पंचकूला जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड (JJB) ने स्कूल में एक छोटी बच्ची पर बुरी तरह से हमला करने के मामले में 8 साल के लड़के को ज़मानत पर रिहा करने का आदेश दिया. इस आदेश से सोशल मीडिया पर आक्रोश फैल गया और जुवेनाइल जस्टिस सिस्टम के कामकाज को लेकर लोगों ने सवाल उठाने शुरू कर दिए.
हरियाणा के पंचकूला के एक सरकारी स्कूल में 28 अक्टूबर 2026 को तीसरी कक्षा के 8 साल के छात्र ने केजी की 6 साल की बच्ची पर बेरहमी से हमला कर दिया था. आरोपी बच्चे ने बच्ची को खाली कमरे में ले जाकर उसके साथ बेरहमी से मारपीट की. इस मामले में पुलिस ने स्कूल के प्रिंसिपल और शिक्षकों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है और लापरवाही के चलते प्रिंसिपल और दो शिक्षकों को सस्पेंड कर दिया गया है. घायल बच्ची अब खतरे से बाहर है. इस केस में जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड ने आरोपी बच्चे को जमानत दे दी है.
भारत का 'किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम' एक सरल लेकिन महत्वपूर्ण विचार पर आधारित है. बच्चे वयस्कों से अलग होते हैं. गंभीर अपराध करने के दौरान भी उनका भावनात्मक और मानसिक विकास अभी भी हो रहा होता है, और उनमें सुधार की काफी संभावना होती है.
इस कानून के तहत 18 वर्ष से कम उम्र का कोई भी व्यक्ति जो अपराध करता है, उसे ऐसा बच्चा माना जाता है जिसका कानून के साथ टकराव (Child in conflict with law) हुआ है. पकड़े जाने पर ऐसे बच्चे को सामान्य आपराधिक अदालत के बजाय 'किशोर न्याय बोर्ड' (JJB) के सामने पेश किया जाना चाहिए. JJB का काम यह सुनिश्चित करना है कि बच्चे को काउंसलिंग मिले, उसके बैकग्राउंड का आकलन हो, और उसे सजा देने के बजाय उसके पुनर्वास (Rehabilitation) पर ध्यान दिया जाए.
इसका उद्देश्य अपराध को माफ करना नहीं है, बल्कि बच्चे को आपराधिक न्याय प्रणाली में हमेशा के लिए फंसने से बचाना है.
जमानत मिलना एक सामान्य प्रक्रिया क्यों है
यह सोच इस बात में झलकती है कि जमानत कैसे काम करती है. 'किशोर न्याय अधिनियम' के तहत, बच्चों के लिए जमानत मिलना एक सहज नियम और सामान्य प्रक्रिया है. यहां तक कि गंभीर मामलों में भी. जमानत देने से केवल तभी इनकार किया जा सकता है, जब बच्चे को रिहा करने से उसे कोई खतरा हो, वह अपराधियों के प्रभाव में आ जाए, या इससे न्याय प्रक्रिया को गंभीर नुकसान पहुंचे.
Child in conflict with law से जुड़े मामलों में JJ अधिनियम की धारा 12 के तहत यह अनिवार्य है कि हिरासत में लिए गए या गिरफ्तार किए गए नाबालिग को तुरंत जमानत पर रिहा किया जाए. ऐसा केवल तभी नहीं किया जाएगा जब रिहाई से बच्चे को अपराधियों के साथ रहने के कारण कोई खतरा हो, उसे "नैतिक, शारीरिक या मानसिक नुकसान" पहुंचने का डर हो, या इससे न्याय के उद्देश्यों को नुकसान पहुंचता हो.
इस प्रक्रिया के तहत मामले की निगरानी के लिए एक प्रोबेशन अधिकारी नियुक्त किया जाता है, जो नाबालिग के आचरण और परिस्थितियों की विस्तृत जांच करता है.
इस कानून की धारा 14-18 में जांच की विस्तृत प्रक्रिया बताई गई है और बोर्ड को ऐसे आदेश पारित करने का अधिकार दिया गया है, जिन्हें वह "उचित" समझता है.
'आजतक' से बातचीत में वकील अनंत अस्थाना ने कहा कि जुवेनाइल जस्टिस एक्ट का उद्देश्य जवाबदेही तय करना और फिर बच्चों में सुधार लाकर उन्हें अपराध की राह से दूर करना है. जहां आपराधिक कानून 7 साल से कम उम्र के बच्चों को पूरी तरह से छूट (इम्युनिटी) देता है और 7 से 12 साल के बच्चों को कुछ शर्तों के साथ छूट देता है, वहीं जुवेनाइल जस्टिस एक्ट में सुधार और पुनर्वास हर बच्चे के लिए उपलब्ध है. यह कानून हर बच्चे को सुधार और पुनर्वास का अधिकार देता है. 8 साल की उम्र के बच्चे को जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड और डिस्ट्रिक्ट चाइल्ड प्रोटेक्शन यूनिट के माध्यम से जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत पूरी देखभाल, सुरक्षा, सुधार और पुनर्वास की सुविधा मिलेगी.
रिपोर्टों के अनुसार नाबालिग 8 साल बच्चे के परिवार ने यह सुनिश्चित करने का जिम्मा लिया है कि उसे "सक्षम अधिकारियों की सलाह के अनुसार काउंसलिंग, आचरण संबंधी मार्गदर्शन और सुधार के उपाय" मुहैया कराए जाएंगे.
अस्थाना यह भी बताते हैं कि जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत, JJB के अधिकार इतने व्यापक और विस्तृत हैं कि वे कानून के दायरे में आने वाले हर बच्चे के लिए अपराध की प्रकृति की परवाह किए बिना उसके हिसाब से विशेष ट्रीटमेंट प्लान बना सकते हैं और उन्हें लागू कर सकते हैं.
अनीषा माथुर