सनातन संस्कृति में भगवान शिव के हर एक स्वरूप, मुद्रा और प्रतीक के पीछे गहरा आध्यात्मिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक संदेश छिपा हुआ है. देवों के देव महादेव का नटराज स्वरूप उन्हीं में से एक अत्यंत रहस्यमयी और कलात्मक रूप है, जो दुनियाभर के वैज्ञानिकों, कलाकारों और दार्शनिकों को हमेशा से आकर्षित करता रहा है. नृत्य कला के अधिपति के रूप में नटराज की प्रतिमा में छिपी हर एक विशेषता ब्रह्मांड के रहस्यों को बयां करती है. आइए जानते हैं भगवान शिव के इस अद्भुत तांडव स्वरूप और उनके चरणों में दबे अपस्मार के उस गहरे रहस्य को, जो जीवन के बड़े सबक सिखाता है.
नटराज रूप: ब्रह्मांडीय ऊर्जा और निरंतर गति का प्रतीक
नटराज यानी नृत्यों के राजा भगवान शिव का यह रूप सृष्टि के शाश्वत चक्र उत्पत्ति, स्थिति और संहार (विनाश) को दर्शाता है. ब्रह्मांड में ऊर्जा का प्रवाह कभी रुकता नहीं है, और नटराज की कांस्य प्रतिमा इसी कॉस्मिक एनर्जी (ब्रह्मांडीय ऊर्जा) का सबसे सटीक और जीवंत चित्रण मानी जाती है. आधुनिक विज्ञान और भौतिकी (Physics) में भी ब्रह्मांड के इस कॉस्मिक डांस को स्वीकार किया गया है, जिसका जीवंत उदाहरण जिनेवा (स्विट्जरलैंड) स्थित प्रतिष्ठित संस्थान CERN के परिसर में स्थापित नटराज की विशाल प्रतिमा है.
पैरों के नीचे दबे अपस्मार का रहस्य (Mystery of Apasmara)
नटराज की मूर्ति में महादेव एक पैर से एक बौने जैसी आकृति को कुचलते हुए मुद्रा में नजर आते हैं. इस रूप को अपस्मार (Apasmara) या मुइला कहा जाता है:
अज्ञानता और अहंकार का प्रतीक: अपस्मार हिंदू पौराणिक कथाओं में अज्ञानता, मूर्खता, अहंकार और मानसिक जड़ता (Ignorance and Lethargy) का प्रतीक माना जाता है.
अज्ञान पर ज्ञान की विजय: भगवान शिव का इसे अपने दाहिने पैर के नीचे दबाकर रखना इस बात का संदेश देता है कि जब तक मनुष्य अपने भीतर के अज्ञान और अहंकार को कुचलता या नियंत्रित नहीं करता, तब तक उसे सच्चे ज्ञान और मोक्ष की प्राप्ति नहीं हो सकती.
संतुलन का संदेश: इसका अर्थ यह भी है कि जीवन की अंधी दौड़ में बुद्धि और चेतना को हमेशा अज्ञानता पर विजय प्राप्त रखनी चाहिए.
नटराज की मुद्रा और अन्य प्रमुख प्रतीकों के अर्थ
प्रभा (प्रभा मंडल/Fire Circle): नटराज के चारों ओर बना आग का घेरा इस ब्रह्मांड के भौतिक चक्र, समय के दायरे और पुनर्जन्म के चक्र को दर्शाता है.
डमरू (Drum): शिव के दाहिने ऊपरी हाथ में डमरू है, जो सृष्टि की पहली ध्वनि (नाद या ब्रह्मांडीय स्पंदन) और समय के आरंभ का प्रतीक है.
अग्नि (Fire): बाएं ऊपरी हाथ में अग्नि इस बात का प्रतीक है कि एक दिन इस पूरी सृष्टि का समापन या प्रलय इसी अग्नि में समाहित होना है.
अभय मुद्रा: उनका एक हाथ अभय मुद्रा में उठा होता है, जो भक्तों को यह आश्वासन देता है कि जो व्यक्ति धर्म और अध्यात्म के मार्ग पर चलता है, उसे भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है.
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