रांची में छात्रों का आंदोलन करीब दो सप्ताह पुराना हो चुका है. झारखंड की राजधानी की सड़कों पर छात्र अपनी मांगों को लेकर लगातार डटे हुए हैं. लेकिन इस आंदोलन को वह राष्ट्रीय पहचान और समर्थन नहीं मिल रहा, जो कुछ समय पहले दिल्ली में छात्रों के आंदोलन को मिला था. दोनों आंदोलनों के मुद्दे अलग हो सकते हैं पर उनका मूल भाव एक ही है. युवाओं का अपने भविष्य, अवसरों और व्यवस्था के प्रति असंतोष. फिर ऐसा क्यों है कि दिल्ली का आंदोलन राष्ट्रीय बहस बन जाता है, जबकि रांची जैसे शहरों का आंदोलन राज्य की सीमाओं से बाहर ही नहीं निकल पाता?
यह सवाल केवल झारखंड का नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की उस संरचना का है जिसमें राष्ट्रीय विमर्श का केंद्र आज भी दिल्ली बनी हुई है. देश की राजधानी होने के कारण यहां संसद है, सर्वोच्च न्यायालय है, केंद्र सरकार है और लगभग सभी बड़े राष्ट्रीय मीडिया संस्थानों के मुख्यालय भी यहीं हैं. ऐसे में दिल्ली की सड़क पर होने वाला कोई भी प्रदर्शन स्वाभाविक रूप से राष्ट्रीय कैमरों की नजर में आ जाता है. वहीं रांची, भोपाल, जयपुर, पटना या गुवाहाटी में चल रहे आंदोलनों को वही दृश्यता नहीं मिल पाती है.
मीडिया की यह केंद्रीय प्रवृत्ति लोकतांत्रिक विमर्श को भी प्रभावित करती है. जिस आंदोलन की तस्वीरें लगातार राष्ट्रीय चैनलों और सोशल मीडिया पर दिखाई देती हैं, वही आंदोलन राष्ट्रीय चिंता का विषय बन जाता है. दूसरी ओर, जिन आंदोलनों को सीमित कवरेज मिलती है, वे चाहे कितने ही लंबे या गंभीर क्यों न हों, राष्ट्रीय चेतना का हिस्सा नहीं बन पाते। इससे यह धारणा बनने लगती है कि मानो दिल्ली के बाहर होने वाले आंदोलन कम महत्वपूर्ण हैं।
राजनीतिक दलों का रवैया भी कमोबेश ऐसा ही रहता है. दिल्ली में आंदोलन होता है तो लगभग सभी राष्ट्रीय दल उसके पक्ष या विपक्ष में अपनी राजनीतिक भूमिका तय करते हैं. नेताओं का आना-जाना शुरू हो जाता है, बयानबाजी होती है और आंदोलन राष्ट्रीय राजनीति का हिस्सा बन जाता है. लेकिन जब वही स्वर किसी राज्य की राजधानी से उठता है, तो राष्ट्रीय राजनीति अक्सर चुप रहती है. ऐसा इसलिए भी होता है क्योंकि कई दल अपने राजनीतिक लाभ-हानि का आकलन पहले करते हैं और उसके बाद ही किसी आंदोलन के साथ खड़े होने का फैसला लेते हैं.
सेलेब्रिटी संस्कृति भी इस आंदोलन से दूरी बनाए हुए है. अभिनेता, खिलाड़ी, लेखक और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर जो कहीं भी बोलने को तैयार रहते हैं वह भी रांची से नजरें चुरा रहे हैं.हालांकि इसका दूसरा पक्ष भी है. किसी आंदोलन की सफलता केवल राष्ट्रीय समर्थन से तय नहीं होती. इतिहास में अनेक ऐसे आंदोलन हुए हैं जो छोटे शहरों या दूरदराज के इलाकों से शुरू हुए और बाद में राष्ट्रीय परिवर्तन का कारण बने. इसलिए किसी आंदोलन की ताकत का आकलन केवल कैमरों की संख्या या सोशल मीडिया के ट्रेंड से नहीं किया जा सकता.
आज का छात्र पहले से कहीं अधिक जागरूक है. वह अपने अधिकारों, रोजगार, शिक्षा और पारदर्शिता जैसे मुद्दों पर आवाज उठा रहा है. ऐसे में यदि दिल्ली के छात्रों की मांगों को राष्ट्रीय महत्व दिया जाता है, तो रांची, पटना, भोपाल या इम्फाल के छात्रों की आवाज भी उतनी ही गंभीरता से सुनी जानी चाहिए. लोकतंत्र में नागरिकों का महत्व उनके पते से नहीं, बल्कि उनके अधिकारों से तय होना चाहिए.
यह भी सच है कि हर आंदोलन की परिस्थितियां, मांगें और जनसमर्थन अलग-अलग होते हैं. इसलिए दो आंदोलनों की सीधी तुलना हमेशा उचित नहीं होती. लेकिन यदि किसी आंदोलन के मूल प्रश्न समान हों और फिर भी उसे केवल इसलिए कम महत्व मिले कि वह दिल्ली में नहीं हो रहा, तो यह लोकतांत्रिक समानता के सिद्धांत पर सवाल खड़े करता है.
इस पूरे घटनाक्रम का एक राजनीतिक पहलू भी है, जिस पर चर्चा होना स्वाभाविक है. झारखंड में इस समय इंडिया गठबंधन की सरकार है. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या यही कारण है कि विपक्षी दलों और कई चर्चित सार्वजनिक हस्तियों ने इस आंदोलन से दूरी बनाए रखी है? यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारतीय राजनीति में आंदोलनों के प्रति समर्थन अक्सर राजनीतिक संदर्भ के आधार पर बदलता हुआ दिखाई देता है.
यह एक राजनीतिक धारणा है कि यदि किसी भाजपा शासित राज्य में इसी प्रकार का छात्र आंदोलन होता, तो कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और अन्य विपक्षी दल अधिक मुखर दिखाई देते. दूसरी ओर, यदि आंदोलन किसी विपक्ष-शासित राज्य में हो, तो राष्ट्रीय स्तर की राजनीतिक सक्रियता अपेक्षाकृत कम नजर आती है. यह धारणा सही है या नहीं, इस पर मतभेद हो सकते हैं, लेकिन राजनीतिक व्यवहार ने ऐसे प्रश्नों को जन्म जरूर दिया है.
कुछ विपक्षी नेताओं के झारखंड नहीं पहुंचने के पीछे स्वास्थ्य संबंधी कारण बताए. मीडिया के एक वर्ग में ऐसी खबरें भी आईं कि जिन कारणों का हवाला दिया गया, वे वास्तविकता से मेल नहीं खाते.किसी आंदोलन पर बोलना या न बोलना किसी राजनीतिक दल का अधिकार है, लेकिन जब अलग-अलग राज्यों में एक जैसे मुद्दों पर प्रतिक्रिया अलग-अलग दिखाई देती है, तो निष्पक्षता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है.
लोकतंत्र में आंदोलनों का मूल्यांकन इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि सत्ता में कौन है. यदि छात्रों की मांगें न्यायसंगत हैं, तो उनका समर्थन सत्ता और विपक्ष की सुविधा के अनुसार नहीं बदलना चाहिए. अन्यथा यह संदेश जाता है कि आंदोलनों की भी राजनीतिक "जाति" होती है. यदि लोकतांत्रिक राजनीति को विश्वसनीय बनाए रखना है, तो यह दोहरा मापदंड अपनाना खत्म करना होगा. छात्र का भविष्य न भाजपा का होता है, न कांग्रेस का, न किसी अन्य दल का. वह देश का भविष्य होता है. इसलिए किसी भी छात्र आंदोलन के प्रति संवेदनशीलता इस बात पर निर्भर नहीं होनी चाहिए कि संबंधित राज्य में किस दल की सरकार है. लोकतंत्र की विश्वसनीयता तभी बचेगी, जब सिद्धांत दलों से ऊपर और छात्रों की आवाज सत्ता की राजनीति से बड़ी मानी जाएगी.
इसके साथ ही भारत का लोकतंत्र तभी मजबूत होगा जब राष्ट्रीय विमर्श दिल्ली की सीमाओं से बाहर निकलेगा. मीडिया, राजनीतिक दलों और नागरिक समाज तीनों की यह जिम्मेदारी है कि वे देश के हर हिस्से में उठने वाली लोकतांत्रिक आवाजों को समान संवेदनशीलता से सुनें. अन्यथा यह धारणा और मजबूत होगी कि इस देश में आंदोलन की भी एक राजधानी है, और उसके बाहर उठने वाली आवाजें केवल स्थानीय शोर समझ ली जाती हैं.
लोकतंत्र की असली परीक्षा यही है कि वह राजधानी और राज्य, महानगर और छोटे शहर, प्रसिद्ध और अपरिचित सभी नागरिकों की आवाज को समान महत्व दे. यदि रांची का छात्र अपने भविष्य को लेकर चिंतित है, तो उसकी चिंता भी उतनी ही राष्ट्रीय है, जितनी दिल्ली के किसी छात्र की. आखिर लोकतंत्र में अधिकारों का भूगोल नहीं होना चाहिए.
संयम श्रीवास्तव