हर 25 साल का दौर इंसान की जिंदगी में अपनी सफलताओं और नाकामियों के मेल से एक बड़ा बदलाव लेकर आता है. उतार-चढ़ाव के इस कुदरती नियम से कोई भी अछूता नहीं है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इसका अपवाद नहीं हैं. 2001 में एक नए-नवेले प्रशासक से लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर असर रखने वाले एक समझदार नेता के रूप में उनका उभार बहुत शानदार रहा है. किसी भी आम इंसान की तरह उन्होंने खुशी और गम, सफलता और असफलता दोनों देखी हैं. लेकिन आखिरकार वे अपनी हिम्मत, अटूट विश्वास और काफी हद तक अपनी अच्छी किस्मत के दम पर एक बड़े नेता बनकर उभरे.
अगर 2001 में भूकंप ने भुज और सौराष्ट्र के इलाकों को तबाह न किया होता, तो नरेंद्र मोदी की कहानी कुछ और होती. गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल, जो उस समय राज्य में बीजेपी के सबसे बड़े नेता थे, उनके बारे में माना गया कि वे राहत काम को ठीक से नहीं संभाल पाए. इससे केंद्रीय नेतृत्व, यानी प्रधानमंत्री वाजपेयी और गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी काफी नाराज हुए.
केशुभाई की नाकामी के ठीक उलट, बीजेपी के तत्कालीन राष्ट्रीय महामंत्री नरेंद्र मोदी ने कुछ ही इलाकों में सही, पर बहुत ही शानदार तरीके से राहत काम चलाया. यह फर्क इतना साफ था कि इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता था. कच्छ और सौराष्ट्र को दोबारा खड़ा करने के लिए केशुभाई को हटाना पहली जरूरत बन गया था और मोदी ही इकलौते ऐसे इंसान दिख रहे थे जो इस मुश्किल काम की जिम्मेदारी उठा सकते थे. मुख्यमंत्री की कुर्सी पर उनका आना कुदरती तबाही, इंसानी त्रासदी और राज्य सरकार की नाकामी के साये के बीच हुआ था.
पहले दिन से ही मोदी शासन चलाने की पेचीदगियों को लेकर चौकस थे. उन्होंने कच्छ और सौराष्ट्र में राहत, पुनर्वास और निर्माण का एक बड़ा कार्यक्रम शुरू किया, और साथ ही सरकार की मशीनरी को समझने में जुट गए. एक नेता के रूप में वे गुजरात की समस्याओं को अच्छी तरह जानते थे, लेकिन एक प्रशासक के रूप में उन्होंने कभी उनका सामना नहीं किया था. वह सीख उन्हें किसी और रास्ते पर ले जा सकती थी, अगर 2002 में गोधरा में ट्रेन में आग लगने की घटना और उसके बाद हुए दंगे न होते.
इन घटनाओं ने उनकी राह ही बदल दी. कई लोगों ने उनकी खूब बुराई की तो कुछ ने उन्हें सर-आंखों पर बिठाया और यह सब अकसर उन बनी-बनाई धारणाओं पर हुआ जो दोनों तरफ की राजनीति को सूट करती थीं. उनके समर्थकों का तर्क है कि उनके खिलाफ चलाए गए तीखे अभियान के शोर में उनका अपना दर्द दबकर रह गया.
उन्होंने इस उथल-पुथल का डटकर सामना किया और 2002 के विधानसभा चुनावों के बाद गुजरात के विकास पर ध्यान दिया. उन्होंने 'आपणु गुजरात, आगवू गुजरात' (हमारा गुजरात, अनोखा गुजरात) के नारे के साथ बहुत सोच-समझकर 'ब्रांड गुजरात' का अभियान शुरू किया. इसके पीछे संदेश यह था कि यह राज्य विकास का एक नया मॉडल पेश करेगा. उनका इकलौता मकसद गुजरात के डेवलपमेंट मॉडल को पूरे देश के लिए एक मिसाल बनाना था.
दिल्ली में राष्ट्रीय विकास परिषद (एनडीसी) की बैठकों में मोदी के भाषण सबसे बड़े आकर्षण का केंद्र होते थे. लोग उनके अंदाज़ से ज्यादा उनके भाषण के मुद्दों और विचारों की तारीफ करते थे. उन्होंने अहमदाबाद की शक्ल बदल दी, बिजली के बेहद मुश्किल क्षेत्र में सुधार किए और राज्य के दूर-दराज के इलाकों तक पानी पहुंचाया. उन्होंने उन कामों को पूरा करके दिखाया जिन्हें पहले नामुमकिन माना जाता था.
खास बात यह है कि मोदी ने गुजरात की यह छवि उस समय बनाई जब उनके समर्थकों के मुताबिक, मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार उनसे सख्त नफरत करती थी. उनका आरोप है कि राजनीतिक कारणों से उनके और उनके साथियों के खिलाफ मामले दर्ज किए गए, उनके तत्कालीन गृह मंत्री अमित शाह को जेल भेजा गया और केंद्र ने राज्य की नौकरशाही के एक हिस्से को सरकार के खिलाफ बगावत करने के लिए उकसाया. इन आरोपों के बारे में कोई कुछ भी सोचे, पर सच यह है कि उन्होंने एक बेहद विरोधी राजनीतिक माहौल के बीच 'ब्रांड गुजरात' का निर्माण किया.
मोदी ने 2012 का विधानसभा चुनाव जीतने के बाद ही राष्ट्रीय स्तर की राजनीति में आने के संकेत दिए. राष्ट्रीय स्तर पर एक खालीपन साफ दिख रहा था. एक तरफ जहां यूपीए सरकार भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी हुई थी, वहीं दूसरी तरफ आरएसएस और बीजेपी को एक ऐसे मजबूत चेहरे की सख्त जरूरत थी जो वोटरों को एकजुट कर सके. 2014 के लोकसभा चुनाव के लिए मोदी ही सबसे स्वाभाविक पसंद थे.
प्रधानमंत्री के रूप में उनके 12 से ज्यादा सालों के कार्यकाल में कई उतार-चढ़ाव आए हैं. 2014 में बीजेपी का अपने दम पर बहुमत हासिल करना एक बड़ा सरप्राइज था. 2019 में पार्टी ने अपना प्रदर्शन और सुधारा, जो एक नेता के रूप में मोदी की बढ़ती लोकप्रियता का सबूत था. 2024 में अपने दम पर बहुमत खोने से यह साफ हो गया कि उनकी लोकप्रियता को थोड़ा झटका लगा है, लेकिन इसके तुरंत बाद उन्होंने पांच राज्यों में बड़ी जीत हासिल की.
बीता हुआ कल तो बस एक शुरुआत है और मोदी भविष्य को लेकर भी बेफिक्र नहीं हैं. वे 2047 का एजेंडा तय कर रहे हैं और एक ऐसे भारत का सपना देख रहे हैं जो दुनिया के विकसित देशों में गिना जाए. अंतरराष्ट्रीय घटनाओं से घरेलू अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले असर की वजह से उनके सामने आने वाली चुनौतियां इस काम को बेहद मुश्किल बनाएंगी. लेकिन अपने पुराने अंदाज की तरह, वे सीधे मुश्किलों का सामना करने से पीछे नहीं हटते.
लगातार 25 सालों तक सरकार चलाना एक बहुत बड़ी उपलब्धि है और मोदी को भगवान जैसा दर्जा देने की कोशिश इस उपलब्धि के महत्व को कम ही करती है. उनकी ताकत को बेहद सरल शब्दों में ऐसे समझा जा सकता है. सालों की कड़ी मेहनत, हिम्मत और विश्वास के दम पर उन्होंने जनता के बीच 'भरोसे का एक बड़ा खजाना' बनाया है, जो आज भी कायम है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं)
अजय सिंह