दौड़ने का बढ़ता शौक कर रहा कूल्हों को खराब, लोगों को हो रही ये बीमारी, कहीं आप भी तो नहीं हैं शिकार

रनिंग करने के कई फायदे हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि कुछ लोगों को इससे कूल्हों की एक बीमारी हो रही है. किन लोगों में इसका खतरा है. इससे बचाव कैसे करें इस बारे में डॉक्टरों ने बताया है.

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दौड़ना ऐसे बन रहा सेहत के लिए खतरा ( PHOTO-ITGD) दौड़ना ऐसे बन रहा सेहत के लिए खतरा ( PHOTO-ITGD)

अभिषेक पांचाल

  • नई दिल्ली,
  • 08 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 11:36 AM IST

दौड़ लगाना सेहत के लिहाज से बहुत ही अच्छा है. इससे शरीर फिट रहता है, वजन कम होता है ,लेकिन क्या दौड़ना सभी के लिए फायदेमंद है? यह सवाल इसलिए क्योंकि अब डॉक्टर एक दूसरी तस्वीर देख रहे हैं. एथलीटों को होने वाली कूल्हों  की एक समस्या ( फेमोरोएसेटाबुलर इम्पिंजमेंट) अब आम लोगों को भी हो रही है. देश के अस्पतालों में हड्डियों के डॉक्टरों के पास इस तरह के केस आ रहे हैं. इस समस्या वाले मरीजों में ऑपरेशन तक की जरूरत पड़ सकती है.

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अब आपके मन में ये सवाल आ रहा होगा कि खिलाडियों को होने वाली फेमोरोएसेटाबुलर इम्पिंजमेंट ( FAI) की समस्या आम लोगों को क्यों हो रही है? इस बारे में डॉक्टरों का कहना है कि ऐसा रनिंग के बढ़ते ट्रेंड के कारण हो रहा है. . 

दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल के स्पोर्ट्स इंजरी सेंटर में डॉ. राहुल ग्रोवर भी इस बदलाव को देख रहे हैं. वह बताते हैं कि फेमोरोएसेटाबुलर इम्पिंजमेंट एथलीट्स में होने वाली जानी-पहचानी समस्या है. इसमें कूल्हों में दर्द होता है. चूंकि खिलाड़ी कई ऐसी एक्सरसाइज करते हैं जिससे कूल्हों पर प्रेशर पड़ता है तो उनको ये समस्या हो जाती है, लेकिन अब कुछ ऐसे लोग कूल्हे के दर्द की शिकायत लेकर पहुंच रहे हैं जो प्रोफेशनल खिलाड़ी नहीं हैं, लेकिन उन्होंने हाल के समय में रनिंग शुरू की है. इनमें से कुछ लोगों में जांच के दौरान फेमोरोएसेटाबुलर इम्पिंजमेंट यानी FAI की समस्या सामने आ रही है. 

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 दौड़ने का कूल्हे की बीमारी से क्या है कनेक्शन

डॉ राहुल बताते हैं कि मान लीजिए किसी व्यक्ति ने सालों में कभी दौड़ ही नहीं लगाई. लेकिन अब उसने दोस्तों को देखकर वह कुछ महीने से रोज दौड़ लगा रहा है.कई बार वह तीन से 5 किलोमीटर तक दौड़ रहा है. यहीं गलती हो रही है. लोग बिना तैयारी और अपने शरीर की क्षमता को देखे दौड़ लगा रहे हैं, जबकि उन्होंने इसके लिए तैयारी या पर्याप्त प्रैक्टिस नहीं की होती है. ऐसे में अगर दौड़ लगाने वाले व्यक्ति को कूल्हे में पहले से FAI से जुड़ी बनावट मौजूद है तो रनिंग के दौरान उसके लक्षण सामने आ सकते हैं. ऐसा क्यों होता है ये जानने के लिए आपको कूल्हों के जोड़ को समझना जरूरी है.,

जांघ की सबसे बड़ी हड्डी का ऊपरी सिरा गोल होता है. यह कूल्हे की हड्डी में बने एक गोल खांचे के अंदर फिट रहता है. चलते, उठते-बैठते या दौड़ते समय यही जोड़ पैर को अलग-अलग दिशा में घुमाने में मदद करता है. फेमोरोएसेटाबुलर इम्पिंजमेंट में इस जोड़ की बनावट ऐसी होती है कि हड्डियों के बीच सामान्य से ज्यादा टकराव होने लगता है. परेशानी तब होती है जब पैर को बार-बार मोड़ने या घुमाने पर ये हिस्से एक-दूसरे से टकराते हैं. शुरुआत में व्यक्ति को इसका पता भी नहीं चलता. लेकिन बार-बार ऐसा होने पर जोड़ के अंदर मौजूद नरम परत को नुकसान पहुंच सकता है और दर्द शुरू हो सकता है. रनिंग के दौरान भी ये जोड़ आपस में टकराते हैं इससे ही कूल्हों में दर्द बढ़ता है. 

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हिप बोन

डॉ राहुल कहते हैं कि यहां एक बात समझना बहुत जरूरी है कि सिर्फ दौड़ने या मैराथन में भाग लेने से किसी व्यक्ति को FAI हो जाएगी, यह कहना मेडिकल तौर पर सही नहीं है, क्योकि कई लोगों में कूल्हों की बनावट पहले से ही ऐसी होती है. वह नॉर्मल जिंदगी जीते हैं और उन्हें पता तक नहीं होता कि उनके हिप की बनावट थोड़ी अलग है. वे सामान्य रूप से चलते हैं, ऑफिस जाते हैं, सीढ़ियां चढ़ते हैं और रोजमर्रा के सभी काम करते हैं. उन्हें यह पता तक नहीं होता कि उनके कूल्हे की हड्डियों की बनावट सामान्य से थोड़ी अलग है।यानी FAI मॉरफोलॉजी होना और FAI सिंड्रोम होना एक ही बात नहीं है.किसी एक्स-रे या स्कैन में ऐसी हड्डी की बनावट दिखाई देने मात्र से यह जरूरी नहीं कि व्यक्ति को बीमारी है या भविष्य में निश्चित रूप से समस्या होगी.

हर कूल्हे के दर्द का मतलब FAI नहीं है

यह भी समझना जरूरी है कि रनिंग के बाद होने वाला हर हिप या ग्राइन पैन FAI की वजह से नहीं होता.मांसपेशियों में खिंचाव, टेंडन की समस्या, स्ट्रेस इंजरी, स्पोर्ट्स हर्निया और कई अन्य कारण भी हिप या ग्राइन का दर्द पैदा कर सकते हैंइसलिए केवल दर्द के आधार पर खुद से FAI का निष्कर्ष निकालना सही नहीं है.डॉक्टर आमतौर पर मरीज की हिस्ट्री, मेडिकल जांच और जरूरत पड़ने पर एक्स-रे और एमआरआई जैसी जांचों को मिलाकर डायग्नोज करते हैं,
 

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रनिंग करना बिलकुल गलत नहीं है, बिना तैयारी दौड़ना समस्या बन सकता है

डॉ राहुल कहते हैं कि रनिंग सेहत के लिए बहुत ही फायदेमंद है. डॉक्टर भी इसकी सलाह देते हैं, लेकिन बिना वॉर्मअप, प्रैक्टिस और अच्छी डाइट के रोज दौड़ना शरीर में FAI की परेशानी अगर है तो उसको और बढ़ा सकता है. आज कई लोग रनिंग या मैराथन शुरू कर रहे हैं, लेकिन हर व्यक्ति को दौड़ने का सही तरीका पता हो, यह जरूरी नहीं है. शरीर की क्षमता से ज्यादा दौड़ना और सही तैयारी न करना चोट का कारण बन सकता है. 

डॉ राहुल कहते हैं कि अगर किसी व्यक्ति को कोई लक्षण नहीं हैं, तो केवल X-ray में FAI जैसी मॉरफोलॉजी दिखने के कारण रनिंग या एक्सरसाइज बंद करने की जरूरत नहीं होती है. लेकिन अगर रनिंग के दौरान बार-बार ग्रोइन या कूल्हे में दर्द हो रहा है, दर्द धीरे-धीरे बढ़ रहा है या गतिविधि के बाद लंबे समय तक बना रहता है, तो उसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए,

कुछ लोगों में हो सकती है आर्थराइटिस की समस्या 

दिल्ली के अपोलो अस्पताल में ऑर्थोपेडिक, जॉइंट रिप्लेसमेंट और स्पाइन सर्जरी के सीनियर कंसल्टेंट डॉ. यश गुलाटी इस मामले में एक दूसरी जरूरी बात बताते हैं. उानका कहना है कि रनिंग शुरू करने वाले कुछ लोगों के जोड़ों में पहले से परेशानी हो सकती है. किसी में शुरुआती आर्थराइटिस हो सकता है तो किसी को पहले से कूल्हे या घुटने की समस्या हो सकती है, लेकिन सामान्य जिंदगी में उसका पता नहीं चलता है. 

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इसके बाद व्यक्ति अचानक रनिंग शुरू करता है. शरीर की फिटनेस को समझे बिना दूरी बढ़ाता जाता है और मैराथन तक पहुंच जाता है. ऐसे में पहले से मौजूद समस्या के लक्षण सामने आ सकते हैं. इसलिए समस्या मैराथन नहीं है. समस्या तब शुरू होती है जब व्यक्ति अपनी तैयारी और शरीर की स्थिति को पीछे छोड़कर दूरी के पीछे भागने लगता है.

डॉ. गुलाटी के मुताबिक दौड़ना शुरू करनेसे पहले कई बातों का ध्यान रखना जरूरी है. खासतौर पर अगर पहले से घुटने, कमर या कूल्हे में दर्द रहता है तो उसे नजरअंदाज करके लंबी दूरी की रनिंग शुरू नहीं करनी चाहिए. और यही बात इस समय महत्वपूर्ण है.

जब दर्द बना रहे तो क्या है इलाज

डॉ राहुल बताते हैं कि FAI का इलाज हर मरीज में एक जैसा नहीं होता. अगर लक्षण हल्के हैं, तो शुरुआत आमतौर पर बिना सर्जरी के इलाज से की जाती है. इसमें कुछ समय के लिए फिजियोथेरेपी, एक्सरसाइज और कोर मसल्स को मजबूत करने वाली एक्सरसाइज और दर्द कम करने के लिए इलाज किया जाता है, 

लेकिन अगर लगातार दर्द बना रहता है, रोजमर्रा की गतिविधियों या खेल में परेशानी होने लगती है और जांच में हिप में कोई समस्या या कार्टिलेज को नुकसान दिखाई देता है, तो कुछ मरीजों में सर्जरी की जरूरत पड़ सकती है,ऐसे मामलों में हिप आर्थ्रोस्कोपी एक महत्वपूर्ण इलाज है.  इसे आम भाषा में दूरबीन विधि से होने वाली सर्जरी या कीहोल सर्जरी कहा जाता है. इसमें  डॉक्टर स्किन पर बहुत छोटा चीरा लगाकर एक पतली ट्यूब डालते हैं, जिसके आगे लाइट और छोटा कैमरा लगा होता है. इससे कूल्हों के अंदर की स्थिति साफ दिखती है और बिना बड़ा चीरा लगाए इलाज किया जाता है. 

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