इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 21 अगस्त 2026 को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए प्रयागराज के टैगोर पब्लिक स्कूल की कक्षा 11 की मुस्लिम छात्रा की याचिका खारिज कर दी. छात्रा ने स्कूल की निर्धारित यूनिफॉर्म के साथ हिजाब या हेडस्कार्फ पहनने की अनुमति मांगी थी. जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने साफ कहा कि हिजाब पहनना इस्लाम का अनिवार्य धार्मिक हिस्सा नहीं है. अदालत ने दोहराया कि केवल दावे के आधार पर अनुच्छेद 25 के तहत राहत नहीं दी जा सकती. कोई धार्मिक ग्रंथ, साक्ष्य या ठोस आधार प्रस्तुत नहीं किया गया था, जिससे यह साबित हो कि हिजाब न पहनने से आस्था प्रभावित होती है. यह फैसला सिर्फ एक व्यक्तिगत मामले का नहीं, बल्कि शैक्षणिक संस्थानों में अनुशासन, समानता और धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों पर एक तरह से कोर्ट की मुहर है.
दरअसल छात्रा कक्षा 6 से 10 तक उसी स्कूल में पढ़ी और कुछ समय तक हेडस्कार्फ पहनकर आई. अब कक्षा 11 में स्कूल ने सख्ती से यूनिफॉर्म कोड लागू करने का निर्णय लिया. अदालत ने स्पष्ट किया कि स्कूल की पिछली ढील चाहे सुस्ती, प्रशासनिक लापरवाही या अनदेखी के कारण हुई हो इसके आधार पर कोई कानूनी अधिकार नहीं पैदा हो जाता है. संस्थान किसी भी समय अपने नियमों को लागू कर सकता है, बशर्ते वे एकसमान, गैर-भेदभावपूर्ण और अनुशासन बनाए रखने के उद्देश्य से हों. तस्वीरों से भी साफ था कि उसी समुदाय की अन्य छात्राएं हेडस्कार्फ नहीं पहन रही थीं. अदालत ने कर्नाटक हाईकोर्ट समेत अन्य उच्च न्यायालयों के फैसलों का हवाला दिया, जहां भी हिजाब को इस्लाम की अनिवार्य प्रथा नहीं माना गया.
स्कूल यूनिफॉर्म महज कपड़े नहीं होते. वे समानता का प्रतीक हैं. कक्षा में हर बच्चा,चाहे किसी भी धर्म, जातिे या आर्थिक पृष्ठभूमि का हो एक जैसा दिखता है. इससे भेदभाव कम होता है, संस्थागत पहचान मजबूत होती है और ध्यान पढ़ाई पर केंद्रित रहता है. अगर हर छात्र अपनी धार्मिक या व्यक्तिगत पसंद के अनुसार यूनिफॉर्म में बदलाव की मांग करने लगे, तो अनुशासन टूट जाएगा. अदालत ने ठीक कहा कि व्यक्तिगत आधार पर छूट देने से अधिकार स्कूल से छात्रों के हाथ में चला जाएगा. जाहिर है कि इससे किसी भी स्कूल-कॉलेज में सेक्युलर माहौल बनाने में बाधा बनेगा. भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में शिक्षा संस्थान धर्म-निरपेक्ष जगह होने चाहिए, जहां विश्वास घर और समाज तक सीमित रहें, न कि कक्षा में प्रदर्शन का माध्यम बनें.
अनुच्छेद 25 धार्मिक स्वतंत्रता देता है, लेकिन वह सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन है. किसी प्रथा को अनिवार्य साबित करने के लिए ठोस सबूत चाहिए सिर्फ दावा काफी नहीं. इस मामले में ऐसा कोई आधार नहीं था. कुरान या हदीस में स्कूल जैसी जगह पर हिजाब को अनिवार्य बताने वाला कोई स्पष्ट निर्देश अदालत के सामने नहीं रखा गया. कई मुस्लिम बहुल देशों में भी शैक्षणिक संस्थानों में यूनिफॉर्म को प्राथमिकता नहीं दी जाती है. फैसला किसी धर्म के खिलाफ नहीं, बल्कि सबूत की कमी पर आधारित है. यह याद दिलाता है कि धार्मिक स्वतंत्रता का मतलब संस्थानों के नियमों को चुनौती देना नहीं है.
यह फैसला व्यापक संदेश देता है. शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान और चरित्र निर्माण है, न कि धार्मिक प्रतीकों का प्रदर्शन. अगर एक समुदाय के लिए छूट दी जाए, तो दूसरे भी अपनी मांगें लेकर आ सकते हैं.कुछ तिलक, कुछ क्रॉस, कुछ और प्रतीकों के साथ स्कूल-कॉलेज आना चाहेंगे. इससे कक्षाएं विवाद का अखाड़ा बन जाएंगी. निजी स्कूलों को अपनी नीति निर्धारित करने का अधिकार है, खासकर जब वे गैर-सहायता प्राप्त हों तो उनकी जिम्मेदारी और बढ़ जाती है. सरकार और समाज दोनों को इस बात का सम्मान करना चाहिए कि अनुशासन और एकरूपता बच्चों के भविष्य के लिए जरूरी हैं.
आलोचक इसे धार्मिक अधिकारों पर हमला बता सकते हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि फैसला संतुलित है. यह आस्था को नहीं छूता, सिर्फ स्कूल परिसर में नियम लागू करने की बात करता है. छात्रा घर पर, बाहर या धार्मिक स्थलों पर अपनी पसंद का परिधान पहन सकती है. कक्षा में समानता बनाए रखना किसी की आस्था का उल्लंघन नहीं है. भारत की ताकत उसकी विविधता में है, लेकिन वह विविधता नियमों के दायरे में ही फलती-फूलती है.
कर्नाटक का 2022 का हिजाब विवाद इस मुद्दे का सबसे बड़ा उदाहरण है. उडुपी के सरकारी प्री-यूनिवर्सिटी कॉलेज में कुछ मुस्लिम छात्राओं को हिजाब पहनकर कक्षा में प्रवेश मिलने से शुरू हुआ मामला पूरे राज्य में फैल गया. हिंदू छात्रों ने भगवा स्कार्फ पहनकर जवाबी प्रदर्शन किए. कई जगहों पर झड़पें हुईं, शिवमोगा में धारा 144 लगाई गई और स्कूल-कॉलेज अस्थायी रूप से बंद करने पड़े. तत्कालीन भाजपा सरकार ने यूनिफॉर्म पर सख्त आदेश जारी किया. कर्नाटक हाईकोर्ट ने मार्च 2022 में फैसला सुनाया कि हिजाब इस्लाम की अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं है. 2023 में कांग्रेस सरकार आने के बाद इस मुद्दे पर राजनीतिक दबाव बना. लंबे समय तक स्थिति जस की तस रही, लेकिन 2026 में सरकार ने पुराने आदेश में बदलाव कर सीमित पारंपरिक प्रतीकों (जिनमें हिजाब भी शामिल) की अनुमति दी, बशर्ते वे यूनिफॉर्म में बाधा न डालें. यह फैसला राजनीतिक तुष्टिकरण के आरोपों के बीच आया और फिर से बहस छेड़ गई.
भारत में ऐसे विवाद सिर्फ कर्नाटक तक सीमित नहीं है. उत्तर प्रदेश के मेरठ और बिजनौर, केरल के कोच्चि, झारखंड के चातरा और अन्य जगहों पर भी स्कूल-कॉलेजों में हिजाब को लेकर टकराव हुए हैं. कुछ मामलों में छात्राओं को बाहर भेजा गया, तो कहीं जबरन उतारने के आरोप लगे. ये घटनाएं साबित करती हैं कि जब शिक्षा संस्थानों में धार्मिक प्रतीकों को प्राथमिकता दी जाती है, तो सामाजिक तनाव बढ़ता है. इलाहाबाद हाईकोर्ट का ताजा फैसला कर्नाटक हाईकोर्ट की लाइन पर ही चलता है और याद दिलाता है कि शिक्षा को सांप्रदायिक राजनीति से दूर रखना जरूरी है. अगर सरकारें अदालती सिद्धांतों की बजाय वोट बैंक के हिसाब से नियम बदलती रहीं, तो कक्षाएं फिर से विवाद का अखाड़ा बन जाएंगी. समान यूनिफॉर्म ही सच्ची समानता और सेक्युलरिज्म की गारंटी है.
इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह निर्णय शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में एक सकारात्मक कदम है. यह याद दिलाता है कि संवैधानिक अधिकार व्यक्तिगत दावों से ऊपर संस्थागत अनुशासन को प्राथमिकता देते हैं. स्कूलों को अपना काम बिना दबाव के करने देना चाहिए. आने वाले समय में अगर ऐसे और मामले आएं, तो न्यायपालिका का यही रुख बरकरार रहना चाहिए.
संयम श्रीवास्तव