जब महाकाली की शरण में पहुंची थीं इंदिरा गांधी, 5 फूल चढ़ाने से खुलती है किस्मत

श्री 1008 महाकाली विद्यापीठ की चर्चा पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से जुड़े एक प्रसंग के कारण भी होती है. मंदिर के पुजारी पंडित अजय त्रिवेदी के अनुसार, वर्ष 1977 में चुनावी हार के बाद इंदिरा गांधी मंदिर पहुंची थीं और उन्होंने यहां धार्मिक अनुष्ठान कराया था.

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इस मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं के बीच पांच लाल गुड़हल के फूल मां को अर्पित करने की मान्यता है. (Photo: ITG) इस मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं के बीच पांच लाल गुड़हल के फूल मां को अर्पित करने की मान्यता है. (Photo: ITG)

अजय झा

  • झांसी,
  • 14 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 8:46 PM IST

मां काली का नाम सुनते ही आंखों के सामने देवी का दिव्य स्वरूप आ जाता है. हाथों में खड़ग, खप्पर, गले में मुंडमाला और रौद्र स्वरूप उनकी पहचान है. लेकिन बुंदेलखंड की ऐतिहासिक नगरी झांसी में मां महाकाली का एक ऐसा अनूठा दरबार है, जहां देवी का स्वरूप भक्तों की इस पारंपरिक कल्पना से बिल्कुल अलग है. यहां मां महाकाली कन्या स्वरूप में सौम्य और शांत भाव से विराजमान हैं. लक्ष्मी तालाब के निकट स्थित श्री 1008 महाकाली विद्यापीठ अपनी प्राचीन परंपराओं और इतिहास के कारण श्रद्धालुओं की गहरी आस्था का केंद्र बना हुआ है. नवरात्र के दिनों में यहां मंदिर में दर्शन के लिए भक्तों की भीड़ उमड़ रही है. कोई परिवार की सुख-समृद्धि की कामना लेकर पहुंच रहा है, तो कोई जीवन की परेशानियों से मुक्ति और मनोकामना पूर्ति के लिए मां के दरबार में माथा टेक रहा है.

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इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता मां महाकाली का बालिका स्वरूप है. सामान्य रूप से उग्र और रौद्र रूप वाली महाकाली यहां शांत, सौम्य और वात्सल्य से परिपूर्ण स्वरूप में विराजमान हैं. मंदिर के पुजारी पंडित अजय त्रिवेदी के अनुसार, यहां स्थापित मां का विग्रह स्वयंभू माना जाता है. श्रद्धालुओं की मान्यता है कि मां अपने भक्तों को उनकी श्रद्धा और भाव के अनुरूप दर्शन देती हैं. यही वजह है कि मंदिर में आने वाले भक्तों के लिए यह स्थान केवल पूजा-अर्चना का केंद्र नहीं, बल्कि विश्वास, साधना और आध्यात्मिक अनुभूति से जुड़ा तीर्थ भी है.

मंदिर का इतिहास
श्री 1008 महाकाली विद्यापीठ के इतिहास को लेकर स्थानीय धार्मिक परंपराओं में ओरछा के राजा वीर सिंह जूदेव का नाम प्रमुखता से लिया जाता है. प्रचलित मान्यता के अनुसार, राजा वीर सिंह जूदेव शिकार के लिए इस क्षेत्र में आए थे. इसी दौरान पहाड़ी के पास एक गुफा और वहां दिखाई देने वाले प्रकाश पुंज ने उनका ध्यान आकर्षित किया. गुफा में मां के दिव्य स्वरूप के दर्शन होने की मान्यता के बाद यहां मंदिर निर्माण और पूजा-अर्चना की परंपरा आगे बढ़ी.

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पुजारी पंडित अजय त्रिवेदी मंदिर की परंपरा को लगभग चार सौ वर्ष पुराना बताते हैं. उनके अनुसार, मंदिर के इतिहास से जुड़े पुराने लेखों और गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से इसकी धार्मिक विरासत आगे बढ़ती रही है. मंदिर में पीढ़ियों से पूजा-पाठ की परंपरा निभाई जा रही है और वर्तमान में वह इसी परंपरा के तहत सेवा कर रहे हैं.

मंदिर से जुड़ी एक अन्य स्थानीय मान्यता झांसी के प्राचीन इतिहास से भी संबंध रखती है. पुजारी के अनुसार, पुराने समय में यह क्षेत्र शिकारगाह के रूप में जाना जाता था. यहां दिखाई देने वाली आकृति को लेकर ‘झाईं सी’ शब्द का उल्लेख मिलता है, जिसे कुछ धार्मिक परंपराएं झांसी नाम की उत्पत्ति से जोड़कर देखती हैं. हालांकि यह प्रसंग स्थानीय मान्यता के रूप में बताया जाता है.

पांच गुड़हल के फूल चढ़ाने की परंपरा
नवरात्र के दौरान मंदिर पहुंचने वाले श्रद्धालुओं के बीच पांच लाल गुड़हल के फूल मां को अर्पित करने की मान्यता विशेष रूप से प्रचलित है. मंदिर के पुजारी और यहां दर्शन करने आए भक्तों के अनुसार, मां महाकाली को लाल गुड़हल के फूल अर्पित कर श्रद्धा के साथ अपनी मनोकामना व्यक्त की जाती है. कई श्रद्धालु इसे अपनी पूजा का महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं.

मंदिर में आने वाली महिला श्रद्धालु कीर्ति साहू बताती हैं कि ओरछा के राजा के शिकार के लिए इस क्षेत्र में आने और पहाड़ी पर प्रकाश दिखाई देने की कथा यहां की पुरानी मान्यताओं का हिस्सा है. उनके अनुसार, मां यहां सौम्य स्वरूप में विराजमान हैं और झांसी सहित आस-पास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में लोग दर्शन करने पहुंचते हैं. पांच गुड़हल के फूल चढ़ाकर मां से प्रार्थना करने की परंपरा भी लंबे समय से श्रद्धालुओं के बीच प्रचलित है.

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महिला श्रद्धालु सलोनी साहू भी मंदिर के इसी विशेष स्वरूप को इसकी सबसे बड़ी पहचान बताती हैं. उनका कहना है कि अन्य स्थानों पर मां काली का स्वरूप अधिक तेजस्वी और रौद्र दिखाई देता है. जबकि झांसी के इस मंदिर में मां शांत और शीतल रूप में विराजमान हैं. श्रद्धालुओं की मान्यता है कि सच्चे मन से की गई प्रार्थना मां के दरबार में जरूर सुनी जाती है.

हालांकि, मनोकामना पूरी होने की बात श्रद्धालुओं की व्यक्तिगत आस्था और अनुभव से जुड़ी है. मंदिर आने वाले भक्तों के लिए पांच गुड़हल के फूल अर्पित करना मां के प्रति समर्पण और विश्वास व्यक्त करने का एक विशेष माध्यम है.

इंदिरा गांधी ने किया था धार्मिक अनुष्ठान
श्री 1008 महाकाली विद्यापीठ की चर्चा पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से जुड़े एक प्रसंग के कारण भी होती है. मंदिर के पुजारी पंडित अजय त्रिवेदी के अनुसार, वर्ष 1977 में चुनावी हार के बाद इंदिरा गांधी मंदिर पहुंची थीं और उन्होंने यहां धार्मिक अनुष्ठान कराया था. पुजारी ने अपने साक्षात्कार में बताया कि उस समय मां के दरबार में पूजा और अनुष्ठान को लेकर विशेष धार्मिक परंपरा निभाई गई थी.

पुजारी के मुताबिक, इंदिरा गांधी ने मां के समक्ष अपनी राजनीतिक परिस्थितियों को लेकर मार्गदर्शन चाहा था. मंदिर की परंपरा से जुड़ा एक प्रसंग फूल के माध्यम से संकेत मिलने की मान्यता से भी संबंधित है. पुजारी का कहना है कि इसके बाद इंदिरा गांधी ने दोबारा राजनीतिक सफलता हासिल की और वर्ष 1980 में फिर प्रधानमंत्री बनीं.

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उन्होंने बताया कि इंदिरा गांधी बाद में भी मंदिर आई थीं और उनकी ओर से यहां लक्षचंडी यज्ञ कराने में सहयोग दिया गया था. मंदिर से जुड़े इस प्रसंग का उल्लेख स्थानीय धार्मिक चर्चाओं में आज भी किया जाता है. श्रद्धालु इसे मां महाकाली के प्रति आस्था से जोड़कर देखते हैं. हालांकि, धार्मिक अनुष्ठान और चुनावी सफलता के बीच किसी प्रत्यक्ष कारणात्मक संबंध की स्वतंत्र पुष्टि नहीं है.

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