मौसम का बदलता मिजाज अब केवल ऋतुओं के चक्र में होने वाले बदलाव की कहानी नहीं रह गया है. यह भारत की अर्थव्यवस्था, कृषि, जनस्वास्थ्य और पारिस्थितिक संतुलन के लिए गंभीर चुनौती बन चुका है. कहीं भीषण गर्मी लोगों की जान ले रही है, तो कहीं कुछ घंटों की मूसलाधार बारिश शहरों को जलमग्न कर दे रही है. कहीं सूखे से खेत बेजान हो रहे हैं, तो कहीं बाढ़ किसानों की महीनों की मेहनत बहा ले जा रही है. सवाल यह है कि जिस मौसम के सहारे भारत की सभ्यता और कृषि व्यवस्था सदियों से आगे बढ़ती रही, वही अब इतना अनिश्चित क्यों होता जा रहा है?
भारत की पारंपरिक ऋतु व्यवस्था में गर्मी, वर्षा, शरद, हेमंत, शिशिर और वसंत का अपना विशिष्ट महत्व रहा है. किसान बादलों, हवाओं और तापमान के संकेतों के आधार पर खेती की तैयारी करते थे. नदियों का प्रवाह, जंगलों की हरियाली और हिमालय पर जमी बर्फ प्रकृति के संतुलन के प्रतीक थे, लेकिन अब तापमान में वृद्धि, वर्षा के बदलते स्वरूप और चरम मौसमी घटनाओं की बढ़ती चिंता ने इस संतुलन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. हिमालय से लेकर समुद्र तट तक इसके प्रभाव दिखाई दे रहे हैं.
जलवायु संकट की गंभीरता हाल के वर्षों के मौसम संबंधी आंकड़ों से भी सामने आती है. सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट और डाउन टू अर्थ की क्लाइमेट इंडिया 2025 रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 के पहले नौ महीनों में भारत में 99 प्रतिशत दिनों पर किसी न किसी प्रकार की चरम मौसमी घटना दर्ज की गई. इस अवधि में इन घटनाओं से जनहानि और फसलों को नुकसान होने की बात भी सामने आई. इस आंकड़े की वास्तविक गंभीरता समझने के लिए घटनाओं की परिभाषा, प्रभावित क्षेत्रों और दर्ज किए गए नुकसान को भी ध्यान में रखना आवश्यक है.
जलवायु परिवर्तन से चक्रवात, अत्यधिक वर्षा और समुद्र के बढ़ते स्तर का खतरा बढ़ रहा है. भारत के तटीय समुदाय विशेष रूप से प्रभावित हैं. भारत की कृषि आज भी बड़ी सीमा तक मानसून पर निर्भर है. वर्षा का देर से आना, लंबे समय तक सूखा पड़ना या कम समय में अत्यधिक बारिश होना किसानों के लिए गंभीर संकट पैदा करता है. बढ़ती गर्मी गेहूँ जैसी फसलों की उपज घटा सकती है, जबकि बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि तैयार फसल को नुकसान पहुंचाती हैं. इन प्रभावों की गंभीरता फसल, क्षेत्र, मिट्टी और सिंचाई की उपलब्धता पर निर्भर करती है.
फसल खराब होने से किसानों की आय घटती है, कर्ज चुकाना कठिन होता है और अगली फसल की तैयारी प्रभावित होती है. उत्पादन में कमी से खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ सकती हैं, जिसका सबसे अधिक असर गरीब परिवारों पर पड़ता है. इस प्रकार जलवायु संबंधी संकट कृषि के साथ खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित करता है. इस चुनौती से निपटने के लिए जलवायु-अनुकूल कृषि को बढ़ावा देना आवश्यक है. कम पानी में उगने वाली फसलों, स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल बीजों, सूक्ष्म सिंचाई, फसल विविधीकरण और मृदा संरक्षण पर ध्यान देना चाहिए. किसानों को समय पर स्थानीय मौसम पूर्वानुमान और कृषि सलाह उपलब्ध करानी चाहिए. साथ ही, प्रभावी फसल बीमा, नुकसान का पारदर्शी आकलन और शीघ्र मुआवजा सुनिश्चित करना जरूरी है, ताकि किसान प्राकृतिक आपदाओं के बाद पुनः खेती शुरू कर सकें.
जलवायु संकट की एक बड़ी विडंबना यह है कि एक ओर बाढ़ तबाही मचाती है, तो दूसरी ओर अनेक क्षेत्रों में लोग पीने और सिंचाई के पानी के लिए संघर्ष करते हैं. उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में नदियों का उफान, पूर्वोत्तर में अत्यधिक वर्षा और हिमालयी क्षेत्रों में भूस्खलन जनजीवन को प्रभावित करते हैं. दूसरी ओर, शुष्क और अर्धशुष्क क्षेत्रों में भूजल का गिरता स्तर कृषि और घरेलू जरूरतों के लिए खतरा पैदा करता है. हालांकि हर बाढ़ और हर सूखे के लिए केवल जलवायु परिवर्तन को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा. नदियों के बाढ़ क्षेत्रों में अतिक्रमण, वनों की कटाई, अनियोजित निर्माण, अपर्याप्त जल निकासी और भूजल का अत्यधिक दोहन प्राकृतिक जोखिमों को बड़ी आपदाओं में बदल सकते हैं. शहरों में तालाबों और झीलों पर अतिक्रमण, प्राकृतिक जल निकासी मार्गों के अवरुद्ध होने से सामान्य से अधिक बारिश भी गंभीर जलभराव का कारण बन सकती है.
केवल बड़े बांधों और नई परियोजनाओं तक सीमित नहीं
जल प्रबंधन को केवल बड़े बांधों और नई परियोजनाओं तक सीमित नहीं रखा जा सकता. तालाबों और झीलों का पुनर्जीवन, वर्षा जल संचयन, जलग्रहण क्षेत्रों का संरक्षण और नदियों के प्राकृतिक प्रवाह की रक्षा समान रूप से महत्वपूर्ण हैं. भूजल के दोहन को स्थानीय उपलब्धता के अनुरूप नियंत्रित करना और जल के पुनः उपयोग को बढ़ावा देना भी जरूरी है. पानी को केवल उपभोग की वस्तु नहीं, बल्कि साझा प्राकृतिक संपदा मानकर उसका विवेकपूर्ण प्रबंधन करना होगा. जलवायु परिवर्तन का प्रभाव मनुष्यों और कृषि तक सीमित नहीं है. तापमान और वर्षा के बदलते स्वरूप से पेड़-पौधों, पक्षियों, कीटों और वन्यजीवों के जीवन चक्र प्रभावित हो सकते हैं. पौधों में फूल आने के समय में बदलाव, पक्षियों के प्रवास के पैटर्न में परिवर्तन और प्राकृतिक आवासों का सिमटना पारिस्थितिक संतुलन के लिए गंभीर संकेत हो सकते हैं. पश्चिमी घाट में पाया जाने वाला नीलकुरिंजी (स्ट्रोबिलैंथिस कुंथियाना ) इसका उल्लेखनीय उदाहरण है. इस पौधे की कुछ प्रमुख प्रजातियां लगभग 12 वर्ष के अंतराल पर सामूहिक रूप से खिलने के लिए जानी जाती हैं. वर्ष 2018 के व्यापक पुष्पन के बाद अगले प्रमुख पुष्पन की अवधि लगभग 2030 के आसपास अपेक्षित मानी जाती है. हालांकि किसी विशेष पुष्पन चक्र में बदलाव को जलवायु परिवर्तन का निश्चित परिणाम मानने के लिए दीर्घकालिक वैज्ञानिक प्रमाण आवश्यक हैं.
फिर भी ऐसे प्राकृतिक चक्रों की निगरानी महत्वपूर्ण है. पौधों के जीवन चक्र में बदलाव परागण करने वाले कीटों, अन्य जीवों की खाद्य उपलब्धता और पहाड़ी पारिस्थितिकी को प्रभावित कर सकता है. इसलिए जैव विविधता के संरक्षण के लिए केवल संकटग्रस्त प्रजातियों पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है. उनके प्राकृतिक आवासों, पारिस्थितिक संबंधों और पर्यावरणीय परिस्थितियों की रक्षा भी जरूरी है. हिमालय भारत की नदियों, जल सुरक्षा और जैव विविधता का महत्वपूर्ण आधार है. लेकिन भौगोलिक संरचना और नाजुक पारिस्थितिकी के कारण यह क्षेत्र प्राकृतिक आपदाओं के प्रति अत्यंत संवेदनशील भी है.
हिमनदों में बदलाव, अत्यधिक वर्षा, भूस्खलन और हिमनदीय झीलों के फटने से उत्पन्न बाढ़ का जोखिम पर्वतीय गांवों, सड़कों और जलविद्युत परियोजनाओं के लिए चुनौती बढ़ा सकता है. ऐसे में विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना अनिवार्य है. पहाड़ों की प्राकृतिक बनावट और भूगर्भीय परिस्थितियों की अनदेखी करके बनाई गई परियोजनाएं जोखिम बढ़ा सकती हैं. सड़क, बांध, सुरंग और भवन निर्माण से पहले वैज्ञानिक अध्ययन, भूस्खलन एवं बाढ़ के जोखिम का आकलन और पर्यावरणीय सुरक्षा के उपाय सुनिश्चित किए जाने चाहिए. स्थानीय समुदायों के अनुभव और जरूरतों को भी निर्णय प्रक्रिया में शामिल करना होगा. पहाड़ों की वहन क्षमता से अधिक दबाव डालना विकास की स्थायी राह नहीं हो सकती. पर्वतीय क्षेत्रों में निर्माण संबंधी निर्णय अल्पकालिक आर्थिक लाभ के बजाय दीर्घकालिक सुरक्षा, पारिस्थितिक संतुलन और स्थानीय आजीविका को ध्यान में रखकर लिए जाने चाहिए.
सभी वर्गों पर समान रूप से नहीं पड़ता बोझ
जलवायु संकट का बोझ समाज के सभी वर्गों पर समान रूप से नहीं पड़ता. जिन लोगों के पास सुरक्षित मकान, बचत, बीमा और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं हैं, वे आपदा से उबरने में अपेक्षाकृत सक्षम होते हैं. इसके विपरीत गरीब परिवार, छोटे किसान, मछुआरे और दिहाड़ी मजदूर एक ही आपदा में अपनी जमा-पूंजी, रोजगार और आजीविका खो सकते हैं. भीषण गर्मी के दौरान खुले में काम करने वाले श्रमिकों और पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित लोगों की कठिनाइयां भी बढ़ जाती हैं.
इस असमानता का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि उत्सर्जन में अपेक्षाकृत कम योगदान देने वाले अनेक समुदाय जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभावों का सामना करते हैं. इसलिए जलवायु न्याय को केवल नैतिक आग्रह नहीं, बल्कि नीति निर्माण का आधार बनाना होगा. कमजोर समुदायों को वित्तीय सहायता, सुरक्षित आवास, स्वास्थ्य सेवाएं, सामाजिक सुरक्षा, बीमा और वैकल्पिक आजीविका के अवसर उपलब्ध कराना आवश्यक है.
भारत के सामने चुनौती विकास को रोकने की नहीं, बल्कि उसे टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल बनाने की है. ऊर्जा, परिवहन, उद्योग और शहरीकरण से होने वाले उत्सर्जन को कम करने के लिए सौर एवं पवन ऊर्जा, ऊर्जा दक्ष भवन, स्वच्छ सार्वजनिक परिवहन और कचरे का वैज्ञानिक प्रबंधन आवश्यक है. साथ ही, ऊर्जा की जरूरतों को पूरा करते समय पर्यावरणीय प्रभावों और सामाजिक न्याय का ध्यान रखना चाहिए.
इन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए प्रभावी नीतियों के साथ पर्याप्त वित्तीय संसाधन, स्वच्छ तकनीक, सक्षम प्रशासन और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप योजनाएं जरूरी हैं. विकसित देशों की ऐतिहासिक उत्सर्जन जिम्मेदारी तथा विकासशील देशों की आवश्यकताओं को देखते हुए अंतरराष्ट्रीय जलवायु वित्त और तकनीकी सहयोग भी महत्वपूर्ण है. शहरों में हरित क्षेत्रों का विस्तार, जल निकायों का संरक्षण और स्थानीय प्रजातियों के वृक्षों को बढ़ावा देना आवश्यक है. पर्यावरण संरक्षण के लिए प्राकृतिक वनों की रक्षा, पौधों की देखभाल, जैव विविधता का संरक्षण, जल निकासी और गर्मी के जोखिमों को ध्यान में रखकर शहरी नियोजन करना भी जरूरी है.
मौसम का बिगड़ता मिजाज अब भविष्य की कोई दूरस्थ आशंका नहीं, बल्कि वर्तमान की गंभीर चुनौती है. इसकी मार खेतों से शहरों तक, पहाड़ों से समुद्र तटों तक और अर्थव्यवस्था से आम आदमी की थाली तक दिखाई दे रही है. महात्मा गांधी का कथन 'पृथ्वी हर मनुष्य की जरूरत पूरी करने के लिए पर्याप्त संसाधन प्रदान करती है, लेकिन हर मनुष्य के लालच के लिए नहीं'. यह विचार आज के बदलते मौसम और गहराते पर्यावरणीय संकट के संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक है. प्रकृति के असंतुलन ने स्पष्ट कर दिया है कि विकास की वास्तविक सफलता केवल आर्थिक प्रगति में नहीं, बल्कि जीवन और पर्यावरण की सुरक्षा में निहित है.
अब समय आ गया है कि सरकारें दूरदर्शी नीतियां अपनाएं, प्रशासन अपनी जवाबदेही सुनिश्चित करे और नागरिक पर्यावरण संरक्षण को अपने दैनिक जीवन का हिस्सा बनाएं. जल संरक्षण, वृक्षारोपण, स्वच्छ ऊर्जा और टिकाऊ जीवनशैली जैसे छोटे-छोटे प्रयास सामूहिक रूप से बड़े बदलाव का आधार बन सकते हैं. हमें यह समझना होगा कि प्रकृति की रक्षा किसी एक पीढ़ी का दायित्व नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारी नैतिक जिम्मेदारी है. आज प्रकृति को बचाने का संकल्प ही कल मानवता को सुरक्षित रखने का सबसे मजबूत आधार बनेगा.
(नोटः लेखक विज्ञान-पर्यावरण विषय के विशेषज्ञ हैं)
डॉ सुशील द्विवेदी