राहुल गांधी के एक दांव से कैसे अटक गया मोदी सरकार का प्रोजेक्ट ‘डिलिमिटेशन’

NEET पेपर लीक का मुद्दा. सड़कों पर प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच घमासान. और इस सबके बीच कांग्रेस और राहुल गांधी का सरप्राइज अटैक. पर्दे के पीछे की 'स्क्रिप्ट' ने मोदी सरकार के सबसे महत्वाकांक्षी बिल के सामने कैसे लगा दिया स्पीड ब्रेकर.

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राहुल गांधी को दिल्ली पुलिस PM आवास के सामने उठाकर ले गई, लेकिन उनके इस प्रदर्शन ने मोदी सरकार के डिलिमिटेशन बिल का ख्वाब फिलहाल तोड़ दिया. (Photo: PTI) राहुल गांधी को दिल्ली पुलिस PM आवास के सामने उठाकर ले गई, लेकिन उनके इस प्रदर्शन ने मोदी सरकार के डिलिमिटेशन बिल का ख्वाब फिलहाल तोड़ दिया. (Photo: PTI)

धीरेंद्र राय

  • नई दिल्ली,
  • 23 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 2:36 PM IST

देश की राजनीति में जब कोई बड़ा तूफान आता है, तो जो तस्वीरें टीवी की स्क्रीन पर दिखती हैं, अक्सर कहानी वहीं खत्म नहीं होती. NEET पेपर लीक स्कैंडल के बाद दिल्ली की सड़कों से लेकर संसद के गलियारों तक जो कुछ हुआ, वह एक अदृश्य सियासी स्क्रिप्ट का जीता-जागता उदाहरण है.

एक तरफ सड़कों पर छात्रों का गुस्सा था, तो दूसरी तरफ भारत की मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस और उसके सबसे बड़े नेता राहुल गांधी का आक्रामक फ्रंट-फुट अटैक. लेकिन इस पूरे विजुअल ड्रामे के पीछे एक ऐसी सोची-समझी रणनीति काम कर रही थी, जिसने सरकार के उस ड्रीम प्रोजेक्ट को फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दिया है, जिसके लिए वह तीन महीनों से बहुमत का गणित जुटाने में लगी थी.

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सीन 1- ट्विटर पोस्ट से सड़कों तक, एक्शन में रहे राहुल गांधी

NEET स्कैंडल के सामने आते ही राहुल गांधी ने बिना वक्त गंवाए मोर्चा संभाल लिया था. उनकी सोशल मीडिया एक्टिविटी और सार्वजनिक रूप से सामने आने के तरीके में एक खास रणनीति साफ़ झलक रही थी.

राहुल गांधी के ऑफिशियल X अकाउंट से एक के बाद एक कई तीखे पोस्ट किए गए. इनमें उन्होंने NEET को केवल एक परीक्षा की नाकामी नहीं, बल्कि देश के पूरे एजुकेशन सिस्टम के ‘कैप्चर’ होने का सबूत बताया. उन्होंने आंकड़ों का हवाला देते हुए बीजेपी शासित राज्यों पर सीधे निशाने साधे और केंद्र सरकार को 'पेपर लीक की फैक्ट्री' करार दिया.

इसके साथ ही राहुल गांधी ने देश के अलग-अलग शहरों में जाकर पीड़ित छात्रों और उनके पेरेंट्स से सीधी मुलाकातें कीं. इस पूरे घटनाक्रम का मुख्य मकसद छात्रों और मध्यम वर्गीय परिवारों के गुस्से को सीधे केंद्र सरकार की कार्यशैली और उसकी विश्वसनीयता से जोड़ना था.

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लेकिन, राहुल इस मुद्दे को आगे ले जाते उससे पहले ही सीन से गायब हो गए. कांग्रेस के लिहाज से देखें तो एक महीना पूरा वैक्यूम में बीता. 

सीन 2- 'CJP' का उदय और प्रोटेस्ट का अलग मंच पर शिफ्ट हो जाना

इसी दौरान सोशल मीडिया पर उठते आक्रोश और जमीनी आंदोलन के बीच एक नए और सरप्राइज मंच का इंस्टाग्राम पर जन्म हुआ, जिसे 'CJP' यानी कॉकरोच जनता पार्टी का नाम दिया गया. अमेरिका के बोस्टन शहर में इसे डिजाइन करने वाले अभिजीत दिपके स्वदेश लौटते हैं. और व्यंग्य और छात्रों के तीखे गुस्से से उपजे इस नाम के बैनर तले नीट परीक्षा में हुई धांधली के खिलाफ दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन शुरू कर देते हैं. भीड़ जुटने लगती है.

CJP का प्रोटेस्ट तब तक नीरस ही रहता है, जब तक कि लद्दाख के मुद्दे पर प्रोटेस्ट करके NSA कार्रवाई झेल चुके सोनम वांगचुक मंच पर नहीं पहुंचते हैं. और शुरू होती है उनकी भूख हड़ताल. CJP के बैनर तले युवाओं ने जोश भरने लगता है, जो मॉनसून सत्र शुरू होने के एक दिन पहले तक उबाल पर आ जाता है. लेकिन, मंच पर एक्शन होता है दिल्ली पुलिस का. अगले दिन संसद सत्र की कार्रवाई शुरू होती है, और बाहर जंतर-मंतर के आसपास दिल्ली की सड़कों पर बवाल. प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच संघर्ष. पथराव, वाटर कैनन, आंसू गैस और लाठीचार्ज.

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सड़कों पर बहते आंसू, रोते छात्र और बिखरी किताबों के विजुअल्स सोशल मीडिया पर वायरल हुए, जिसने जलती आग में घी का काम किया. आम जनता और परिवारों के बीच यह गहरा मैसेज गया कि सरकार छात्रों की जायज मांग सुनने और एग्जाम की प्रक्रिया को साफ-सुथरा और ईमानदार बनाए रखने के बजाय उन पर लाठियां चला रही है.

सीन 3- राहुल के अटैक का 'सेकंड फेज', पीएम आवास से आई तस्वीर जिसने बदला नैरेटिव

जैसे ही संसद का मॉनसून सत्र शुरू हुआ, कांग्रेस और राहुल गांधी ने अपने रणनीतिक अटैक का दूसरा चरण लागू कर दिया. यहां पर्दे के पीछे तैयार की गई स्क्रिप्ट ने अपना असली रंग दिखाना शुरू किया. कहा तो यहां तक गया कि पूरी रणनीति मल्लिकार्जुन खड़गे के घर बनी, खैर.

इस रणनीति का सबसे ड्रामेटिक और पावरफुल विजुअल तब सामने आया, जब राहुल गांधी अचानक कांग्रेस नेताओं, सांसदों और इंडिया अलायंस के नेताओं के साथ 7, लोक कल्याण मार्ग यानी प्रधानमंत्री आवास पर धरना देने पहुंच गए. इस बात पर बहस हो सकती है कि ‘वे पहुंच गए’ या ‘उन्हें जाने दिया गया’.

इस हाई-वोल्टेज सरप्राइज एक्शन ने राहुल गांधी को एक बार फिर NEET प्रोटेस्ट का सेंट्रल फिगर बना दिया. उनका धरना न्यूज चैनलों पर लाइव टेलिकास्ट हो रहा था, तभी दिल्ली पुलिस ने एक एक्शन ने एक पावरफुल तस्वीर पेश की. राहुल गांधी को आधे दर्जन से ज्यादा पुलिस वालों ने सड़क से उठाकर हिरासत में ले लिया. इस पूरी कश्मकश के विजुअल ने NEET मुद्दे का नैरेटिव राहुल गांधी के पक्ष में मोड़ दिया. राहुल गांधी की हमेशा उजली दिखाई देने वाली सफेद टी-शर्ट घसीटे जाने और झूमाझटकी के कारण पूरी तरह मैली हो चुकी थी और उनके पैरों से एक जूता गायब था.

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इस एक विजुअल ने देश की जनता के बीच गहरा मैसेज दिया कि देश के बच्चों और युवाओं के हक के लिए विपक्ष का सबसे बड़ा नेता पुलिस की लाठियों और झूमाझटकी से भी पीछे नहीं हटने वाला है. इस तस्वीर ने सरकार को नैतिक रूप से पूरी तरह से डिफेंसिव स्थिति में लाकर खड़ा किया.

सीन 4- कांग्रेस के एजेंडे में बिखराव नहीं, डिमांड फोकस्ड है

विपक्ष ने इस मुद्दे पर काम रोको प्रस्ताव और तत्काल बहस की मांग उठाई. लेकिन, कांग्रेस ने एक बेहद सधा हुआ दांव खेला. उन्होंने बाकी प्रदर्शनकारियों की तरह शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को अपनी सबसे बड़ी और सेंट्रल डिमांड बना लिया. इस रणनीति का संदेश बहुत साफ था- जब तक शिक्षा मंत्री का इस्तीफा नहीं होगा, तब तक संसद में कोई चर्चा या सामान्य काम नहीं होने दिया जाएगा. यानी पूरी रणनीति "नो इस्तीफा, नो हाउस" के फॉर्मूले पर टिका दी गई.

दरअसल, NEET का मुद्दा CJP, सिविल सोसायटी, एक्टिविस्ट, सेलिब्रिटी और पॉलिटिकल पार्टियों के बीच कॉमन ग्राउंड है, लेकिन सबकी डिमांड अलग-अलग रहीं. लेकिन, कांग्रेस ने संसद के अंदर अपने आक्रमण और अपनी डिमांड को बिल्कुल स्पष्ट रखा. अब तक अलग-अलग मुद्दों पर हुए कांग्रेस के प्रदर्शनों को लेकर पार्टी की इसी बात पर आलोचना होती रही है कि उनकी रणनीति में एक बिखराव रहता है. लेकिन, कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी NEET के मुद्दे पर बेहद स्पष्ट हैं. और उनकी पूरी पार्टी उनके पीछे एकसाथ दिखाई देती है.

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सीन 5- पर्दे के पीछे की असली बाजी 'डिलिमिटेशन बिल' की

अब आते हैं इस कहानी के मेन पॉइंट पर. जो इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम का असली और अदृश्य मकसद माना जा रहा है. 

मॉनसून सत्र शुरू होने से ठीक पहले तक राजनीतिक गलियारों में यह खबर बेहद गर्म थी कि केंद्र सरकार इस सत्र में 'डिलिमिटेशन बिल' यानी परिसीमन विधेयक पेश करने की तैयारी में है. इसके लिए पिछले तीन महीनों से अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग पार्टियों में तोड़-फोड़ और जोड़-तोड़ करके दो-तिहाई बहुमत जुटाने का जी-तोड़ प्रयास किया जा रहा था.

लेकिन कांग्रेस की NEET पर बनाई गई आक्रामक रणनीति और 'संसद न चलने देने' के अडिग रुख ने सरकार के सारे गणित को बिगाड़ दिया. नीट और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे पर अड़े विपक्ष के कारण संसद की कार्यवाही लगातार बाधित रही, जिससे कोई भी कामकाज होना असंभव हो गया है.

एक तरफ सड़कों पर छात्रों का भारी गुस्सा है और दूसरी तरफ संसद ठप पड़ी है. ऐसे माहौल में परिसीमन जैसे बेहद कंट्रोवर्शियल और संवेदनशील बिल को पेश करना या उस पर चर्चा कराना सरकार के लिए भारी रिस्क बन सकता है.

क्या अपनी रणनीति में कामयाब हुई कांग्रेस?

NEET पेपर लीक मुद्दे को सड़क से संसद तक ले जाने, शिक्षा मंत्री के इस्तीफे को एक ढाल की तरह इस्तेमाल करने और परिसीमन बिल के रास्ते में अड़ंगा लगाने का कांग्रेस का यह दांव फिलहाल पूरी तरह कामयाब दिखता है.

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सरकार नीट के मुद्दे पर पूरी तरह से घिरी हुई है और उसे लगातार सफाई देने की मुद्रा में आना पड़ा है. वहीं, जिस महत्वाकांक्षी परिसीमन बिल को पास कराने के लिए महीनों से बिसात बिछाई जा रही थी, वह फिलहाल मॉनसून सत्र में ठंडे बस्ते में चला गया है. सड़क पर मैली टी-शर्ट और गायब जूते वाली राहुल गांधी की उस तस्वीर ने न सिर्फ छात्रों के गुस्से को आवाज दी, बल्कि पर्दे के पीछे तैयार की गई सियासी स्क्रिप्ट को भी उसके अंजाम तक पहुंचा दिया.

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