Garud Puran: अकाल मृत्यु के बाद क्यों जरूरी है 'नारायण बलि'? गरुण पुराण से जानें

Garud Puran: गरुड़ पुराण के अनुसार, जब किसी व्यक्ति की मृत्यु दुर्घटना, असामान्य परिस्थितियों में या अकाल होती है तो उसका सामान्य रीति-रिवाजों से अंतिम संस्कार संभव नहीं हो पाता है. ऐसी स्थिति में दिवंगत आत्मा की शांति और सद्गति के लिए 'नारायण बलि' का विशेष कर्मकांड किया जाता है.

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गरुड़ पुराण (Photo: ITG) गरुड़ पुराण (Photo: ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 05 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 1:00 PM IST

Garud Puran: महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित पुराणों और हिंदू धार्मिक परंपराओं में मृत्यु के बाद आत्मा की गति, श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान से जुड़े अनेक विधान बताए गए हैं. इन्हीं विशेष कर्मों में से एक है नारायण बलि. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कुछ विशेष परिस्थितियों में होने वाली मृत्यु के बाद नारायण बलि का विधान किया जाता है. मान्यता है कि इस कर्मकांड के माध्यम से दिवंगत आत्मा की शांति और सद्गति के लिए भगवान विष्णु से प्रार्थना की जाती है.

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नारायण बलि से संबंधित एक प्रसंग में गरुड़ देव भगवान श्रीहरि विष्णु से उन लोगों की मृत्यु और परलोक की गति के बारे में प्रश्न करते हैं, जिनकी मृत्यु असामान्य परिस्थितियों में हुई हो या जिनकी मृत्यु के संबंध में परिवार को स्पष्ट जानकारी न हो.

किन परिस्थितियों में किया जाता है नारायण बलि?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अकाल मृत्यु, दुर्घटना, असामान्य मृत्यु या ऐसी परिस्थितियां, जिनमें मृत्यु के बाद सामान्य रूप से अंतिम संस्कार और अन्य कर्म संपन्न नहीं हो पाए हों, उनमें विशेष कर्मकांड करने की परंपरा रही है. इन्हीं विशेष धार्मिक विधानों में नारायण बलि का भी उल्लेख मिलता है.

मान्यता है कि यदि किसी कारणवश मृतक का अंतिम संस्कार और उसके बाद किए जाने वाले कर्म शास्त्रीय या पारिवारिक परंपरा के अनुसार संपन्न न हो पाए हों, तो विद्वान आचार्य की सलाह से विशेष कर्म किए जा सकते हैं. नारायण बलि का मुख्य उद्देश्य दिवंगत आत्मा की शांति और उसके लिए भगवान विष्णु से सद्गति की प्रार्थना करना माना जाता है.

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अलग-अलग वर्णों के लिए बताए गए हैं अलग समय

कुछ प्राचीन धार्मिक परंपराओं में विशेष परिस्थितियों में प्रतीकात्मक दाह संस्कार या पुतलिका दहन के लिए अलग-अलग समय का उल्लेख मिलता है. इन परंपराओं के अनुसार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के लिए अलग-अलग अवधि बताई गई है. हालांकि वर्तमान समय में इन विधियों का पालन क्षेत्र, परिवार और धार्मिक परंपरा के अनुसार अलग-अलग हो सकता है. इसलिए किसी भी विशेष कर्मकांड को करने से पहले योग्य पुरोहित या धर्माचार्य से मार्गदर्शन लेना उचित माना जाता है.

नारायण बलि कहां किया जाता है?

धार्मिक परंपराओं के अनुसार, नारायण बलि जैसे विशेष कर्म पवित्र स्थान पर किए जाते हैं. इनमें नदी या सरोवर के समीप, स्वच्छ जल वाले स्थान, मंदिर अथवा भगवान विष्णु की उपस्थिति वाले पवित्र स्थल शामिल हो सकते हैं. कर्मकांड के दौरान वैदिक और पौराणिक मंत्रों के माध्यम से भगवान विष्णु की पूजा और दिवंगत आत्मा के लिए तर्पण किया जाता है. यजमान जल, अक्षत और अन्य पूजन सामग्री लेकर भगवान विष्णु का स्मरण करता है. पुरुष सूक्त या वैष्णव मंत्रों के माध्यम से भगवान श्रीहरि की आराधना की जाती है.

नारायण बलि के दौरान भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए दिवंगत आत्मा की शांति और सद्गति की प्रार्थना की जाती है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान विष्णु को मोक्ष प्रदान करने वाला और संसार सागर से मुक्ति दिलाने वाला माना गया है. इसलिए इस कर्म में भगवान नारायण की विशेष रूप से पूजा की जाती है. यजमान भगवान से प्रार्थना करता है कि दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान हो और उसकी आगे की यात्रा मंगलमय हो.

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प्रतिमाओं और कलशों की स्थापना का विधान

कुछ पारंपरिक विधानों में विशेष पूजा के लिए विभिन्न देवताओं की प्रतीकात्मक स्थापना की जाती है. इनमें ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, यम और दिवंगत व्यक्ति का प्रतीकात्मक स्वरूप शामिल हो सकता है. इनके लिए अलग-अलग कलश स्थापित किए जाते हैं और विधि-विधान से पूजा की जाती है. धार्मिक कर्मकांड में वस्त्र, यज्ञोपवीत, पुष्प और अन्य पूजन सामग्री अर्पित की जाती है. इसके बाद मंत्रोच्चार के साथ श्राद्ध और तर्पण की प्रक्रिया संपन्न की जाती है.

पुतलिका निर्माण और प्रतीकात्मक शरीर की परंपरा

कुछ प्राचीन विधानों में मृतक के प्रतीक के रूप में एक पुतलिका या मानव आकृति बनाने का भी उल्लेख मिलता है. विशेष रूप से उन परिस्थितियों में, जब मृतक का शरीर उपलब्ध न हो या उसका अंतिम संस्कार सामान्य विधि से न हो पाया हो. इस प्रतीकात्मक शरीर के निर्माण में कुश, लकड़ी और अन्य पारंपरिक सामग्री का उपयोग किए जाने का उल्लेख मिलता है.

पुराने ग्रंथों और कर्मकांड संबंधी परंपराओं में मानव शरीर के विभिन्न अंगों को प्रतीकात्मक रूप से अलग-अलग वस्तुओं और सामग्रियों से निर्मित करने का वर्णन भी मिलता है. इन विधियों का उद्देश्य मृतक के लिए प्रतीकात्मक रूप से अंतिम संस्कार की प्रक्रिया को पूरा करना माना जाता है.

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प्रतीकात्मक पुतले का किया जाता है संस्कार

पुतलिका या प्रतीकात्मक शरीर को तैयार करने के बाद उसका विधि-विधान से पूजन किया जाता है. मंत्रों से अभिमंत्रित जल का प्रयोग किया जाता है और भगवान विष्णु का स्मरण किया जाता है. कुछ परंपराओं में शालिग्राम शिला से संबंधित पूजन का भी विधान बताया गया है. इसके बाद दिवंगत आत्मा की शांति और मोक्ष की कामना की जाती है.

दान और श्राद्ध का महत्व

धार्मिक परंपराओं में नारायण बलि के दौरान दान, तर्पण और श्राद्ध का विशेष महत्व बताया गया है. कुछ विधानों में वस्त्र, तिल, अन्न, धातु और अन्य वस्तुओं के दान का उल्लेख मिलता है. प्राचीन परंपराओं में गौदान का भी विशेष महत्व बताया गया है. मान्यता है कि श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार किए गए दान-पुण्य से दिवंगत आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की जाती है.

प्रतीकात्मक दाह संस्कार के बाद क्या किया जाता है?

पूजा और आवश्यक धार्मिक कर्म संपन्न होने के बाद प्रतीकात्मक पुतले का दाह संस्कार किया जाता है. इसके पश्चात परंपरा के अनुसार शुद्धिकरण, तर्पण और श्राद्ध से जुड़े कर्म किए जाते हैं. कुछ परंपराओं में एक निश्चित अवधि तक विशेष नियमों का पालन करने का उल्लेख मिलता है. इसके बाद परिवार के सदस्य भगवान विष्णु की आराधना करते हुए दिवंगत आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करते हैं.

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