केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की हालिया पोस्ट बैलेट बॉक्स इस्तीफा दो और “कांग्रेस ने 28 में से कितनी सीटें जीती...” ने एक बार फिर चुनावी प्रणाली पर चल रही बहस को केंद्र में ला दिया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी एक्स पर लिखा था कि उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार और कर्नाटक की 28 विधान परिषद सीटों पर बैलेट पेपर से चुनाव हुए, अब अनुमान लगाइए कि कांग्रेस ने कितनी सीटें जीतीं ? इन नतीजों ने विपक्ष के लंबे समय से चल रहे ईवीएम विरोधी अभियान पर सीधा प्रहार किया है. विशेषकर कांग्रेस शासित कर्नाटक में एनडीए का चारों सीटों पर जीतना इस बहस को और तीखा बना देता है.
विधान परिषद के ये चुनाव 23 अक्टूबर 2026 को हुए थे. इनमें उत्तर प्रदेश की शिक्षक और स्नातक सीटें, बिहार, कर्नाटक की शिक्षक-स्नातक सीटें और महाराष्ट्र की सीटें शामिल थीं. मतदान बैलेट पेपर से कराया गया. नतीजे आने के बाद कांग्रेस के खाते में एक सीट आई वो भी नागपुर से, जहां अभिजीत गोविंदराव वंजारी ने स्नातक विधानपरिषद चुनाव में जीत हासिल की.
कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार होने के बावजूद भाजपा-जनता दल (सेक्युलर) गठबंधन ने सभी चार सीटें जीत लीं. बेंगलुरु टीचर्स सीट कांग्रेस से छिन गई, जबकि अन्य सीटों पर भाजपा ने अपनी स्थिति मजबूत रखी. ये चुनाव सीमित मतदाता समूह जैसे शिक्षक और स्नातक के बीच होते हैं, इसलिए इनका व्यापक लोकसभा या विधानसभा चुनावों से सीधा तुलना नहीं किया जा सकता. फिर भी, बैलेट पेपर के इस्तेमाल के बावजूद कांग्रेस का प्रदर्शन विपक्ष की उस दलील को कमजोर करता है जो हर हार के पीछे ईवीएम को दोषी ठहराती रही है.
कांग्रेस और कई अन्य विपक्षी दल लंबे समय से ईवीएम की जगह बैलेट पेपर की मांग करते आए हैं. राहुल गांधी समेत कई नेताओं ने वोट चोरी, मतदाता सूची में हेरफेर और मशीनों में गड़बड़ी के आरोप लगाए. उन्होंने चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाए और बैलेट पेपर को पारदर्शी विकल्प बताया. तर्क यह था कि मशीनों में गड़बड़ी संभव है, जबकि कागज पर मतदान में धांधली कम होती है या आसानी से पकड़ी जा सकती है. ये मांगें 2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों के बाद और तेज हुईं. कई राज्यों में भी विपक्ष ने ईवीएम पर अविश्वास जताया. लेकिन जब बैलेट पेपर वाले चुनाव में भी परिणाम उनके खिलाफ आए, तो यह अभियान एक नई परीक्षा से गुजर रहा है.
अमित शाह का तंज इसी विरोधाभास को उजागर करता है. अगर समस्या मशीन में थी, तो बैलेट पेपर में कांग्रेस को बेहतर प्रदर्शन करना चाहिए था. खासकर कर्नाटक में, जहां उसकी अपनी सरकार है और स्थानीय प्रशासन पर उसका प्रभाव माना जाता है. वहां चारों सीटें गंवाना केवल तकनीकी गड़बड़ी से नहीं समझाया जा सकता. विपक्ष का कहना है कि ये चुनाव सीमित और विशिष्ट मतदाता समूह के हैं, इसलिए इन्हें सामान्यीकरण नहीं किया जा सकता. शिक्षक और स्नातक मतदाता राजनीतिक रूप से जागरूक होते हैं और उनकी प्राथमिकताएं अलग हो सकती हैं. फिर भी, अगर बैलेट पेपर भी हार नहीं रोक सका, तो ईवीएम को एकमात्र दोषी बताना कमजोर पड़ता है.
यह घटना लोकतांत्रिक बहस की गुणवत्ता पर भी सवाल उठाती है. हर हार के बाद मशीन या प्रक्रिया को दोष देना राजनीतिक जिम्मेदारी से बचने का तरीका बन सकता है. भारत में चुनाव आयोग ने ईवीएम की विश्वसनीयता पर कई बार रिपोर्ट दी हैं. वीवीपैट (VVPAT) जैसी व्यवस्थाएं लागू की गईं. कई अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों ने भी भारतीय चुनाव प्रक्रिया की सराहना की है. फिर भी, विपक्ष का अविश्वास बना रहा. बैलेट पेपर वाले चुनावों में भी धांधली के आरोप लगते रहे हैं. बूथ कैप्चरिंग, मतदान में देरी और गिनती में विवाद बैलेट युग की पुरानी समस्याएं थीं. ईवीएम आने के बाद कई ऐसे मुद्दे कम हुए.
कर्नाटक के नतीजे कांग्रेस के लिए आंतरिक चुनौती भी हैं. राज्य में उसकी सरकार के बावजूद स्थानीय स्तर पर मतदाताओं का समर्थन कमजोर दिखा. यह शासन के प्रदर्शन, उम्मीदवार चयन या स्थानीय मुद्दों से जुड़ा हो सकता है. विपक्ष के लिए यह संकेत है कि केवल तकनीकी बदलाव की मांग से चुनावी सफलता नहीं मिलती. जनता के मुद्दे, संगठन और संदेश अधिक मायने रखते हैं. भाजपा ने इन नतीजों को बटन या बैलेट, नतीजा एक ही का संदेश दिया है. यह राजनीतिक जवाबी हमला है, लेकिन इसमें तथ्यात्मक आधार भी है.
लोकतंत्र में हर पक्ष को अपनी शिकायत रखने का अधिकार है. चुनाव प्रक्रिया में सुधार की मांग वैध हो सकती है. लेकिन जब एक ही मांग बार-बार दोहराई जाए और जब उस प्रणाली (बैलेट पेपर) में भी हार हो तो आत्मचिंतन जरूरी हो जाता है. कांग्रेस को यह तय करना होगा कि वह प्रक्रिया पर सवाल उठाती रहे या अपने संगठनात्मक और राजनीतिक आधार को मजबूत करे. ईवीएम विरोधी अभियान अब तक राजनीतिक उपकरण के रूप में काम करता रहा है. इन नतीजों से उसे धक्का जरूर लगा है.
अंततः, चुनावी विश्वसनीयता जनता के विश्वास पर टिका होता है. अगर विपक्ष हर हार को मशीन या मतदाता सूची से जोड़ता रहेगा, तो जनता को यह संदेश जाएगा कि हार की जिम्मेदारी कहीं और है. बैलेट बॉक्स वाले चुनावों में भी इस तरह का प्रदर्शन इस संदेश को मजबूत करता है कि समस्या केवल तकनीक में नहीं है. भारतीय लोकतंत्र की मजबूती इस बात में है कि वह विभिन्न प्रणालियों में काम करे और परिणाम स्वीकार किए जाएं. अमित शाह का तंज एक राजनीतिक चुटकी है, लेकिन यह विपक्ष के लिए एक गंभीर सवाल भी छोड़ता है. अगर बैलेट पेपर भी पर्याप्त नहीं है, तो फिर अगली मांग क्या होगी? लोकतंत्र में जवाब चुनावों और जनता के फैसले से आते हैं, न कि केवल प्रक्रिया बदलने की मांग से.
संयम श्रीवास्तव