कश्मीरी केसर ब्रिटेन-अमेरिका के टक्कर का, 2000 साल पुराना है इतिहास

आयुर्वेद में भी केसर का उपयोग सौंदर्य, स्वाद और बीमारियों का इलाज करने के लिए किया जाता रहा है. लेकिन क्या आप जानते हैं गुणों से भरपूर इस केसर की उत्पत्ति सबसे पहले आखिर कब और कहां हुई थी. आइए जानते हैं आखिर क्या है 2000 साल पहले शुरू हुई ये केसरिया कहानी.     

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प्रतीकात्मक फोटो (Pixabay Image) प्रतीकात्मक फोटो (Pixabay Image)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 06 अगस्त 2019,
  • अपडेटेड 12:08 PM IST

धरती पर बसे जन्नत से रूबरू करवाने वाला कश्मीर आज अपनी खूबसूरत वादियों और केसर के लिए नहीं बल्कि अनुच्छेद 370 को लेकर सुर्खियों में बना हुआ हैं. सोमवार को अचानक मोदी सरकार ने आर्ट‍िकल 370 को जम्मू-कश्मीर से हटाने का फैसला कर लिया.

कश्मीर की क्यारी में उगे केसर के चर्चे दुनियाभर में मशहूर हैं. कश्मीर के पम्पूर तो जम्मू के किश्तवाड़ में केसर की खेती की जाती है. यहां का केसर खरीदने के लिए लोगों को एक मोटी कीमत चुकानी पड़ती है.

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आयुर्वेद में भी केसर का उपयोग सौंदर्य, स्वाद और बीमारियों का इलाज करने के लिए किया जाता रहा है. लेकिन क्या आप जानते हैं गुणों से भरपूर इस केसर की उत्पत्ति सबसे पहले आखिर कब और कहां हुई थी. आइए जानते हैं आखिर क्या है 2000 साल पहले शुरू हुई इस केसरिया कहानी का पूरा सच.      

केसर को लेकर कहा जाता है कि सबसे पहले कश्मीर घाटी में विशेषकर पंपोर क्षेत्र में केसर की खेती सन्‌ 550 में आरंभ हुई थी, जो आज तक की जा रही है. कश्मीरी केसर ब्रिटेन में उगने वाले केसर को स्वाद और गुण में कड़ी टक्कर देता है.

शाही केसर-

केसर के जामुनी रंग के फूलों के बीच में जो लाल रंग के रेशे होते हैं, उन्हीं से सबसे बढ़िया किस्म का केसर मिलता है जिसे शाही केसर के नाम से भी जाना जाता है. वैसे एक फूल में तीन से लेकर सात तक रेशे होते हैं और एक बार इसका बीज लगाया जाता है तो वह 10 से 15 सालों तक जीवित रहता है.

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कैसे जुड़ा कश्मीर से केसर का नाम -

एक दंत कथा के अनुसार करीब 800 साल पहले एक सूफी संत कश्मीर में आए थे. माना जाता है कि ये सूफी संत अपने साथ मध्य-पूर्व से केसर के कुछ पौधे साथ लेकर आए थे. लेकिन जब वो एक बार बीमार पड़ गए तो एक स्थानीय हकीम ने उनका इलाज किया. जिससे खुश होकर उन्होंने बदले में उस हकीम को एक केसर का पौधा दे दिया था. इस तरह केसर का पौधा कश्मीर में आया था.

इतिहासकार सूफी संत की कहानी से नहीं सहमत-

कश्मीर के कुछ इतिहासकार इस दंत कथा से सहमत नहीं हुए. कश्मीर की प्राचीन संस्कृति के विशेषज्ञ और कवि मोहम्मद युसुफ तंग का कहना है कि कश्मीर में केसर की पैदावार 2000 साल पहले भी होती थी. जिसका जिक्र यहां के तांत्रिक हिंदू राजा की कहानियों में भी किया गया है. प्रोफेसर तंग के अनुसार कश्मीर के व्यापारी प्राचीन एथेंस, रोम और इरान के साथ भी केसर का व्यापार करते थे.

प्राचीन परंपरा-

यहां केसर की खेती करने वाले लोगों की मानें तो केसर की खेती करने का चलन लगभग 2000 साल पुराना है. जिसकी वजह से केसर की खेती करने के तौर-तरीके से लेकर उसे खेतों तक पहुंचने के बाद केसर उगाने का हर तरीका बिल्कुल प्राचीन है.

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केसर का फूल-

केसर का फूल बैंगनी रंग का होता है. हर फूल के बीचोंबीच तीन लाल धब्बे होते हैं. केसर के फूलों का कुछ भी हिस्सा फेंका नहीं जाता. पंखड़ियां सब्ज़ी के रुप में खा ली जाती हैं. डंठल जानवरों को खाने के लिए दे दिए जाते हैं और बाकी जो बचा वो होता है असली केसर. उसके भी अलग-अलग प्रकार होते हैं.

कौन सा केसर सबसे शुद्ध-

लाल धब्बे या दाग़ सबसे विशुद्ध किस्म का केसर होता है जिसकी सबसे अधिक मांग होती है. इसके बाद नंबर आता है पुंकेसर का और आख़िर में इन सबका मिला जुला मिश्रण जो सबसे सस्ती किस्म का केसर है. इसे किसान अपने पास ही रख लेते हैं.

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