न नर्सों ने ध्यान दिया, न समय पर हुआ इलाज! MP के सिवनी जिला अस्पताल में 3 महीने के भीतर 46 नवजातों ने तोड़ा दम, मचा हड़कंप

मध्य प्रदेश के सिवनी जिला अस्पताल के SNCU वार्ड में 1 जुलाई से 30 सितंबर के बीच 46 नवजात बच्चों की मौत हुई. छह महीने में 80 बच्चों की मौत का मामला सामने आया है. अस्पताल प्रबंधन ने समय से पहले जन्म, कम वजन और गंभीर हालत को वजह बताया. वहीं, डॉक्टरों की उपलब्धता पर भी सवाल उठ रहे हैं.

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सिवनी में स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर गरमाई सियासत.(Photo:ITG) सिवनी में स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर गरमाई सियासत.(Photo:ITG)

पुनीत कपूर

  • सिवनी,
  • 12 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 5:01 PM IST

मध्य प्रदेश के सिवनी जिला अस्पताल से एक बेहद दर्दनाक और झकझोर देने वाली खबर सामने आई है. जिले के सरकारी अस्पताल स्थित स्पेशल न्यू बोर्न केयर यूनिट (SNCU) वार्ड में बीते 3 महीनों के दौरान 46 नवजात बच्चों की मौत हो जाने से पूरे स्वास्थ्य महकमे में हड़कंप मच गया है.

आंकड़ों के मुताबिक, 1 जुलाई से 30 सितंबर के बीच एसएनसीयू में कुल 592 बच्चों को भर्ती कराया गया था, जिनमें से 46 मासूमों ने दम तोड़ दिया. इसका मतलब है कि हर एक दिन के अंतराल पर एक बच्चे की मौत हुई. वहीं, यदि पिछले 6 महीनों (1 अप्रैल से 30 सितंबर) की बात करें तो SNCU में दम तोड़ने वाले नवजात बच्चों का कुल आंकड़ा 80 तक पहुंच चुका है.

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सरकारी दावों और व्यवस्थाओं के बीच अपनों को खोने वाले परिवारों का रो-रोकर बुरा हाल है. पीड़ितों का आरोप है कि अस्पताल में समय पर सही इलाज और डॉक्टरों की अनदेखी के कारण उनके बच्चों की जान गई.

डुंगरिया निवासी मृत बच्चे के पिता मनीष वरकड़े ने बताया, ''मैंने 12-13 जुलाई को अपनी पत्नी को अस्पताल में भर्ती कराया था, लेकिन किसी ने ध्यान ही नहीं दिया. दो दिन गुजर गए, सिर्फ एक इंजेक्शन लगाया और कुछ नहीं बताया. पेट से पानी बहते जा रहा था तो नर्स ने कहा कि पेट दबाकर रखो. तीन दिन बाद पहले नॉर्मल डिलीवरी की कोशिश की और फिर ऑपरेशन किया. बच्चे का वजन करीब 3 किलो था, लेकिन दिल पत्थर की तरह जम गया था. डॉक्टर्स ने कहा कि बच्चा रोया नहीं है इसलिए बचना मुश्किल है और उसे आईसीयू में रख दिया, जहाँ उसने दम तोड़ दिया.''

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जावरकाठी निवासी संजय उइके ने बताया, ''7 सितंबर को पत्नी को डॉक्टर के पास ले गए तो उन्होंने शरीर में पानी की कमी बताई. इलाज के बाद खून आने लगा तो हमने उसे भर्ती कराया. पहले बरघाट ले गए, वहां से सिवनी रेफर कर दिया गया. सिवनी में भर्ती कराने के कुछ देर बाद ही नॉर्मल डिलीवरी हो गई. डॉक्टर ने कहा कि धड़कनें कम हैं और मशीन में रखना पड़ेगा. 4-5 दिन बच्चा मशीन में रहा, फिर कहा कि दूसरी मशीन में शिफ्ट करना पड़ेगा और कुछ घंटे बाद बच्चे ने दम तोड़ दिया. सातवें महीने में डिलीवरी हुई थी और बच्चे का वजन 1.6 किलो था.''

विधायक ने किया अस्पताल का दौरा

मामले की गंभीरता को देखते हुए स्थानीय बीजेपी विधायक दिनेश राय ने जिला अस्पताल के SNCU वार्ड का औचक निरीक्षण किया और मौके पर मौजूद डॉक्टरों की कार्यशैली व गैरमौजूदगी पर कड़े सवाल उठाए. विधायक ने इस पूरे मामले की शिकायत जिला कलेक्टर से लेकर मुख्यमंत्री स्तर तक करने की बात कही है. देखें VIDEO:- 

सिविल सर्जन ने दी सफाई

दूसरी ओर, जिला अस्पताल के सिविल सर्जन डॉ. विनोद कुमार नावकर ने मौतों के पीछे बच्चों की गंभीर हालत और कम वजन को मुख्य वजह बताया है.

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सिविल सर्जन डॉ. विनोद कुमार नावकर ने बयान में कहा, SNCU में जो बच्चे भर्ती होते हैं, वे सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों से आते हैं. कई बार 6 महीने या 7-8 महीने में पैदा हुए बच्चे होते हैं, जिन्हें एस्फिक्सिया इंजरी (Asphyxia Injury) होती है.

सरकार ने हर जिले में SNCU इसीलिए स्थापित किए हैं ताकि गंभीर नवजात शिशुओं का उपचार हो सके. वहां एक महीने से ज्यादा के शिशु नहीं रहते और ऐसे शिशुओं में मृत्यु दर काफी होती है.

WHO और भारत सरकार के डेटा के मुताबिक, जन्म के समय बच्चे का वजन ढाई किलो होना चाहिए, लेकिन समय से पहले डिलीवरी की वजह से बच्चों का वजन कम होता है और उनमें डेथ रेट 48 फीसदी तक होता है.

बीते 6 महीने में हमने 1188 शिशुओं का उपचार किया है, जिनमें से 642 बच्चों का वजन सामान्य से कम था और उनमें से 60 बच्चों को हम नहीं बचा पाए. हालांकि WHO और सरकार का रिकमेंडेड मॉर्टेलिटी रेट 10 फीसदी है, लेकिन हमारे यहाँ यह 7.5 फीसदी है, जो जबलपुर संभाग के बाकी जिलों के मुकाबले कम है.

इसके अलावा एक बड़ी वजह यह भी है कि जिला अस्पताल, सिवनी मेडिकल कॉलेज से संलग्न है. हम मेडिकल कॉलेज के शिशु रोग विभाग से जो सहयोग चाहते थे, उनका ड्यूटी रोस्टर ही नहीं बना है. अगर मेडिकल कॉलेज के डॉक्टर यहां ड्यूटी करेंगे, तो हम व्यवस्थाओं को और बेहतर कर पाएंगे."

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भले ही अस्पताल प्रबंधन कम मृत्यु दर का हवाला देकर राहत की सांस ले रहा हो, लेकिन तमाम आधुनिक चिकित्सा उपकरणों और विशेषज्ञ डॉक्टरों की मौजूदगी के दावों के बीच 3 महीने में 46 नौनिहालों की मौत ने स्वास्थ्य व्यवस्थाओं की पोल खोलकर रख दी है.

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