राम मंदिर चंदा चोरी और भ्रष्टाचार के आरोपों में छोटी मछली को फंसाने और बड़ी को बचाने के आरोप लग रहे हैं, ऐेसे में सऊदी अरब की मक्का मस्जिद से जुड़े एक महा-घोटाले और फिर क्रैकडाउन का जिक्र जरूरी हो जाता है. मक्का ग्रैंड मस्जिद और उससे जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर घपले में जब सऊदी अरब की भ्रष्टाचार विरोधी संस्था 'नजाहा' और क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) ने हंटर चलाया, तो उसकी जद में देश के सबसे रसूखदार नाम आए. यह कोई मामूली कार्रवाई नहीं थी. इसमें सऊदी राजघराने के ताकतवर शाहजादे, अरबपति बिजनेसमैन और कई मंत्रालयों के पूर्व मंत्रियों को सीधे उनके आलीशान महलों से उठाकर रियाद की रित्ज़-कार्लटन होटल में बंद कर दिया गया था.
नवंबर 2017 में सऊदी अरब के शक्तिशाली क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) के एक सीधे आदेश पर मक्का ग्रैंड मस्जिद विस्तार प्रोजेक्ट में हुए अरबों डॉलर के घपले के खिलाफ एक अभूतपूर्व और आक्रामक मुहिम शुरू की गई. एंटी-करप्शन एजेंसी 'नजाहा' ने एक सख्त टाइमलाइन के तहत ताबड़तोड़ छापेमारी की. इस कार्रवाई में लगभग 50 मिलियन रियाल (13.3 मिलियन डॉलर) के सीधे गबन और फर्जी सब-कॉन्ट्रैक्ट्स के पुख्ता सुबूत हाथ लगे, जिसने पूरी व्यवस्था को हिलाकर रख दिया.
छोटे प्यादों पर ठीकरा बनाम असली 'किंगपिंस' पर वार
आज जब हम अयोध्या राम मंदिर मामले को देखते हैं, तो वहां एक अलग ही तस्वीर नजर आ रही है. इस मामले में गंभीर आरोप लग रहे हैं कि जांच एजेंसियां केवल कैश काउंटिंग स्टाफ या ट्रस्टियों के ड्राइवरों जैसे छोटे कर्मचारियों के सिर पर ही पूरा ठीकरा फोड़कर मामला रफा-दफा करने की कोशिश कर रही हैं. पर्दे के पीछे बैठे बड़े चेहरों तक जांच की आंच नहीं पहुंच पा रही है.
लेकिन, मक्का करप्शन केस की कहानी इससे बिल्कुल उलट थी. वहां भी कार्रवाई की शुरुआत भले ही निचले स्तर के छोटे कर्मचारियों से हुई थी, लेकिन सऊदी सरकार का मकसद सिर्फ उन्हें फंसाकर बैठ जाना नहीं था. क्राउन प्रिंस MBS की पूरी रणनीति इस महा-घोटाले के असली किंगपिन मुख्य साजिशकर्ताओं और सरगनाओं को दबोचने की थी. दुनिया ने हैरान होकर देखा कि कैसे जांच की सुई छोटे कर्मचारियों से घूमती हुई सीधे देश के सबसे रसूखदार कंस्ट्रक्शन घराने सऊदी बिन लादेन ग्रुप और खुद सऊदी राजघराने के रसूखदार शाहजादों तक पहुंच गई.
मक्का प्रोजेक्ट महा-घोटाले के कुछ सबसे वीआईपी आरोपी:
1. बक्र बिन लादेन (Bakr bin Laden) सऊदी अरब के सबसे बड़े कंस्ट्रक्शन साम्राज्य 'सऊदी बिन लादेन ग्रुप' के चेयरमैन और सर्वेसर्वा थे. (इनका एक परिचय यह भी है कि ये अलकायदा आतंकी ओसामा बिन लादेन के सौतेले भाई हैं)
क्या था रोल: मक्का ग्रैंड मस्जिद के विस्तार का मुख्य कांट्रेक्ट इसी कंपनी के पास था. बक्र बिन लादेन पर मक्का प्रोजेक्ट के फंड्स में भारी हेराफेरी करने, फर्जी बिल पास कराने और अफसरों को मोटी रिश्वत देने के सीधे आरोप थे. इस क्रैकडाउन में इन्हें गिरफ्तार किया गया और सरकार ने इनकी कंपनी की 35% हिस्सेदारी अपने कब्जे में ले ली.
2. प्रिंस मिसाल बिन अब्दुल्लाह (Prince Mishaal bin Abdullah) सऊदी अरब के पूर्व किंग अब्दुल्लाह के बेटे हैं और सबसे बड़ी बात यह कि ये मक्का प्रॉविंस के गवर्नर भी रह चुके थे.
क्या था रोल: मक्का के गवर्नर पद पर रहते हुए इनके कार्यकाल में ही ग्रैंड मस्जिद और शहर के इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दी गई थी. इन पर अपने पद का दुरुपयोग करने और मक्का के विकास कार्यों के बजट में वित्तीय गड़बड़ी करने के गंभीर आरोप थे.
3. प्रिंस तुर्की बिन अब्दुल्लाह (Prince Turki bin Abdullah) भी पूर्व किंग अब्दुल्लाह के बेटे और रियाद प्रांत के पूर्व गवर्नर थे.
क्या था रोल: राजघराने के बेहद ताकतवर शाहजादों में शुमार प्रिंस तुर्की पर मक्का और रियाद के बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स (जैसे रियाद मेट्रो और मक्का से जुड़े टेंडर्स) में अरबों रुपये के गबन और घूसखोरी का आरोप था. इन्हें लंबे समय तक हिरासत में रखा गया.
4. आदिल फकीह (Adel Fakeih) सऊदी अरब के बेहद रसूखदार इकोनॉमी और प्लानिंग मिनिस्टर थे. इससे पहले ये जेद्दा के मेयर और लेबर मिनिस्टर भी रह चुके थे.
क्या था रोल: मक्का और उसके आस-पास के पवित्र क्षेत्रों में ड्रेनेज सिस्टम, सीवरेज और अन्य बड़े प्रोजेक्ट्स के टेंडर पास करने में इनकी मुख्य भूमिका थी. इन पर कंपनियों को अवैध तरीके से फायदा पहुंचाने और मक्का-जेद्दा इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में भारी घपला करने के आरोप में पद से हटाकर गिरफ्तार किया गया था.
5. इब्राहिम अब्दुलअजीज अल-असाफ (Ibrahim Abdulaziz Al-Assaf) सऊदी अरब के बेहद कद्दावर पूर्व वित्त मंत्री थे, जो करीब 20 साल तक इस पद पर रहे थे.
क्या था रोल: मक्का ग्रैंड मस्जिद विस्तार के लिए जो अरबों डॉलर का सरकारी फंड इन्हीं के कार्यकाल में रिलीज हुआ था. इन पर मक्का प्रोजेक्ट में रियल एस्टेट और जमीन अधिग्रहण मामलों में अपने पद का फायदा उठाकर हेराफेरी करने का आरोप लगा था.
6. खालिद अल-तुवैजरी (Khaled al-Tuwaijri) सऊदी रॉयल कोर्ट के पूर्व चीफ थे. किंग अब्दुल्लाह के समय इन्हें सऊदी अरब का सबसे ताकतवर प्रशासनिक अफसर माना जाता था.
क्या था रोल: रॉयल कोर्ट के मुखिया के तौर पर मक्का के सभी मेगा प्रोजेक्ट्स की फाइलें इन्हीं की टेबल से होकर गुजरती थीं. इन पर अरबों डॉलर की घूसखोरी और मक्का प्रोजेक्ट के फंड को विदेशी शेल कंपनियों में ट्रांसफर करने के गंभीर आरोप थे.
इस बड़े सिंडिकेट का भंडाफोड़ कैसे हुआ?
इन रसूखदार सरगनाओं को पकड़ना आसान नहीं था क्योंकि इन्होंने अपनी काली कमाई को छुपाने के लिए बेहद पेचीदा जाल बुन रखा था. लेकिन जांच एजेंसी 'नजाहा' ने इस चक्रव्यूह को तोड़ने के लिए आधुनिक और कड़े तरीके अपनाए:
इंटरनेशनल फाइनेंशियल ऑडिट: जांचकर्ताओं ने पुराने ढर्रे को छोड़कर सीधे इन किंगपिंस के माली साम्राज्य (फाइनेंशियल नेटवर्क) पर हमला किया. डिजिटल बैंकिंग और विदेशी मुद्रा के लेन-देन को खंगाला गया. इससे उन शेल कंपनियों (फर्जी कंपनियों) का सुराग मिला जिन्हें रिश्वत का पैसा ठिकाने लगाने के लिए विदेशों में खड़ा किया था.
व्हिसलब्लोअर्स की गवाही: मक्का में खराब कंस्ट्रक्शन के कारण जब कुछ हादसे हुए, तो जांच का शिकंजा और कस गया. अपनी चमड़ी बचाने और कानूनी कार्रवाई से बचने के लिए इन किंगपिंस के मातहत काम करने वाले कुछ सह-आरोपी खुद 'व्हिसलब्लोअर' बन गए. उन्होंने सरकारी गवाह बनकर सीधे उन मंत्रियों और उद्योगपतियों के नाम उगल दिए जो इस पूरे सिंडिकेट के आका थे.
गुनाहगारों से वसूली और उनका हश्र
क्राउन प्रिंस MBS ने पूरी दुनिया को यह साफ संदेश दिया कि सऊदी अरब में अब रसूख या शाही खून के दम पर बचना नामुमकिन है. 'जवाबदेही' और 'वसूली' तय करने के लिए बेहद सख्त कदम उठाए गए:
कंपनी का सरकारीकरण: सरकार ने बिन लादेन ग्रुप के मुख्य मालिकों पर कानूनी शिकंजा कसते हुए कंपनी की 35% हिस्सेदारी जब्त कर ली और उसका मैनेजमेंट अपने हाथों में ले लिया.
अरबों की जायदाद फ्रीज: मुख्य आरोपियों के सिर्फ बैंक खाते ही सील नहीं किए गए, बल्कि उनके आलीशान विला, प्राइवेट जेट और देश-विदेश में मौजूद तमाम संपत्तियों को कुर्क कर सीधे सरकारी खजाने में डाल दिया गया. इस पूरे क्रैकडाउन से सऊदी सरकार ने राजघराने के दिग्गजों और बड़े कॉर्पोरेट्स से लगभग $100 बिलियन (करीब 8.3 लाख करोड़ रुपये) की भारी-भरकम रिकवरी की.
कठोर कारावास: जो रसूखदार खुद को कानून से ऊपर समझते थे और जिन्होंने सरकार के सामने सरेंडर करने या लूटा हुआ पैसा लौटाने (फाइनेंशियल सेटलमेंट) से इनकार कर दिया, उन्हें 10 साल तक की सख्त जेल की सजा सुनाई गई.
मक्का का यह क्रैकडाउन दुनिया के लिए एक नजीर बना कि जब शीर्ष नेतृत्व की नीयत साफ और सख्त हो, तो जांच सिर्फ छोटे प्यादों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि भ्रष्टाचार की कमान संभालने वाले सबसे बड़े 'किंगपिंस' को भी घुटनों पर लाकर उनसे कौड़ी-कौड़ी वसूली जाती है.
धीरेंद्र राय