ग्लेशियरों की कीमत कौन देगा? नेपाल से जलवायु न्याय की पुकार

नेपाल में आई आपदा के बाद सहायता के बजाय 'जलवायु मुआवजे' की मांग ने 'क्लाइमेट जस्टिस' की बहस को तेज कर दिया है. नगण्य उत्सर्जन करने वाले विकासशील देश ऐतिहासिक रूप से जिम्मेदार बड़े उत्सर्जक देशों से 'पोल्यूटर पे प्रिंसिपल' के तहत जवाबदेही मांग रहे हैं.

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नेपाल आपदा के बीच मुआवजे की मांग.( Photo: ITG) नेपाल आपदा के बीच मुआवजे की मांग.( Photo: ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 05 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 10:18 AM IST

नेपाल में हाल ही में आई विनाशकारी बाढ़ और हिमनद टूटने की घटना के बाद नेपाल सरकार ने पारंपरिक 'मानवीय सहायता' के बजाय प्रमुख वैश्विक उत्सर्जक देशों से 'जलवायु मुआवजे' की मांग की है, जिसे जलवायु न्याय (क्लाइमिट जस्टिस) से जोड़कर देखा जा रहा है. नेपाल का तर्क है कि वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में उसका योगदान नगण्य है, फिर भी उसे जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालयी क्षेत्रों में पिघलते ग्लेशियरों और आपदाओं की भारी कीमत चुकानी पड़ रही है. जलवायु परिवर्तन अब केवल पर्यावरण का संकट नहीं रह गया है. यह समानता, विकास और वैश्विक न्याय का सवाल बन चुका है. दुनिया के जिन देशों और समुदायों का ऐतिहासिक रूप से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में योगदान कम रहा है, वे अक्सर जलवायु आपदाओं का अधिक गंभीर असर झेल रहे हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि जलवायु परिवर्तन से हुए नुकसान के लिए विकसित और अधिक उत्सर्जन करने वाले देशों की भूमिका क्या होनी चाहिए. मुआवजा देने की या सहायता प्रदान करने की? इसी सवाल के केंद्र में क्लाइमेट जस्टिस यानी जलवायु न्याय की अवधारणा है. जलवायु न्याय का मूल तर्क है कि जलवायु संकट का बोझ उन लोगों पर असमान रूप से नहीं डाला जा सकता, जिनकी इस संकट को पैदा करने में भूमिका अपेक्षाकृत कम रही है.

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जलवायु विज्ञान बताता है कि मानव गतिविधियों से बढ़ी ग्रीनहाउस गैसों ने वैश्विक तापमान में वृद्धि की है और अनेक जलवायु संबंधी खतरों की आवृत्ति, तीव्रता और अवधि बढ़ाई है. इसका परिणाम केवल बाढ़, चक्रवात, सूखा और गर्मी की लहरों तक सीमित नहीं है. समुद्र-स्तर में वृद्धि, कृषि उत्पादकता में कमी, जल संकट, जैव विविधता का नुकसान और लोगों का विस्थापन भी इसका हिस्सा हैं.  यहां एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक अवधारणा सामने आती है- लॉस एंड डैमेज यानी हानि और क्षति. जब कोई समाज जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से बचने या उन्हें कम करने के लिए अनुकूलन के उपाय कर चुका हो, फिर भी कुछ नुकसान अपरिहार्य रह जाएं, तो उसे हानि और क्षति के दायरे में रखा जाता है. इसमें आर्थिक नुकसान के साथ-साथ ऐसे नुकसान भी शामिल हैं, जिन्हें रुपये-पैसे में आसानी से नहीं मापा जा सकता. जैसे सांस्कृतिक विरासत, पारंपरिक 
जीवन-पद्धति, समुदायों का विस्थापन और जैव विविधता. यही वह बिंदु है जहां मुआवजा बनाम सहायता की बहस महत्वपूर्ण हो जाती है.

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सहायता और मुआवजे में मूल अंतर

जलवायु वित्त की मौजूदा व्यवस्था में विकसित देशों की ओर से विकासशील देशों को अनुदान, ऋण, तकनीकी सहायता, क्षमता निर्माण और आपदा जोखिम प्रबंधन जैसी मदद दी जाती रही है. इसे सामान्यतः सहायता या वित्तीय सहयोग कहा जाता है. मुआवजे का विचार इससे अलग है. इसमें तर्क दिया जाता है कि यदि किसी देश या कंपनी की ऐतिहासिक गतिविधियों से उत्पन्न उत्सर्जन ने जलवायु परिवर्तन को बढ़ाने में योगदान दिया और उसके कारण दूसरे समाज को प्रमाणित नुकसान हुआ, तो उस नुकसान की भरपाई में जिम्मेदार पक्ष की भूमिका होनी चाहिए. आईपीसीसी के अनुसार जलवायु हानि-क्षति के संदर्भ में दायित्व और कानूनी मुआवजा अभी भी विवादित विषय हैं. यानी सहायता को नैतिक या विकासात्मक सहयोग के रूप में देखा जा सकता है, जबकि मुआवजा जिम्मेदारी और न्याय के प्रश्न को सामने लाता है.

जलवायु न्याय की बहस में एक महत्वपूर्ण विचार है- पोल्यूटर पे प्रिंसिपल, अर्थात जिसने प्रदूषण किया, वह उसकी कीमत चुकाए. इसके साथ ‘क्षमता के अनुसार भुगतान’ और ‘लाभार्थी भुगतान करे’ जैसे सिद्धांत भी चर्चा में रहे हैं. लेकिन जलवायु परिवर्तन के मामले में इसे लागू करना आसान नहीं है. आखिर किसी एक बाढ़ या चक्रवात में हुए नुकसान के लिए किस देश की कितनी जिम्मेदारी तय की जाए? वर्तमान आपदा में प्राकृतिक परिवर्तन और मानव-जनित जलवायु परिवर्तन की भूमिका को किस अनुपात में बांटा जाए? किसी किसान की फसल बर्बाद होने पर ऐतिहासिक वैश्विक उत्सर्जन का हिस्सा कैसे निर्धारित किया जाए? यही क्लाइमिट  ऐट्रिब्यूशन साइंस यानी जलवायु घटना-आरोपण विज्ञान उपयोगी हो रहा है. वैज्ञानिक अध्ययन अब ये आकलन करने में सक्षम हो रहे हैं कि किसी चरम मौसम की घटना में मानव-जनित जलवायु परिवर्तन की भूमिका कितनी रही. हालांकि इसे सीधे कानूनी दायित्व में बदलना अभी भी जटिल है. आईपीसीसी ने भी माना है कि वैज्ञानिक एट्रिब्यूशन विकसित हो रहा है और भविष्य में कारण और मुआवजे के प्रश्न को समझने में इसकी भूमिका बढ़ सकती है.
 
गरीब देशों की दुविधा

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विकासशील देशों के सामने दोहरी चुनौती है. उन्हें एक तरफ भविष्य के जलवायु जोखिमों से बचने के लिए अनुकूलन करना है, वहीं दूसरी तरफ पहले से हो चुकी क्षति से निपटना है. उदाहरण के लिए किसी तटीय देश को समुद्र-स्तर बढ़ने से बचाने के लिए बांध बनाने पड़ सकते हैं. यह अनुकूलन है. लेकिन यदि समुद्र के बढ़ते स्तर के कारण कोई पूरा द्वीप या तटीय समुदाय रहने योग्य नहीं रह जाता, तो केवल बांध या बीमा पर्याप्त समाधान नहीं होगा. वहां लोगों का विस्थापन, जमीन, संस्कृति और सामुदायिक पहचान का नुकसान भी होगा. आईपीसीसी ने विशेष रूप से छोटे द्वीपीय देशों के संदर्भ में ऐसे आर्थिक और गैर-आर्थिक नुकसान की गंभीरता को रेखांकित किया है. इसलिए विकासशील देशों का तर्क है कि जलवायु वित्त को केवल भविष्य की परियोजनाओं के लिए सहायता तक सीमित नहीं किया जा सकता. वर्तमान और अपरिहार्य नुकसान के लिए भी अलग वित्तीय व्यवस्था चाहिए.

जलवायु कूटनीति में बड़ा बदलाव तब आया जब कॉप 27 में विकासशील देशों की जलवायु-जनित हानि और क्षति के लिए वित्तीय व्यवस्था बनाने पर सहमति बनी. इसके बाद कॉप 28 में लॉस एंड डैमेज को संचालित करने की दिशा में महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया. यह व्यवस्था जलवायु न्याय की बहस में इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे पहली बार नुकसान और क्षति को संबोधित करने के लिए एक विशिष्ट वैश्विक वित्तीय ढांचे को संस्थागत रूप देने की दिशा मजबूत हुई. कॉप 29 के दौरान भी फंड के संचालन और वित्तीय व्यवस्था से जुड़े विषय एजेंडे में प्रमुख रहे. हालांकि एक मूल सवाल अब भी कायम है- इस फंड में पैसा कितना आएगा और किस रूप में आएगा? यदि पैसा केवल स्वैच्छिक सहायता के रूप में आएगा, तो विकासशील देशों के लिए वित्त की उपलब्धता अनिश्चित रह सकती है. इसके विपरीत, यदि इसे जलवायु जिम्मेदारी और न्याय से जोड़कर अधिक स्थायी वित्तीय स्रोतों से बनाया जाए, तो इसकी विश्वसनीयता और प्रभावशीलता बढ़ सकती है.

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जलवायु न्याय का अर्थ यह नहीं कि हर जलवायु आपदा के बाद केवल मुआवजा दिया जाए. सबसे प्रभावी जलवायु नीति के तीन स्तर होने चाहिए- उत्सर्जन में कमी, अनुकूलन और हानि-क्षति का समाधान. पहला और सबसे महत्वपूर्ण उपाय है उत्सर्जन को तेजी से कम करना. क्योंकि आज जितना अधिक उत्सर्जन होगा, भविष्य में उतना ही अधिक अनुकूलन और हानि-क्षति का बोझ बढ़ेगा. आईपीसीसी के अनुसार अधिक महत्वाकांक्षी जलवायु शमन से भविष्य में अनुकूलन की आवश्यकता और अपेक्षित हानि-क्षति दोनों को कम किया जा सकता है. दूसरा है अनुकूलन- मजबूत बुनियादी ढांचा, जल संरक्षण, जलवायु-सहनीय कृषि, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली और सामाजिक सुरक्षा. तीसरा है उन नुकसानों की भरपाई या सहायता, जिन्हें अनुकूलन के बावजूद टाला नहीं जा सकता.

भारत की स्थिति विशेष रूप से महत्वपूर्ण है. यहां बड़ी आबादी कृषि, तटीय क्षेत्रों, पहाड़ी पारिस्थितिकी और अनौपचारिक रोजगार पर निर्भर है. अत्यधिक गर्मी, अनियमित वर्षा, बाढ़, सूखा और चक्रवात का प्रभाव गरीब परिवारों पर अपेक्षाकृत अधिक पड़ सकता है. ऐसे में जलवायु वित्त का उपयोग केवल बड़ी परियोजनाओं तक सीमित नहीं होना चाहिए. छोटे किसानों, मछुआरों, दिहाड़ी मजदूरों, महिलाओं और जलवायु-प्रभावित समुदायों तक वित्तीय सुरक्षा पहुंचाना भी जलवायु न्याय का हिस्सा होना चाहिए. साथ ही भारत जैसे देशों के लिए यह भी जरूरी है कि विकसित देशों से जलवायु वित्त की मांग करते समय सहायता और मुआवजे के बीच अंतर को स्पष्ट रखा जाए. विकास के लिए वित्त, उत्सर्जन घटाने के लिए वित्त और अपरिहार्य हानि-क्षति के लिए वित्त- इन तीनों को एक ही खाते में मिलाने से वास्तविक जरूरत छिप सकती है.

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जलवायु न्याय की वास्तविक कसौटी केवल यह नहीं होगी कि अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में कितने अरब डॉलर की घोषणा हुई. असली सवाल यह होगा कि पैसा कहां से आया, किस रूप में आया, किसे मिला और कितनी जल्दी मिला. वित्त ऐसा होना चाहिए जो गरीब देशों पर नए कर्ज का बोझ न बढ़ाए. जहां संभव हो, अनुदान आधारित सहायता को प्राथमिकता दी जानी चाहिए. स्थानीय समुदायों को निर्णय प्रक्रिया में शामिल करना होगा और गैर-आर्थिक नुकसान का भी मूल्य समझना होगा. मुआवजे की कानूनी परिभाषा और जिम्मेदारी तय करने पर वैश्विक सहमति बनने में अभी समय लग सकता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि कार्रवाई रोक दी जाए. न्याय का व्यावहारिक रास्ता ऐसी वित्तीय व्यवस्था से शुरू हो सकता है जो अतिरिक्त, पूर्वानुमेय, पर्याप्त और आसानी से उपलब्ध हो. संयुक्त राष्ट्र जलवायु प्रक्रिया भी विकासशील देशों के लिए हानि-क्षति से निपटने के लिए नई, अतिरिक्त, पूर्वानुमेय और पर्याप्त वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता को रेखांकित कर चुकी है.

जलवायु संकट ने दुनिया के सामने एक असहज सवाल खड़ा कर दिया है- क्या जलवायु आपदा का खर्च वही उठाएगा जिसने सबसे कम योगदान दिया है, या वह भी जिम्मेदारी साझा करेगा जिसने दशकों तक अधिक उत्सर्जन किया? यही प्रश्न जलवायु न्याय का केंद्र है. सहायता मानवीय सहयोग है, लेकिन न्याय केवल सहायता से आगे की मांग करता है. मुआवजा जिम्मेदारी का प्रश्न उठाता है, लेकिन उसकी गणना और कानूनी व्यवस्था जटिल है. इसलिए व्यावहारिक रास्ता यह है कि दुनिया उत्सर्जन में कटौती को सर्वोच्च प्राथमिकता दे, विकासशील देशों को पर्याप्त अनुकूलन वित्त उपलब्ध कराए और अपरिहार्य हानि-क्षति के लिए मजबूत, पारदर्शी और न्यायपूर्ण वित्तीय व्यवस्था विकसित करे. आखिरकार जलवायु न्याय का उद्देश्य केवल बीते नुकसान की कीमत चुकाना नहीं, बल्कि ऐसी वैश्विक व्यवस्था बनाना है, जिसमें जिसने संकट में कम योगदान दिया है, उसे संकट की सबसे बड़ी कीमत न चुकानी पड़े. यही विज्ञान, नैतिकता और वैश्विक न्याय- तीनों की साझा मांग है.

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(नोटः लेखक विज्ञान और पर्यावरण मामलों के विशेषज्ञ हैं. उनके निजी विचार हैं)

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