भगवान श्रीराम के सच्चे शुभचिंतकों के रूप में बताया गया है. वे केवल एक पक्षी नहीं, बल्कि साहस और त्याग के प्रतीक भी माने जाते हैं. तो आइए जानते हैं कि कौन थे गिद्धराजा जटायु?

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कौन थे जटायु?

रामायण के मुताबिक, जटायु गिद्धों के राजा थे. जटायु अरुणदेव के पुत्र थे, जो सूर्य देव के सारथी थे. उनके भाई का नाम संपाती था. जटायु धर्म को अच्छी तरह समझते थे और उसका पालन करते थे. वे भगवान श्रीराम के पिता राजा दशरथ के अच्छे मित्र भी थे. बचपन में जटायु और उनके भाई ने सूर्य तक पहुंचने की कोशिश की थी. लेकिन जब जटायु सूर्य की गर्मी सहन नहीं कर पाए, तब संपाती ने अपने पंख फैलाकर उन्हें बचाया था और इस दौरान अपने पंख गंवा दिए थे. बाद में जटायु पंचवटी में रहने लगे थे, जहां उन्होंने रामायण में अहम भूमिका निभाई थी.

गिद्धराज जटायु के बारे में यह भी उल्लेख मिलता है कि मध्यप्रदेश के देवास जिले की बागली तहसील में स्थित जटाशंकर नामक स्थान पर जटायु तपस्या करते थे.  यह स्थान धार्मिक मान्यताओं और प्राकृतिक सुंदरता का अद्भुत संगम माना जाता है. गिद्धराज जटायु के अलावा यह पावन स्थल प्राचीन काल से ही कई महान ऋषि-मुनियों की तपोभूमि रहा है. इस स्थान का नाम जटाशंकर पड़ने के पीछे एक मान्यता है. यहां पहाड़ से प्राकृतिक रूप से जल की धारा बहती है, जो नीचे स्थापित शिवलिंग पर इस प्रकार गिरती है मानो भगवान शिव की जटाओं से स्वयं मां गंगा बह रही हों. जल और शिव के इसी अद्भुत दृश्य के कारण इस स्थान को जटाशंकर कहा जाता है. 

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जटायु (Photo: Screengrab)

रावण द्वारा सीता का हरण

इसके अलावा, रामायण में भी जटायु ने बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. कथा के अनुसार, एक दिन राक्षस राज रावण ने माता सीता का अपहरण करने की योजना बनाई. इसके लिए उसने अपने मामा मारीच को सोने के हिरण का रूप धारण करने के लिए कहा, ताकि श्री राम और लक्ष्मण जी को कुटिया से दूर ले जाया जा सके. मां सीता उस सुंदर हिरण को देखकर मोहित हो गईं और उन्होंने भगवान राम से उसे पकड़कर लाने को कहा. श्री राम उस हिरण के पीछे जंगल में दूर तक चले गए और लक्ष्मण को सीता की रक्षा के लिए वहीं छोड़ दिया.

जब श्री राम ने हिरण को मारा, तब मारीच ने श्री राम की आवाज में पुकारा. यह सुनकर सीता घबरा गईं और लक्ष्मण से श्री राम की मदद के लिए जाने को कहा. लक्ष्मण मन नहीं होने के बावजूद मां सीता को अकेला छोड़कर राम को खोजने चले गए. इसी मौके का फायदा उठाकर रावण साधु का भेष बनाकर उनकी कुटिया पहुंचा. जब माता सीता को उसकी सच्चाई पता चली और उन्होंने उसे मना कर दिया, तब रावण ने अपना असली रूप दिखाया और उन्हें जबरदस्ती अपने रथ में बैठाकर लंका की ओर ले गया.

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जटायु ने किया था रावण से युद्ध

जब रावण माता सीता को लेकर आकाश मार्ग से जा रहा था, तब गिद्धराज जटायु ने उन्हें देख लिया और तुरंत समझ गए कि मां सीता संकट में हैं. जटायु ने बिना डरे रावण पर हमला कर दिया और सीता को बचाने की कोशिश की. उन्होंने पूरी ताकत से रावण से लड़ाई की. अपने पंख, चोंच और पंजों से वार करके उन्होंने रावण को घायल भी कर दिया था. लेकिन रावण बहुत शक्तिशाली था, इसलिए अंत में उसने तलवार से जटायु के पंख काट दिए. इससे जटायु गंभीर रूप से घायल होकर जमीन पर गिर पड़े. रावण सीता को लेकर आगे लंका चला गया. रास्ते में मां सीता ने अपने गहने और कपड़ों के टुकड़े नीचे गिरा दिए, ताकि श्री राम और लक्ष्मण उनके पीछे आने का रास्ता समझ सकें.

श्रीराम का जटायु से मिलना

रावण के जाने के बाद जब श्री राम और लक्ष्मण कुटिया में लौटे, तो उन्हें मां सीता वहां नहीं मिलीं. वे बहुत चिंतित हो गए और उन्हें ढूंढते हुए इधर-उधर भटकने लगे. खोजते-खोजते उन्हें घायल गिद्धराज जटायु जमीन पर पड़े मिले, जिनकी सांसें चल रही थीं लेकिन हालत बहुत खराब थी. पहले तो श्री राम और लक्ष्मण उन्हें राक्षस समझ बैठे, लेकिन जटायु ने अपने अंतिम समय में राजा दशरथ से अपनी मित्रता बताई और पूरी घटना बता दी.

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यह सुनकर श्री राम बहुत दुखी हुए और जटायु के पास बैठ गए. मरते समय जटायु ने दक्षिण दिशा की ओर इशारा किया, जहां रावण सीता को लेकर गया था. इतना बताने के बाद जटायु ने राम की गोद में ही अपने प्राण त्याग दिए.

ऐसे हुआ था जटायु का अंतिम संस्कार

जटायु की बहादुरी और निष्ठा देखकर भगवान राम बहुत भावुक हो गए थे. उन्होंने पूरे सम्मान के साथ जटायु का अंतिम संस्कार किया था. यह घटना खास थी, क्योंकि इससे पता चलता है कि सच्ची मित्रता और सम्मान जाति या रूप नहीं देखते. जटायु की इस महान सेवा के कारण उन्हें मोक्ष प्राप्त हुआ था. माना जाता है कि वे अग्नि के दिव्य रथ में बैठकर भगवान विष्णु के धाम को चले गए, जो एक बहुत ही दुर्लभ और सम्मानजनक अंत माना जाता है.

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