मध्य प्रदेश के निवाड़ी जिले में जेरोन खालसा नगर परिषद की अध्यक्ष कुसुम मातादीन पस्तोर को मतदाताओं ने पद से हटाने का फैसला सुना दिया है. राइट टू रिकॉल के तहत हुए मतदान में कुर्सी खाली कराने के पक्ष में 2,633 वोट पड़े, जबकि कुर्सी के पक्ष में 2,167 वोट गिरे. 466 वोटों के अंतर से खाली कुर्सी जीत गई. कुल 7,799 मतदाताओं में से 61.52 प्रतिशत ने मतदान किया. यह परिणाम स्थानीय स्तर पर जवाबदेही का एक जीवंत उदाहरण है. कुसुम पस्तोर 2022 में चुनी गई थीं. पार्षदों ने उनके कामकाज और भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर प्रस्ताव पेश किया था. मध्य प्रदेश नगरपालिका अधिनियम, 1961 की धारा 47 के तहत यह प्रक्रिया चली. मतदान शांतिपूर्ण रहा. परिणाम के बाद आगे की आधिकारिक प्रक्रिया पूरी की जाएगी.
यह घटना एक बड़ा सवाल खड़ा करती है. जब नगर परिषद, नगर पंचायत और ग्राम पंचायत स्तर पर राइट टू रिकॉल का प्रावधान हो सकता है, तो सांसद और विधायकों के लिए क्यों नहीं? मध्य प्रदेश समेत कई राज्यों में स्थानीय निकायों के लिए यह कानून मौजूद है. मतदाता अपने चुने हुए प्रतिनिधि को कार्यकाल पूरा होने से पहले हटा सकते हैं. खाली और भरी कुर्सी के प्रतीक पर मतदान होता है. यह व्यवस्था जवाबदेही बढ़ाती है. प्रतिनिधि को पता रहता है कि पांच साल का इंतजार नहीं करना पड़ेगा. काम नहीं किया या आरोप लगे तो जनता बीच में ही फैसला सुना सकती है. जेरोन खालसा का मामला इसी बात को साबित करता है. पार्षदों की शिकायत और मतदाताओं के वोट ने अध्यक्ष को हटा दिया.
राष्ट्रीय स्तर पर ऐसा प्रावधान नहीं है. सांसद और विधायकों को हटाने का सामान्य तरीका केवल अगले चुनाव तक इंतजार करना या गंभीर कानूनी कार्रवाई है. अविश्वास प्रस्ताव सरकार के खिलाफ हो सकता है, लेकिन व्यक्तिगत सांसद या विधायक के खिलाफ मतदाताओं के पास सीधा अधिकार नहीं. संविधान सभा में भी इस विचार पर बहस हुई थी. कुछ नेताओं ने अस्थिरता का डर जताया था. बाद में निजी विधेयक आए, लेकिन पारित नहीं हुए. हाल में भी राज्यसभा में इस पर चर्चा हुई. आलोचकों का कहना है कि यह लोकतंत्र को अस्थिर कर देगा. बार-बार चुनाव होंगे. राजनीतिक विरोधियों द्वारा इसका दुरुपयोग होगा. खर्च बढ़ेगा.
ये तर्क गंभीर हैं, लेकिन पूरी तरह ठोस नहीं. स्थानीय स्तर पर अनुभव दिखाता है कि राइट टू रिकॉल अराजकता नहीं पैदा करता. मध्य प्रदेश में 2000 से यह प्रावधान है. कई बार प्रस्ताव आए, कुछ सफल हुए, कुछ असफल. मतदाताओं ने कई बार प्रतिनिधि को बनाए रखा. जेरोन खालसा में भी मतदान शांतिपूर्ण रहा और परिणाम साफ आया. अस्थिरता का डर तभी सही है जब प्रक्रिया आसान और बिना सुरक्षा के हो. उचित शर्तें लगाई जा सकती हैं. जैसे चुनाव के बाद न्यूनतम अवधि (डेढ़ या दो साल), एक निश्चित प्रतिशत मतदाताओं का प्रस्ताव, केवल गंभीर आधारों पर (भ्रष्टाचार, कर्तव्य में घोर लापरवाही), और प्रक्रिया में होने वाला खर्च और प्रशासनिक बोझ का समाधान भी संभव है.
सांसद और विधायक स्थानीय निकायों से ज्यादा महत्वपूर्ण होते हैं. वे कानून बनाते हैं, बजट पास करते हैं, बड़े फैसले करते हैं. यदि स्थानीय स्तर पर जनता को जवाबदेही का अधिकार है, तो राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर क्यों नहीं? पांच साल का लंबा कार्यकाल अक्सर गैर-जवाबदेही पैदा करता है. कई प्रतिनिधि चुनाव के बाद क्षेत्र में कम दिखते हैं. विकास कार्य रुक जाते हैं. भ्रष्टाचार के आरोप लगते हैं. मतदाता असहाय महसूस करते हैं. राइट टू रिकॉल इस स्थिति को बदल सकता है. यह प्रतिनिधि को लगातार सतर्क रखेगा. जनता को बीच में फैसला लेने का अधिकार देगा. लोकतंत्र सिर्फ पांच साल में एक बार वोट डालना नहीं है. यह निरंतर जवाबदेही भी है.
जेरोन खालसा का परिणाम इस बात का प्रमाण है कि मतदाता जिम्मेदारी से फैसला ले सकते हैं. 466 वोटों का अंतर छोटा नहीं है. 61.52 प्रतिशत मतदान हुआ. प्रक्रिया नियमों के अनुसार चली. यदि यही व्यवस्था सांसद और विधायकों पर लागू हो, तो कई समस्याएं कम हो सकती हैं. दुरुपयोग की आशंका को मजबूत प्रावधानों से रोका जा सकता है. अस्थिरता का तर्क तभी मान्य है जब हम मान लें कि जनता अस्थिर है. जेरोन खालसा ने दिखाया कि वह नहीं है.
सरकारों और राजनीतिक दलों को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए. स्थानीय निकायों का अनुभव उपलब्ध है. संविधान संशोधन या कानून के जरिए यह व्यवस्था लाई जा सकती है. शर्तें सख्त रखी जाएं. लेकिन अधिकार दिया जाए. जब ग्राम पंचायत और नगर परिषद के अध्यक्ष को हटाया जा सकता है, तो सांसद और विधायक को क्यों नहीं? जेरोन खालसा का फैसला सिर्फ एक नगर परिषद का नहीं, पूरे लोकतंत्र के लिए एक संकेत है. जवाबदेही का विस्तार नीचे से ऊपर तक होना चाहिए, तभी लोकतंत्र मजबूत होगा.
संयम श्रीवास्तव