कानपुर और लखनऊ ... ये दो शहर उन कज़ंस भाइयों की तरह हैं… जिनका काम एक दूसरे के बगैर चलता नहीं है, एक-दूसरे के यहां खूब आना जाना भी है.... लेकिन ये दोनों जैसे ही मौका पाते हैं किसी तीसरे के सामने ये कहने से नहीं चूकते.... देखिए भई अब उन लोगों का तो आप को मालूम ही है... हैं... न खाने की तमीज़ है, न पहनने की, न बोलने की... भई वो कितनी भी नकल लें हम लोग की तरह थोड़ी हो पाएंगे। जैसे... कानपुर कहेगा... भई देखिए ये इकाना-विकाना स्टेडियम तो जुम्मा-जुम्मा सात दिन की बात हैं, इतरा रहे हैं मार.... अरे हमा ग्रीन पार्क स्टेडियम पचासों साल से चल रहा है। उनसठ में ऑस्ट्रेलिया को हराया था पहली बार.... समझे.. बातें झटील रहे हैं मार... ये लखनऊ वाले बाहर बने रहते हैं नवाब... और घर में देखो तो चीकट कपड़े पहने तखत पर पड़े रहते हैं...
लखनऊ बोलेगा... अब देखिए साहब, “हम तो भई कहते नहीं हैं.. हमारा मिज़ाज नहीं इधर की उधर करने का...लेकिन अब जो बात हमारे इदरीस भाई की बिरयानी में है... वो आपको उनकी मिर्चा झोंक बिरयानी में मिलेगा? ये सब लुचूई खाने वाले लोग हैं ये क्या जाने शीरमाल... भई हमारी नज़ाकत, नफासत... उर्दू दां ज़बान के क्या कहने.... और भई देखिए, हमारी तहज़ीब जो है वो पूरी दुनिया में मशहूर है... भाई हमारा पानदान वाला हिसाब-किताब है... उनका गुटखा वाला है।
अब सच बताएं तो भई हमें तो दोनों शहर प्यारें है... दोनों से हमारा रिश्ता है... लेकिन ये जो दोनों शहरों की मीठी नोक-झोंक है इसी के बारे में है आज की कहानी....जिसमें हम बताएंगे कि ये नोकझोंक शुरु कब हुई... कौन थे कानपुर के सिकंदर चचा जिन्होंने कसम खा ली थी कि खानदान में किसी का रिश्ता लखनऊ से नहीं होने देंगे... और क्यों? लखनऊ और कानपुर के बीच कॉनफ्लिक्ट है किस बात का.... आज की कहानी लखनऊ-कानपुर में... शुरु करते हैं
कहानी शुरु
तो ये मसला है कुछ 2007 के आसपास का... कानपुर सेंट्रल रेलवे स्टेशन के प्लैटफ़ॉर्म नंबर तीन पर रुकी अवध एक्सप्रेस के एक डिब्बे में एक फैमिली बैठी हुई थी। ये उस ज़माने की बात है जब लखनऊ-कानपुर का हाइवे नहीं बना था... रोड खराब थी इसलिए ट्रेन प्रिफर करते थे लोग... तो साहब... ये फैमिली थी कुद्दूसी साहब की फैमिली... उनके बेटे शारिक का रिश्ता लगा था लखनऊ के एक घर में जहां ये लोग जा रहे थे।
अच्छा शारिक के बारे में बता दें... ये वैसे तो थे, लेकिन फिलहाल कानपुर में फूड व्लागर करते थे... वो होते हैं ना जो सड़क किनारे चाट के ठेले, मोमोज़ के खोमचों, छोले भटूरे के ठेलों पर जाकर पूछते हैं, “तो भैय्या ये क्या आ गया... धनिया... और ये सफेद-सफेद डाल दिया.. अच्छा नमक... नमक भी पड़ता है? और ये क्या चीज़ है... पहली बार देख रहे हैं.. अच्छा बटर है… ये इतना सारा पूरा बटर डाल दोगे.. ओहोहोहो... आहाहा” उस टाइप का काम था उनका... पर ख़ैर अच्छा कमा-खा रहे थे...
तो ट्रेन में... खुद शारिक थे... कुद्दूसी साहब खुद तो नहीं थे लेकिन उनके भाई यानि शारिक के चचा सिकंदर चचा.. और शारिक की अम्मी थीं।
ट्रेन जब आउटर पर रेंगने लगी तो शारिक की अम्मी जिन्हें हम अब चची कहेंगे... चची बोलीं... “अए लेट हो गयी ट्रेन मार ऐं.... कह रहे थे गाड़ी कर लो... गाड़ी कर लो... कोई सुनता कहां हैं... अरे लड़की वालों के घर जा रहे हैं... और वो भी लखनवी लोग हैं... आप जनाब करके ऐसी महीन बेसती मारते हैं कमबख्त मारे.. कि दो मिनट में आदमी का अकबरी गेट कर देते हैं...”
सिकंदर चचा ने गुटखे की पीक खिड़की से बाहर मारी, होंठ पोंछ के बोले, “अरे इनके आप-जनाब की ऐसी तैसी... ऐं... दिखावा ऐसा करेंगे कि सब नवाबी हैं और घोड़ा गाड़ी में घूमते हैं, जा के देखो सब ई-रिक्शा में लटके होते हैं... भैय्या, रोक के चलना। भाभी अब तो नखलऊ में इतने लोग नहीं हैं जितने ई रिक्शा हैं...”
अच्छा कहानी आगे बढ़ाने से पहले एक बात ये बता दें कि सिंकदर भाई का लखनऊ से नफरत का मसला ये था कि किसी ज़माने में किसी लखनऊ वाली ने उनका दिल तोड़ दिया था... कैसरबाग़ की कोई लड़की थी... भातखंडे में कत्थक सीख रही थी... तो कुछ था बेवफ़ाई का मामला। तो उसी ज़माने से वो लखनऊ से बहुत चिढ़ते थे... उनका सिंगल सीक्रेट एजेंडा यही था कि ये रिश्ता ना हो पाए... वो रिश्ता तोड़ने के लिए ही जा रहे थे।
ये रिश्ता लगा था लखनऊ में एक रिटायर्ड सरकारी टीचर अनवार साहब... की बेटी शीज़ा से लगा था... शीज़ा बहुत शरीफ लड़की थी, घरेलू टाइप की... वो होती हैं अंडे की खाली ट्रे से वॉल हैंगिंग बनाने वाली... वो खाली डिब्बों में बल्ब लगा के साइड लैंप बनाने वाली... लेकिन हां खाने पीने की शौकीन थी... अक्सर रात को दस नब्बे पर मैगी खाने जाती थी... और बोलती भी था जहां बोलना हो... जैसे चारबाग से लौटते हुए विक्रम टैक्सी वालों से लड़ती थी कि भैय्या तीन की जगह चार सवारी क्यों बैठा रहे हो। यानि खूबसूरत थी, खूबसीरत थी। अच्छी थी।
तो ख़ैर... ट्रेन चारबाग स्टेशन पर रुकी और इन लोगों ने टैंपो पकड़ा और अनवार साहब के घर की तरफ चल दिए। रास्ते में चची बोलीं, “भैय्या हम तो जैसे ही पहुंचेगे सबसे पहले बाथरूम जाएंगे”
- काहे अम्मा?
- अरे भैय्या, जैसे आदमी को पहचानना हो तो उसके जूते देखो, किसी का घर देखना हो तो बाथरूम देखो... समझे... उसी से पता चलता है कितने सफाईपसंद हैं?
तो ख़ैर... टैंपो एक गली में दो मंज़िला सफ़ेद पुराने मकान के सामने जाकर रुका...
“अरे आइये, आइये...आदाब अर्ज़ है...” शीज़ा के मामूजान... मुन्ने मामू ने मेहमानों की गाड़ी के दरवाज़े पर आते ही गाड़ी के साथ तकरीबन दौड़ते हुए इस्कबाल किया.... “आदाब अर्ज़ है, आदाब... ”
- आइये, आइये... तशरीफ रखिए..
सिंकदर चचा बोले, “अमां भैय्या, रुकने तो दो... गुझ जाओगे क्या अंदर... रुकेगी गाड़ी बाहर आएगा आदमी... आदाब-आदाब करके दाब लोगे क्या ऐं”
- नहीं, नहीं वो... आइये... तश्रीफ रखिए
- अरे तशरीफ की तशतरी बन गयी बैठे-बैठे... इतनी ख़राब सड़कें हैं आपके नखलऊ की... इससे अच्छा तो हमां कानपुर है... जरीब चौकी से परेड तक चम्मच में पानी लेकर चले जाओ तो छलकेगा नहीं...
दानिश बोले, “अरे वो... सड़क तो बन गयी थी लेकिन फिर याद आया कि पाइप लाइन डालना ही भूल गए ... तो अभी फिर से खुदाई चल रही है... आइये अंदर आइये”
ख़ैर, थोड़ी देर बाद सब लोग एक ऊंची छत वाले कमरे में बैठे थे। सोफ़े पर अम्मा और शारिक। उनके बगल में सिंकदर चचा। चचा के बगल में मुन्ने मामू और उनकी बीवी। सामने वाली कुर्सी अनवार साहब के लिए खाली थी। यानि शीज़ा के वालिद साहब के लिए। जो मेन थे
अनवार साब खांटी लखनवी आदमी थी... आधी रात को सोते हुए अंधेरे कमरे में खुट से आवाज़ भी हो... तो उठकर पहले शेरवानी पहनते थे, टोपी लगाते थे फिर आवाज़ देते थे “कौन है?” नज़ाकत ऐसी कि दस्तरख्वान पर कौन सी प्लेट किधर होगी ये तय था... चम्मच कितने डिग्री पर रखे होंगे और जग में पानी कितना ठंडा होगा... शेरवानी में दो बार इस्त्री करवाते थे ताकि शिकन न रहे। हालांकि रहते किराए के मकान में थे लेकिन नवाबी ऐसी कि नौकर रखे थे... जो खाने के बाद डोंगे में नीबू निचोड़ कर लाता था जिसमें वो बड़ी शाइस्गी से अपनी उंगलियां डुबोते और फिर एक साफ कपड़े से छुआ कर मुंछों पर लगाते। नज़ाकत का मुजस्समा थे अनवार साहब... एक बार तो शीज़ा का रिश्ता सिर्फ इसलिए ठुकरा दिया कि लड़के ने बिना मुंह पर हाथ लगाए खांस दिया था।
ख़ैर थोड़ी देर बाद कमरे में वो तश्रीफ लाए.... “अस्सलामवालेकुम”
आवाज़ सुनकर सब खड़े हो गए.... “आइये-आइये वालेकुम सलाम” ... सब खड़े हुए तो सिकंदर भी खड़े हो गए... फिर कुछ सोच कर बैठ गए... इगो आ गया… हम क्यों खड़े हों...
“ख़ैर-मकदम है आप लोगों का.. बैठिये.. माज़रत चाहते हैं कुछ खास मेहमान नवाज़ी नहीं कर पाए” प्रिसिंपल साहब ने शेरवानी की शकन बराबर करते हुए कहा। फिर थोड़ी देर घर खानदान की बातचीत के बाद बोले, “भई ये तो बहाने होते हैं... लोग मिलते हैं, बात करते हैं वरना रिश्ते तो ऊपर ही तय हो जाते हैं... लाइये भई नाश्ता वाश्ता ले आइये”
इधर चची शारिक के कान में फुसफुसाएं, “हम बाथरूम हो आएं?”
“अरे रुक जाओ.. अम्मी... आते ही घुस जाओगी बाथरूम क्या... रुको अभी..”
तभी सामने वाली मेज़ पर नाश्ते की प्लेटे रखी जाने लगीं... एख प्लेट में बिस्किट में, अगली में नमकीन, एक में समोसे... और हर प्लेट के मेज़ पर आते ही.... शारिक के मुंह से निकलता... “ये क्या आ गया भाई साहब... ओहहो बिस्किट.... और ये क्या आ गया...सीख कबाब.... और ये आ गया..”
ये बेटा वो है... नमक
नमक है.. अच्छा। सफेद सफेद लग रहा है
ओह्हो... और ये क्या आ गया...
- ये बेटा वो है.... पानी... पानी समझते हो पिया जाता है... गला तर हो जाता है...
अरे अंकल... वो असल में हमाए धंधे का उसूल है... पूछना पड़ता है... कैमरा ऑन होते ही सब याद नहीं रहता ही नाम भूल जाते हैं।
अनवार साहब ने सिंकदर चचा की तरफ देखा....
“तो आप चचा हैं”
“हैं? हां.. हां.. हम चचा हैं” सिकंदर हड़बड़ा गए “तो क्या हुआ”
“नहीं, कुछ नहीं। अनवार साहब मुस्कुराए, आप ये गलावटी कबाब खाइये। ये हमारे पड़ोस में एक मोहतरमा रहती हैं गुलफिशां नाम है, उन्होंने बनाया है फिर मुस्कुरा के बोले “ऐसे कवाब आपको पूरे कानपुर में नहीं मिलेंगे”
सिंकदर चचा के दिल में ठक्क करके लगी ये बात। दिल तो किया कि शेरवानी फाड़ दे अनवार साहब की लेकिन उस वक्त कुछ कह नहीं पाए... खून के घूंट पीकर रह गए।
अनवार साहब बोल, “चलिए भई फिर लड़का लड़की का आमना सामना करा देते हैं... शीज़ा को बुला लेते हैं.... बेटी शीज़ा”
जैसे ही उन्होंने आवाज़ दी... बराबर वाले कमरे से हाथ में चाय की ट्रे लिये हुए एक खूबसूरत सी लड़की सर पर दुपट्टा लिये दाखिल हुई। शारिक ने शीज़ा को देखा, तो बस देखता ही रह गया.... वो झुकी-झुकी सी नज़र, वो रौशन चेहरा, वो कानों के पीछे से एक घूमी हुई सी लट... वो मुस्कुराने पर किनारे वाले दांत पर चढ़ा हुए एक दांत... वो अब्रू पर एक पुराना कट का निशान... खूबसूरत थी शीज़ा... कसम मुबीन की नहारी की.... शारिक को लगा कि यार इनके लिए तो वो सीने पर गोली खा सकता है।
तो वो कायदे से बैठ गयीं... “सलालेकुम” उसने धीरे से कहा... “वालेकुम सलाम-वालेकुम सलाम” की आवाज़ कमरे में गूंजने लगीं।
शारिक नज़र चुरा के उसे देखने लगा। अनवार साहब बोले, “हां भई तो आप लोगों को पूछना तो पूछ लीजिए इनसे” चची बोली, “हां हमको पूछना था... बिटिया वो बाथरूम किधर है”
अरे अम्मी... क्या तुम
“नहीं नहीं तो हो आइये... इधर से निकल जाइये... सामने है... अरे कोई चले जाओ... देखिएगा कुंडी ढीली है थोड़ी.... वो चम्मच डाल लीजिएगा कुंडी में.. हेहेह वो कुंडी ज़रा ढीली है... तो बताइये आप लोग... कितने दिन बाद आना हुआ लखनऊ”
सिंकदर चचा बोले, “ऐं... फालतू... भई हमें तो कानपुर से निकलने का मन करता नही है... ये अखनऊ लखनऊ का पानी हमें सूट नहीं करता... बहुत साल बाद आना हुआ... लेकिन देखिए बदला नहीं नखनऊ आपका.. अभी वही धूल धक्कड़... जहां खुदाई.. वहां खुदाई... एट्रो-मेट्रो बना रहे हैं... चलना सबको विक्रम से है.. हम तो मजबूरी में आते हैं लखनऊ वरना”
अनवार साहब बोले, “हां भई मजबूरी में ही आता-जाता है आदमी... अब जैसे आपकी मजबूरी है कि एयरपोर्ट जाना है तो कानपुर में है ही नहीं एयरपोर्ट तो क्या करेंगे ... मजबूरी में आएंगी ही”
चचा का फिर एक प्वाइंट कम हो गया। सोच के बैठे थे कि इस लखनव्वे का गेम बजाएंगे ज़रूर।
शारिक ने शर्माते हुए सामने बैठी शीज़ा से सवाल किया “जी तो... तो क्या हॉबीज़ हैं आपकी”
वो बोलीं, “हॉबीज़ तो क्या मतलब बस... बनाने और खाने का शौक है”
- अच्छा तो क्या बनाती हैं और क्या खाती हैं
- बनाने को तो... पुराने कपड़ों को बिन कर मैट बना लेते हैं, माचिस की तीलियों को चिपका कर तस्वीर बनाते हैं, वॉल एंगिंग... एंडे रंग कर मेज़ पर सजाते हैं... और वो अलमारी पर अखबार बिछाने से पहले उसको डिज़ाइन में कट कर लेते है... ये सब अच्छा लगता है हमें... और खाने में
तो आइ एम आ फूडी एक्चुली... टुंडे वुंडे जाते ही रहते हैं... इदरीस का नया होटल खुल गया है अभी वहां जाना है, मुबीन.. यहीं सब जाते हैं... कभी कबार रात को 1090 चले जाते हैं... वहां जो रोडसाइड फूड वेंडर्स हैं... वहीं जाकर कुछ खाते पीतें हैं”
- क्या कहा रोड साइड फूड?
- ये क्या आ गया... जिसमें पूरा बटर डाल देते हैं गाइज़ .. वो वाला
- क्या मतलब समझी नहीं
- अरे बस अब समझ लीजिए तहलका ऑमलेट हो गया... चच्चा... बस अब हमाई हां है... अरे एक ही तरह का काम है...
वो बोली, “अंकल वो”
अंकल नहीं बेटा, चचा बोलो
जी चचा वो.... मास्टर्स किया है शिया पीजी से फिर एमबीए की तैयारी कर रहे हैं.. फिर कोई बिज़नेस का सोचा है
वाह ख्यालात तो अच्छे हैं, लेकिन यहां नखनऊ में कहां बिन्नेस विन्नेस करोगी... कानपुर में करो... कानपुर है... बढ़िया कारोबार के लिए तो
“वो अस्ल में कानपुर में बिजली बहुत जाती है न” मुन्ने मामू की आवाज़ गूंजी
सिंकदर चचा ने घूम के देखा उनकी तरफ बोले, “हां तो? लखनऊ तो आपका न्यूयॉर्क है ना”
नहीं, वो लखनऊ में तो कटौती चल रही है
- अरे साल भर चलती है आपके यहां
शारिक ने आंख दिखाई लेकिन चचा नहीं माने। “कानपुर आइये तो सफ़ेदा आम खिलाएं, लखनव्वा दसहरी भूल जाएंगे”
“ऐ शारिक उठो ... चलो अब नहीं हो पाएगा रिश्ता यहां... उठो” चचा गुस्से में बोले… अनवार साहब बोले, अरे भई ये क्या आप लोग बच्चों की तरह, मुन्ने तुम भी अजीब हो... मेहमान से अबे-तबे कर रहे हो... कोई लखनवी तहज़ीब नहीं बाकी तुममें?”
शारिक ने ट्रे देखा... उसकी आवाज़ खामोश कमरे में गूंजी.... “ये क्या आ गया भाई साहब”
अनवार साहब बोले, “अरे ये हमारी पड़ोसी हैं, गुलफिशां... वो कबाब इन्होंने ही बनाए थे.. आओ बेटा आओ...”
सिंकदर चचा ने गुलफिशां को देखा तो देखते ही रह गए.... बहुत खूबसूरत थीं... उम्र भी चचा से दो एक साल कम होगी... और तो और मालूम चला कि अब तक उनकी भी शादी नही हुई है।... चचा ने बताया कि गुलफिशां के दो ही शौक हैं... एक खाना बनाती हैं और दूसरा पेंटिंग बनाती हैं चचा ने गुलफिशां को सर से पांव तक देखा और एक ही पल में उन्हें गुलफिशां में वही भातखंडे वाली पुरानी महबूबा नज़र आई जिसके इश्क में आजतक लखनऊ को बुरा भला कहते थे... पर हल्के नीले सूट में गुलफिशां के भूरे बाल, दिलकश मुस्कुराहट और बड़ी बड़ी आंखें देखकर उन्हें गुलफिशां से वो हो गया... जिसे कहते हैं पहली नज़र का इश्क....
गुलफिशां बोलीं.... चचा की तरफ देखकर, “क्या फर्मा रहे थे आप लखनऊ के बारे में?”
बोले, “अजी... हम क्या फर्माएंगे... बस यही कह रहे थे कि भई मुस्कुराइये कि हम लखनऊ में है...और भई... हर शहर की अपनी खासियत होती है... लखनऊ कानपुर नहीं हो सकता... कानपुर लखनऊ नहीं हो सकता... भई अपनी अपनी बात होती है... है कि नहीं मुन्ने भाई”
मुन्ने मामू बोले, “पाल्टी बदल लिया साला”
अभी सब खड़े ही थे कि देखा चची आ गयीं... जो बाथरूम गयीं थी। शारिक उनको लेकर ज़रा अकेले में आया, “अरे अम्मी, कहां आप बाथरूम में...इतने ज़रूरी मौके पर”
“अरे भैय्या न पूछो... बाथरूम के अंदर गए... साफ-सफाई देखी... लेकिन जब निकलने लगे तो कुंडी फंस गयी... बड़ी देर से खोल रहे थे कमबख्त अब खुली... लड़की तो ठीक लगी हमें, घर भी ठीक है... बताओ फिर क्या करना है”
- “भई अब हम क्या अम्मी... भई ठीक तो हमें भी लगी... लेकिन चचा नहीं मान रहे हैं... उनसे बात कीजिए ”
शारिक बरामदे में पहुचा... बोला, “वो हमारे चचा कहां है”
मुन्ने बोले, “वो गए... ”
- कहां गए
- पड़ोसन के घर पर उसकी पेंटिग्स देखने... दुग्गल साहब आज पिकासो बन गए हैं
इधर सिंकदर चचा गुलफिशां पड़ोसन के यहां खड़े उसकी पेंटिंग्स मे बिला वजह दिलचस्पी ले रहे थे... जैसे पुराने आर्ट लवर हैं बोले “वाह, मुझे हमेशा से ऐसे मॉडर्निस्ट एक्सप्रेशनिज़्म ने अट्रैक्ट किया है। इसमें जो टेक्सचर है, जो ब्रशवर्क की रॉनेस है, दरअसल एक बहुत कॉन्शस चॉइस है। और ये जो एसिमेट्रिकल कंपोज़िशन है न, इसमें आर्टिस्ट ने नेगेटिव स्पेस को एक कैरेक्टर की तरह ट्रीट किया है। बहुत रेयर सेंस ऑफ एब्स्ट्रैक्शन है
बस... इसके बाद क्या हुआ... आइडिया आप लोगों को है ही... शीज़ा और शारिक का रिश्ता हो गया... शीज़ा कानपुर में रहती हैं... और सिंकदर चचा का निकाह गुलफिशां से हो गया है और अब वो यहीं लखनऊ में रहते हैं... और अब यानि बीस साल बाद... अक्सर कहते पाए जाते हैं कि नखनऊ की बिरयानी में जो बात है ... वो कानपुर मे कहां...
जमशेद क़मर सिद्दीक़ी