पिछले 75 साल से पाकिस्तान की सियासत में कश्मीर का नारा लोगों में जोश और जुनून भरने के काम आता रहा. नेता और फौज ने मिलकर कश्मीर में आतंकवाद को अपना कारोबार बनाया. लेकिन, धारा 370 हटाए जाने के सात साल बाद आज LoC के उस पार नजारा 180 डिग्री पलट गया है.
5 अगस्त 2019 के ठीक बाद पाक अधिकृत कश्मीर (PoK) के मुज़फ़्फ़राबाद का वो नज़ारा याद कीजिए. भारत की तरफ से धारा 370 खत्म किए जाने से बौखलाए पाकिस्तान के उस वक्त के प्रधानमंत्री इमरान खान भागते हुए मुज़फ़्फ़राबाद पहुंचे थे. वहां एक बड़ा जलसा-रैली बुलाई गई. भड़काऊ तकरीरें हुईं, और 'कश्मीर की आज़ादी' के लंबे-चौड़े दावे किए गए. पाकिस्तान के हुक्मरानों ने अपनी अवाम को यकीन दिलाने की कोशिश की थी कि वे भारत के इस कदम के खिलाफ पूरी दुनिया को हिलाकर रख देंगे.
पिछले साल अप्रैल में भी पाक सेना प्रमुख आसिम मुनीर ने इस्लामाबाद में ओवरसीज पाकिस्तानियों के एक जलसे में कश्मीर को पाकिस्तान की शाह-ए-रग कहा था. वैसे तो शाह-ए-रग गले की नस को कहा जाता है जो सबसे अहम मानी जाती है. लेकिन, इस मिसाल से ये जताना चाह रहे थे कि वे भारत के खिलाफ लड़ रहे कश्मीरी अलगाववादियों को समर्थन देते रहेंगे. ये और बात है कि उन्होंने अपना ‘समर्थन’ पहलगाम में आतंकी हमला करवाकर जताया. और उसके बाद जो हुआ, वह इतिहास है.
लेकिन, जिस कश्मीर के लिए पाकिस्तानी हुक्मरान जिहाद फाइनेंस करते रहे थे, उसके उलट उनके कब्जे वाले कश्मीरियों ने रिवर्स जिहाद कर दिया है. आज 2026 में वही पाक अधिकृत कश्मीर खुद जल रहा है. ‘शाह-ए-रग’ में इस्लामाबाद की तरफ से फौज की गोली आ रही है, तो बदले में इधर से इंकलाब की आग लौट रही है.
जिस मुज़फ़्फ़राबाद से कभी भारत के खिलाफ ज़हर उगला जाता था, आज वही इलाका इस्लामाबाद की हुकूमत और रावलपिंडी में बैठी पाकिस्तानी फौज के खिलाफ बगावत का सबसे बड़ा गढ़ बन चुका है. जिन कश्मीरी लोगों को पाकिस्तान 'आज़ादी' के हसीन सपने दिखाता था, आज वही लोग आटे की तंगी, बिजली के भारी-भरकम बिलों और पाकिस्तानी रेंजर्स के जुल्म से तंग आकर सड़कों पर उतरे हुए हैं.
नाइंसाफी का पानी नाक से ऊपर
किस्मत का खेल देखिए कि आज मुज़फ़्फ़राबाद, रावलाकोट और मीरपुर की गलियों में नारे पाकिस्तान के हक में नहीं, बल्कि इस्लामाबाद की नाइंसाफी के खिलाफ लग रहे हैं. वहां का आम इंसान अब चीख-चीखकर कह रहा है कि "हमारी नीलम और झेलम नदियों के पानी से बिजली बनाकर पूरे पाकिस्तान को रोशन किया जाता है, और हमारे अपने ही घरों को अंधेरे में धकेल कर हमारा खून चूसा जा रहा है."
हद तो तब हो गई जब पाकिस्तानी फौज और उनके रेंजर्स ने अपने हक के लिए आवाज उठा रहे निहत्थे लोगों पर लाठियां और गोलियां बरसाना शुरू कर दिया. आज PoK के लोगों के लिए पाकिस्तानी फौज किसी हमदर्द की तरह नहीं, बल्कि जुल्म का दूसरा नाम बन चुकी है.
हवा हुए पाक हुक्मरान
कभी अपने इशारों से कश्मीर घाटी में आतंक का खेल खेलने वाले पाकिस्तान के नेता और फौज आज पाक अधिकृत कश्मीर में भी आने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं. कभी कश्मीर मुद्दे पर आग उगलने वाले इमरान खान आज जेल में हैं. जरदारी और शरीफ खानदान इस्लामाबाद, लाहौर और कराची से सिर्फ बयानबाजी कर रहे हैं. आसिम मुनीर और उनकी फौज के लिए PoK वालों का आंदोलन सिर्फ गोली का हकदार है. पिछले दिनों PoK में चुनाव धांधली के बाद माहौल गरमाया हुआ है. वहां की सिविल सोसायटी के संगठन JAAC (जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी) के कहने पर आंदोलन चलाया जा रहा है. जिसमें पुलिस और सेना की गोली से अब तक 90 लोग मारे जा चुके हैं.
भारत वाले कश्मीर की दुहाई
सबसे दिलचस्प और कड़वी सच्चाई यह है कि आज PoK की सड़कों पर गुस्साए लोग अपनी बदहाली पर रोते हुए, LoC के इस पार यानी भारत वाले खुशहाल और तरक्की करते कश्मीर की मिसालें दे रहे हैं. वे देख रहे हैं कि जिस श्रीनगर में कभी बंद, हड़ताल और पत्थरबाज़ी का खौफ हुआ करता था, आज वहां जगमगाते बाजार, नए रेलवे पुल, रात-दिन की चहल-पहल और करोड़ों सैलानियों की रौनक है.
इमरान खान की उस बौखलाहट भरी रैली से लेकर आज के इस जन-आंदोलन तक, इन सात सालों में पासा ऐसा पलटा है कि पाकिस्तान का 'कश्मीर दांव' उसी के गले की फांस बन चुका है. इस्लामाबाद ने जिन कश्मीरियों के नाम पर दशकों तक दुनिया भर में अपनी सियासत चमकाई, आज वही कश्मीरी पाकिस्तान की नाकामी और ज़ुल्म का सबसे बड़ा सबूत बनकर खड़े हैं.
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