देशभर में बिल्ली प्रजाति के दुर्लभ और विलुप्तप्राय जीव 'एशियाटिक कैराकल' को अच्छी खबर है. राजस्थान के धौलपुर-करौली टाइगर रिजर्व के जंगलों में कैराकल की देश में सबसे ज्यादा आबादी पाई गई है. जंगल में लगाए गए ट्रैप कैमरों में करीब 200 कैराकल रिकॉर्ड हुए हैं. देश के 96 प्रतिशत हिस्से से लगभग विलुप्त हो चुके इस दुर्लभ जीव का इस संख्या में मिलना वन्यजीव प्रेमियों और वन विभाग के लिए एक सफलता माना जा रहा है.
दरअसल, कैराकल बिल्ली प्रजाति का एक बेहद फुर्तीला और शर्मीला जंगली जानवर है. यह आमतौर पर इंसानों से दूर रहता है और ज्यादातर रात में ही शिकार के लिए निकलता है. हालांकि, धौलपुर के जंगलों में इसकी संख्या अच्छी होने के चलते यह अब दिन के समय भी कैमरा ट्रैप में नजर आ रहा है. वन विभाग इसे इस इलाके में कैराकल के लिए अच्छे माहौल का संकेत मान रहा है.
कैराकल के संरक्षण को लेकर धौलपुर वन विभाग और धौलपुर-करौली टाइगर रिजर्व की ओर से एक सेमिनार भी आयोजित किया गया. इसमें रणथंभौर की संस्था टाइगर वॉच के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर और वन्यजीव विशेषज्ञ डॉ. धर्मेंद्र खांडल ने वन विभाग के कर्मचारियों और वन्यजीव प्रेमियों को कैराकल के बारे में जानकारी दी.
डॉ. खांडल ने बताया कि देश में कैराकल का इलाका करीब 96 फीसदी तक घट चुका है. आजादी से पहले यह जानवर करीब 7.94 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में पाया जाता था. साल 2020 तक इसका क्षेत्र घटकर करीब 16,709 वर्ग किलोमीटर रह गया. अब इसकी बची हुई आबादी मुख्य रूप से राजस्थान के कुछ इलाकों में है.
उन्होंने बताया कि धौलपुर-करौली टाइगर रिजर्व के लैंडस्केप में धौलपुर के जंगल कैराकल के लिए खास जगह बनकर सामने आए हैं. यहां इसकी अच्छी संख्या मिलने की वजह से इसके संरक्षण पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है.
उड़ते पक्षियों को भी पकड़ लेता है
कैराकल देखने में छोटी जंगली बिल्ली और तेंदुए के बीच का जानवर लगता है. यह बेहद तेज और फुर्तीला होता है. इसकी खासियत है कि यह झाड़ियों में छिपकर अचानक पक्षियों पर झपटता है. कई बार यह हवा में उड़ते पक्षियों को भी छलांग लगाकर पकड़ लेता है. इसके अलावा खरगोश और दूसरे छोटे जानवर भी इसका भोजन हैं.
यह आमतौर पर अकेले अपना इलाका बनाकर रहता है. नर और मादा ज्यादातर समय अलग रहते हैं और जनवरी-फरवरी के आसपास ही साथ आते हैं. बच्चों की देखभाल मादा कैराकल करती है और उनके बड़े होने तक उनके साथ रहती है. वन विभाग ने कैराकल की मौजूदगी को देखते हुए जंगल में निगरानी और सुरक्षा बढ़ाने पर भी जोर दिया है, ताकि इस दुर्लभ प्रजाति को सुरक्षित रखा जा सके.
उमेश मिश्रा