पंजाब CMO की जांच; सियासत और संवैधानिकता का सवाल

ईडी ने पंजाब के डीजीपी गौरव यादव को तीन पत्र लिखे थे. ये पत्र जीएमएडीए भूमि आवंटन से जुड़े मनी-लॉन्ड्रिंग मामले की जांच के दौरान जब्त सामग्री पर आधारित बताए गए. पत्रों में मुख्यमंत्री कार्यालय से जुड़े एक संगठित रिश्वतखोरी नेटवर्क का आरोप लगाया गया.

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ईडी के पत्रों में मुख्यमंत्री कार्यालय से जुड़े एक संगठित रिश्वतखोरी नेटवर्क का आरोप लगाया गया. (Photo: ITG) ईडी के पत्रों में मुख्यमंत्री कार्यालय से जुड़े एक संगठित रिश्वतखोरी नेटवर्क का आरोप लगाया गया. (Photo: ITG)

संयम श्रीवास्तव

  • नई दिल्ली,
  • 06 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 8:38 AM IST

पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट का 5 अक्टूबर 2026 का आदेश पंजाब की सियासत और प्रशासनिक विश्वसनीयता दोनों के लिए एक गंभीर मोड़ है. मुख्य न्यायाधीश अश्वनी कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति रोहित कपूर की खंडपीठ ने प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के पत्रों में दर्ज कथित भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच सीबीआई को सौंप दी है. अदालत ने सीबीआई को आपराधिक मामला दर्ज करने और दो महीने के भीतर स्थिति रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया है. साथ ही राज्य सरकार और पंजाब पुलिस को जांच में पूरा सहयोग देने को कहा गया है. यह फैसला अधिवक्ता निखिल सर्राफ की जनहित याचिका पर आया, जिसमें आरोप था कि ईडी के औपचारिक पत्रों के बावजूद राज्य पुलिस ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की.

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ईडी ने जुलाई और अगस्त 2026 के बीच पंजाब के डीजीपी गौरव यादव को तीन पत्र लिखे थे. ये पत्र जीएमएडीए भूमि आवंटन से जुड़े मनी-लॉन्ड्रिंग मामले की जांच के दौरान जब्त सामग्री पर आधारित बताए गए. पत्रों में मुख्यमंत्री कार्यालय से जुड़े एक संगठित रिश्वतखोरी नेटवर्क का आरोप लगाया गया. मुख्यमंत्री भगवंत मान के ओएसडी सहित कई लोगों का नाम लिया गया था. आरोप है कि ये लोग ट्रांसफर-पोस्टिंग, अनुकूल नीतियों, टेंडर आवंटन, चेंज ऑफ लैंड यूज (सीएलयू) मंजूरी, शस्त्र लाइसेंस और गोपनीय फाइलों के लीक के बदले नकद और रियल एस्टेट के रूप में करोड़ों रुपये वसूल रहे थे. आईएएस-आईपीएस पोस्टिंग तक प्रभावित करने की बात कही गई. ये आरोप अभी साबित नहीं हुए हैं, पर इनकी गंभीरता और राज्य एजेंसियों की कथित निष्क्रियता ने अदालत को स्वतंत्र जांच की जरूरत महसूस कराई.

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अदालत का यह रुख प्रशासनिक जवाबदेही की बुनियादी अपेक्षा को रेखांकित करता है. जब केंद्र की एजेंसी औपचारिक रूप से साक्ष्य साझा करती है और राज्य पुलिस कार्रवाई से बचती है, तो विश्वास का संकट पैदा होता है. हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि निष्पक्ष और पारदर्शी जांच आवश्यक है. पंजाब पुलिस की भूमिका पर असंतोष जताते हुए मामले को सीबीआई को सौंपना इस बात का संकेत है कि स्थानीय व्यवस्था पर अदालत को भरोसा नहीं रहा. आम आदमी पार्टी की सरकार भ्रष्टाचार के प्रति शून्य सहनशीलता का दावा करती रही है. उसके मुख्यमंत्री कार्यालय से जुड़े करीबी पर ऐसे आरोप और पुलिस की निष्क्रियता इस दावे की परीक्षा कर रहे हैं. मुख्यमंत्री मान ने पहले इन आरोपों को निराधार बताया था, पर अदालत के आदेश के बाद राजनीतिक बचाव और कानूनी चुनौती दोनों एक साथ चल रहे हैं.

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राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट जाने का ऐलान कर दिया है. तर्क यह है कि 2020 में कांग्रेस सरकार ने सीबीआई को सामान्य सहमति वापस ले ली थी, इसलिए बिना सहमति जांच नहीं हो सकती. यह तकनीकी तर्क संघीय ढांचे की बहस को जिंदा करता है. कई राज्यों ने राजनीतिक कारणों से सीबीआई की सामान्य सहमति वापस ली हुई है. पर जब हाईकोर्ट स्वयं स्वतंत्र जांच का आदेश देता है और राज्य पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाता है, तो सहमति का हवाला केवल प्रक्रियागत ढाल बनकर रह जाता है. सुप्रीम कोर्ट को यह तय करना होगा कि अदालती आदेश और राज्य की सहमति के बीच संतुलन कहां है? यदि हर गंभीर आरोप पर सहमति का अभाव जांच रोक दे, तो भ्रष्टाचार के मामलों में केंद्रीय एजेंसियों की भूमिका सीमित हो जाएगी. दूसरी ओर, बिना पर्याप्त आधार के बार-बार ऐसे मामले सीबीआई को सौंपना संघवाद के ढांचे को कमजोर भी कर सकता है. इस मामले में आधार ईडी के पत्र और पुलिस की निष्क्रियता दोनों हैं, इसलिए अदालत का हस्तक्षेप असाधारण नहीं लगता.

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राजनीतिक दृष्टि से यह घटना 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले आप सरकार के लिए असुविधाजनक है. विपक्षी दल, खासकर भाजपा और अकाली दल, इसे  शून्य सहनशीलता के दावे की पोल खोलने वाला बता रहे हैं. आरोप अभी जांच के अधीन हैं, इसलिए इन्हें सिद्ध मान लेना जल्दबाजी होगी. पर ओएसडी स्तर पर ट्रांसफर-पोस्टिंग और सीएलयू जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में रिश्वत के नेटवर्क की बात प्रशासनिक संस्कृति पर सवाल खड़े करती है. पंजाब में भूमि उपयोग, शस्त्र लाइसेंस और पोस्टिंग लंबे समय से विवादों के केंद्र रहे हैं. यदि सीबीआई की जांच में आरोपों का कोई आधार निकलता है, तो यह केवल व्यक्तियों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह पूरे शासन मॉडल की साख पर असर डालेगा. यदि आरोप निराधार साबित होते हैं, तो ईडी और याचिकाकर्ता की मंशा पर भी सवाल उठेंगे. दोनों स्थितियों में पारदर्शिता जरूरी है.

इस प्रकरण से दो बड़े सबक निकलते हैं. पहला, राज्य पुलिस और सतर्कता ब्यूरो को राजनीतिक प्रभाव से मुक्त रखने की संस्थागत व्यवस्था मजबूत करनी होगी. जब आरोप स्वयं मुख्यमंत्री कार्यालय से जुड़े हों, तो स्थानीय जांच की विश्वसनीयता स्वतः संदिग्ध हो जाती है. दूसरा, केंद्र और राज्य एजेंसियों के बीच सूचना साझा करने की प्रक्रिया को औपचारिक और समयबद्ध बनाया जाए, ताकि पत्रों पर चुप्पी साधने की गुंजाइश न रहे. हाईकोर्ट का दो महीने का समयसीमा तय करना इसी दिशा में एक कदम है.

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अंततः यह मामला कानून के शासन की परीक्षा है. आरोप गंभीर हैं, पर वे आरोप ही हैं. सीबीआई को बिना पूर्वाग्रह के जांच करनी होगी और अदालत को रिपोर्ट पर नजर रखनी होगी. राजनीतिक दलों को इसे केवल चुनावी हथियार बनाने से बचना चाहिए. पंजाब के मतदाता भ्रष्टाचार विरोधी वादों पर सरकार चुनते रहे हैं. यदि उन वादों के केंद्र में ही संदेह के बादल छा जाते हैं, तो जवाबदेही केवल अदालती आदेशों से नहीं, बल्कि शासन की रोजमर्रा की पारदर्शिता से ही बहाल हो सकती है. अगले दो महीने इस दिशा में निर्णायक साबित हो सकते हैं.

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