दृश्यम-3: मदिरा पीकर सो गए, छी-छी-छी...

दृश्यम-3 के पहले हाफ में एक थिएटर रिहर्सल के दौरान बोली गई ये लाइन शायद पूरी फिल्म पर भारी पड़ जाती है. क्योंकि इस बार सच में समझ नहीं आता कि पर्दे पर कौन जाग रहा है और कौन सो गया है.

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मदिरा पीकर सो गए… छी-छी-छी. मदिरा पीकर सो गए… छी-छी-छी.

तिरुपति कुमार

  • नई दिल्ली,
  • 10 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 6:40 AM IST

दृश्यम-3 के पहले हाफ में एक थिएटर रिहर्सल के दौरान बोली गई ये लाइन शायद पूरी फिल्म पर भारी पड़ जाती है. क्योंकि इस बार सच में समझ नहीं आता कि पर्दे पर कौन जाग रहा है और कौन सो गया है. फिल्म में विजय सालगांवकर है, तब्बू हैं, गायतोंडे हैं, परिवार है, नया किरदार भी है.

सब अपनी जगह मौजूद हैं. बस वह बेचैनी नहीं है, जिसने पहले और दूसरे हिस्से को यादगार बनाया था. पहले दृश्यम देखते हुए लगता था, अब क्या होगा. इस बार कई बार लगता है, अच्छा, अब ये होगा. और फिर वही हो जाता है. शायद इसलिए फिल्म खत्म होने के बाद सबसे ज्यादा याद कहानी नहीं, वही आवाज रह जाती है- “मदिरा पीकर सो गए… छी-छी-छी.”

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पहली वाली दृश्यम में मामला ही अलग था. विजय सालगांवकर और उसका परिवार मुसीबत में था. पुलिस पीछे थी और दर्शक उनके साथ डर रहा था. हर छोटी बात पर लगता था कि कहीं राज न खुल जाए. 2 और 3 अक्टूबर की तारीख तो ऐसी याद हुई कि जैसे अपनी शादी की तारीख हो.

दूसरे पार्ट में भी यही खेल चलता रहा. विजय क्या करेगा, पुलिस क्या करेगी, कौन किससे एक कदम आगे है, फिल्म खत्म होने तक दिमाग चलता रहता था. थिएटर से निकलने के बाद भी लोग कहानी पर बात करते थे.

अब तीसरा पार्ट आया है.

और यहां पहुंचकर मन कहता है.

मदिरा पीकर सो गए, छी-छी-छी!

क्योंकि इस बार फिल्म देखते हुए वह बेचैनी कम महसूस होती है. कई जगह ऐसा लगता है कि कहानी खुद आपको बता रही है कि अब आगे क्या होने वाला है. आप सोचते हैं, “अब ये होगा.” थोड़ी देर बाद वही हो जाता है.

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फिर आप सोचते हैं, “अब अगला ये होगा.”

वह भी हो जाता है.

यानी पहले दृश्यम में सवाल था, “अब क्या होगा?”

तीसरे में कई बार लगता है, “अच्छा, अब ये होगा.”

बस यही फर्क पूरी फिल्म का फर्क बन जाता है.

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अजय देवगन अपने पुराने अंदाज में हैं. चेहरा वही गंभीर, आंखों में वही ठहराव. लेकिन पहले विजय सालगांवकर की चुप्पी में भी बहुत कुछ छिपा लगता था. लगता था कि आदमी मन ही मन कुछ बड़ा खेल खेल रहा है. इस बार कई जगह लगता है कि विजय चुप हैं क्योंकि दृश्य में चुप रहना है.

तब्बू भी हैं. उन्हें देखकर पुरानी मीरा देशमुख याद आती हैं. गायतोंडे भी है तो पिछली फिल्मों वाला गायतोंडे याद आता है. अजय देवगन का परिवार भी है. लेकिन अजीब बात यह है कि इनमें से कोई भी इस बार पहले दो हिस्सों जैसी याद नहीं छोड़ पाता.

यानी चेहरे पुराने हैं, लेकिन यादें नई नहीं बनतीं.

जयदीप अहलावत की एंट्री से उम्मीद जरूर बंधती है. अच्छे अभिनेता हैं और अपनी मौजूदगी भी दर्ज कराते हैं. लेकिन जिस तरह पहले तब्बू का किरदार और अजय देवगन का विजय एक-दूसरे के सामने दिमागी खेल खेलते थे, वैसी टक्कर यहां पूरी तरह महसूस नहीं होती.

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और यही वह जगह है जहां फिर वही संवाद याद आता है.

“मदिरा पीकर सो गए, छी-छी-छी!”

लगता है जैसे फिल्म के सारे बड़े किरदार एक साथ बैठे थे. सबने अपनी-अपनी भूमिका निभाई और फिर किसी ने कहा, चलो भाई, अब बहुत हो गया.

दृश्यम की पहली दो फिल्मों में ऐसा नहीं था. वहां कहानी में कोई भी छोटी चीज बेकार नहीं लगती थी. कोई तारीख, कोई जगह, कोई झूठ, कोई बहाना, सबका मतलब था. दर्शक भी हर चीज पर नजर रखता था.

इस बार कई चीजें आती हैं और चली जाती हैं.

पहले फिल्म खत्म होने के बाद कहानी याद रहती थी.

इस बार फिल्म देखते हुए कई बार पुरानी फिल्म याद आती है.

और यही सबसे बड़ा दुख है.

तीसरा पार्ट अपनी कहानी से ज्यादा हमें पहले और दूसरे पार्ट की याद दिलाता है.

आप अजय देवगन को देखते हैं तो पहला पार्ट याद आता है. तब्बू को देखते हैं तो पुराना मुकाबला याद आता है. गायतोंडे आता है तो पुरानी पूछताछ याद आती है. परिवार दिखता है तो पुराने डर की याद आती है.

लेकिन इस बार की अपनी कोई ऐसी चीज नहीं बनती जिसे फिल्म के बाद घर जाते हुए याद किया जाए.

बस वही एक लाइन दिमाग में रह जाती है.

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“मदिरा पीकर सो गए. छी-छी-छी!”

और शायद यही इस फिल्म का सबसे बड़ा व्यंग्य है.

पहले दृश्यम ने हमें जगाए रखा था.

दूसरे ने हमें सोचने पर मजबूर किया था.

तीसरे में हम सोचते रहे कि अब कुछ ऐसा होगा जो हमें फिर से चौंका देगा.

लेकिन कई बार वह चौंकाने वाला पल आने से पहले ही समझ आ जाता है कि आगे क्या होने वाला है.

फिल्म बुरी नहीं है. कलाकारों ने काम किया है, कहानी में घटनाएं हैं और आखिर तक फिल्म आपको बैठाए भी रखती है. लेकिन दृश्यम जैसी फिल्म के लिए सिर्फ बैठाए रखना काफी नहीं है.

उसने पहले हमें बांधा था.

अब वह बस हमें साथ लेकर चलती है.

और आखिर में यही सवाल रह जाता है. पहले दो हिस्सों की वह बेचैनी, वह डर, वह मजा आखिर गया कहां?

शायद पहली दो फिल्मों के बाद इस बार कहानी ने भी खुद को थोड़ा ज्यादा आराम दे दिया. पहले जहां हर सीन के पीछे कोई वजह होती थी, हर किरदार कुछ छोड़कर जाता था और हर मोड़ पर लगता था कि अब कुछ बड़ा होने वाला है, इस बार कई जगह बस इंतजार ही होता रहा.

फिल्म खत्म होने के बाद पीछे मुड़कर देखो तो लगता है कि अजय देवगन हैं, तब्बू हैं, गायतोंडे हैं, परिवार है, जयदीप अहलावत हैं, सब आए और अपनी-अपनी जगह से गुजर भी गए. लेकिन वह बात नहीं बनी, जिसे लेकर हम पहली दो फिल्मों के बाद घर लौटे थे.

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तभी उस संवाद का मतलब समझ में आता है.

“मदिरा पीकर सो गए… छी-छी-छी.”

इस बार लगता है, यह संवाद सिर्फ फिल्म के किसी किरदार ने नहीं बोला. कहीं न कहीं पूरी कहानी ने खुद अपने लिए कह दिया है.

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