गांधी को याद करना काफी नहीं, क्या हम उनकी अहिंसा को अपने व्यवहार में उतार पाए हैं?

गांधी जयंती पर महात्मा गांधी को याद करने का मतलब सिर्फ उनकी तस्वीर, नाम और उनसे जुड़े अभियानों को याद करना नहीं है. गांधी के लिए अहिंसा सत्य, आत्मसंयम, सम्मान और अन्याय के खिलाफ शांतिपूर्ण प्रतिरोध से जुड़ी थी. आज जब समाज में सांप्रदायिक तनाव, मॉब लिंचिंग, असहमति और अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर बहस जारी है, तब सवाल यह है कि गांधी की अहिंसा को हम अपने सार्वजनिक और राजनीतिक व्यवहार में कितना उतार पाए हैं.

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गांधी के विचारों में सत्य और अहिंसा एक-दूसरे से जुड़े हुए थे (Photo: ITG) गांधी के विचारों में सत्य और अहिंसा एक-दूसरे से जुड़े हुए थे (Photo: ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 02 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 6:06 AM IST

गांधी जयंती पर हर साल गांधी याद आते हैं. सरकारी दफ्तरों में तस्वीरें लगती हैं, राजनीतिक मंचों से उनके नाम का उल्लेख होता है, स्वच्छता अभियान होते हैं और गांधी से जुड़े शब्दों की भरमार दिखाई देती है. लेकिन सवाल यह है कि गांधी को याद करना क्या सिर्फ उनके नाम और प्रतीकों को याद करना है? या फिर उनकी सबसे बड़ी सीख 'अहिंसा' को अपने सार्वजनिक और राजनीतिक व्यवहार में उतारना भी है?

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गांधी के लिए अहिंसा का अर्थ केवल किसी को शारीरिक नुकसान न पहुंचाना नहीं था. गांधी के लिए अहिंसा का रिश्ता प्रेम, सत्य, आत्मसंयम और दूसरे के अस्तित्व के सम्मान से था. यहीं आज की चुनौती शुरू होती है.

समाज में वर्ग, जाति, धर्म और समुदाय के आधार पर असुरक्षा की भावना दिखाई देती है. किसी व्यक्ति या समूह को भीड़ के गुस्से का सामना करना पड़ता है, तो कहीं असहमति को ही दुश्मनी की तरह देखा जाने लगता है. 2025 में सेंटर फॉर स्टडी ऑफ सोसाइटी एंड सेक्युलरिज्म की मॉनिटरिंग में 29 सांप्रदायिक दंगे दर्ज हुए, जबकि 14 मॉब लिंचिंग की घटनाओं में आठ लोगों की मौत की बात कही गई. यह किसी एक संस्था का अंतिम या सरकारी आंकड़ा नहीं है, लेकिन यह उस सामाजिक तनाव की एक तस्वीर जरूर पेश करता है जिस पर गंभीरता से विचार होना चाहिए.

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अभिव्यक्ति की आजादी भी इसी बहस का हिस्सा है. Freedom House की 2026 की रिपोर्ट में भारत में प्रेस की स्वतंत्रता और पत्रकारों पर दबाव को लेकर सवाल उठाए गए हैं. सरकार इन आकलनों की निष्पक्षता पर सवाल उठाती रही है. असहमति यहां भी है. लेकिन लोकतंत्र का सवाल सीधा है- असहमति का जवाब हिंसा, धमकी, बहिष्कार या नफरत से दिया जाना चाहिए या संवाद से?

गांधी का रास्ता इससे कहीं कठिन था. उनके लिए साधन और साध्य अलग नहीं थे. जैसा बीज होगा, वैसा ही पेड़ होगा. यानी किसी अच्छे लक्ष्य तक पहुंचने के लिए अपनाया गया रास्ता भी उतना ही महत्वपूर्ण है. आज राजनीति में गांधी इसी जगह सबसे सुविधाजनक भी हैं और सबसे असुविधाजनक भी.

एक तरफ गांधी के नाम से मनरेगा जुड़ा. 2005 में बना यह कानून ग्रामीण परिवारों को साल में कम से कम 100 दिन के रोजगार की कानूनी गारंटी देता था. हालांकि अब ये दूसरे नाम से जाना जाता है. दूसरी तरफ 2 अक्टूबर को ही स्वच्छ भारत मिशन शुरू किया गया, जिसका मकसद स्वच्छता को जनआंदोलन बनाना था. लेकिन किसी योजना या अभियान के नाम में गांधी जोड़ देने भर से वह गांधीवादी नहीं हो जाता. गांधी का सवाल नाम से आगे जाता है- तरीका क्या है और मकसद क्या है?

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यही वजह है कि गांधी की विरासत पर किसी एक दल या विचारधारा का दावा नहीं हो सकता. राजनीति के दोनों तरफ गांधी का इस्तेमाल हुआ है और होता रहेगा. कोई उनके नाम से कल्याणकारी योजना को याद करेगा, कोई स्वच्छता अभियान को गांधी के सपने से जोड़ेगा, कोई सत्य और अहिंसा का हवाला देकर अपने राजनीतिक एजेंडे को ताकत देगा. यह राजनीति का स्वभाव है. लेकिन गांधी को उद्धृत करना और गांधी की कसौटी पर खरा उतरना, दो अलग बातें हैं.

समस्या तब शुरू होती है जब गांधी का नाम तो लिया जाए, लेकिन उनकी सबसे कठिन सीख भुला दी जाए- असहमति रखने वाले के अधिकार का सम्मान. जब अपनी आजादी को आजादी और दूसरे की असहमति को खतरा मान लिया जाए, तब गांधी सिर्फ दीवार पर टंगी तस्वीर बनकर रह जाते हैं.

अहिंसा का मतलब अन्याय पर चुप रहना नहीं है. गांधी की अहिंसा प्रतिरोध का रास्ता थी. सत्याग्रह इसका उदाहरण था- अन्याय के सामने खड़े होना, लेकिन सामने वाले को दुश्मन मानकर खत्म करने की कोशिश नहीं करना. संयुक्त राष्ट्र भी गांधी के अहिंसक आंदोलन को सामाजिक और राजनीतिक बदलाव के महत्वपूर्ण उदाहरण के तौर पर रेखांकित करता है.

इसलिए गांधी जयंती पर असली सवाल यह नहीं कि हमने गांधी को कितनी बार याद किया. सवाल यह है कि बहस हारने पर हम क्या करते हैं. आलोचना सुनकर क्या करते हैं. अपने विरोधी के अधिकार को कितना स्वीकार करते हैं. और जब भीड़ हमारे पक्ष में खड़ी हो, तब भी क्या हम हिंसा के खिलाफ खड़े हो सकते हैं?

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गांधी की अहिंसा शायद दूसरे को हराने का तरीका नहीं, दूसरे को इंसान मानने की शर्त है.

लोकतंत्र में इससे कठिन और शायद इससे जरूरी अहिंसा की परिभाषा कोई दूसरी नहीं.

लेखक: तिरुपति कुमार

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