जज की कुर्सी छोड़ बेटी ने चुना वैराग्य... विंटेज कारों-शाही बग्घियों से हुई विदाई तो भावुक हो गए लोग

मध्य प्रदेश के बैतूल की प्रखरश्री दीदी ने जज की परीक्षा पास करने के बाद ज्वाइनिंग से पहले ही साध्वी बनने का फैसला किया है. बचपन से वैराग्य की भावना रखने वाली प्रखर ने महावीर के मार्ग पर चलकर समाज सेवा करने की इच्छा जताई. उनकी विदाई के लिए विंटेज कारों, शाही बग्घियों और उदयपुर के बैंड के साथ भव्य शोभायात्रा निकाली गई.

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प्रखरश्री, जिन्होंने जज की नौकरी ज्वाइन नहीं की और साध्वीं बन गईं. (Photo: ITG) प्रखरश्री, जिन्होंने जज की नौकरी ज्वाइन नहीं की और साध्वीं बन गईं. (Photo: ITG)

राजेश भाटिया

  • बैतूल,
  • 02 नवंबर 2026,
  • अपडेटेड 9:04 AM IST

माता-पिता का सपना था कि बेटी जज बने. बेटी ने मेहनत की और जज की परीक्षा भी पास कर ली. लेकिन नौकरी ज्वाइन करने से पहले ही उसने ऐसा फैसला लिया, जिसने पूरे परिवार को भावुक कर दिया. मध्य प्रदेश के बैतूल की इस बेटी ने जज की कुर्सी के बजाय महावीर के बताए रास्ते पर चलने का फैसला किया. अब वह सांसारिक जीवन छोड़कर साध्वी बनने जा रही है. बेटी की इस अनोखी विदाई को यादगार बनाने के लिए परिवार ने विंटेज कारों, शाही बग्घियों और बैंड-बाजे के साथ भव्य शोभायात्रा निकाली.

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दरअसल, बैतूल में ब्रह्मचारिणी प्रखरश्री दीदी समेत पांच दीक्षार्थी बहनों के सम्मान में भव्य बिनौली चल समारोह आयोजित किया गया. इस दौरान शहर की सड़कों पर आस्था, भक्ति और वैराग्य का अनूठा संगम देखने को मिला. विंटेज कारों का काफिला, आकर्षक शाही बग्घियां और राजस्थान के उदयपुर से आए बैंड की प्रस्तुति समारोह का मुख्य आकर्षण रही.

जज बनने के बाद भी क्यों चुना साध्वी जीवन?
प्रखर दीदी ने बताया कि उनके माता-पिता की इच्छा थी कि वह एक बार जज की परीक्षा पास करें. उन्होंने यह सपना पूरा कर दिया. हालांकि, बचपन से ही उनके मन में वैराग्य का भाव था. उनका कहना है कि जज या वकील बनकर वह समाज की उतनी सेवा नहीं कर पातीं, जितनी महावीर के मार्ग पर चलकर कर सकती हैं.

उनके इस फैसले ने परिवार के सामने खुशी और भावुकता के मिले-जुले पल ला दिए. जिस बेटी को माता-पिता जज की कुर्सी पर देखना चाहते थे, अब उसे संयम और त्याग के रास्ते पर विदा कर रहे हैं.

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इस समारोह में प्रखरश्री दीदी के साथ चार अन्य दीक्षार्थी बहनें भी शामिल हुईं. पांचों बहनों का जगह-जगह पुष्पमालाओं और जयकारों के साथ स्वागत किया गया. बड़ी संख्या में जैन समाज के लोग और दूर-दराज से आए श्रद्धालु इस शोभायात्रा में शामिल हुए. चल समारोह जैन दादावाड़ी पहुंचकर संपन्न हुआ, जहां पांचों दीक्षार्थी बहनों की गोदभराई की पारंपरिक रस्म निभाई गई.

रंगीन कपड़ों से सफेद वस्त्रों तक का सफर
सहारनपुर की बाल ब्रह्मचारिणी रंगोली दीदी ने बताया कि यह हर बेटी की अंतिम विदाई जैसा भावुक पल है. फिलहाल सभी दीक्षार्थी बहनों ने रंगीन वस्त्र पहने हैं. दीक्षा के बाद वे सफेद वस्त्र धारण कर लेंगी.

पांचों बहनें 22 नवंबर को जैनेश्वरी दीक्षा ग्रहण करेंगी. इसके बाद उनका जीवन संयम, तपस्या और साधना को समर्पित होगा. बैतूल में विंटेज कारों और शाही बग्घियों के साथ निकली यह विदाई इसलिए भी खास रही, क्योंकि इसके पीछे एक ऐसी बेटी की कहानी है, जिसने जज बनने का सपना पूरा करने के बाद खुद के लिए बिल्कुल अलग रास्ता चुना.

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