प्लेन उड़ाते समय सो जाते हैं 4 में से 3 पायलट! यूरोपियन एजेंसी के सर्वे में दावा

प्लेन उड़ाते समय अधिकतर पायलट कुछ देर के लिए सो जाते हैं या फिर कुछ देर के लिए झपकी लेते हैं. यह दावा एक एविएशन सर्वे एजेंसी ने किया है. एजेंसी के सर्वे में 7200 पायलट शामिल हुए थे.

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प्लेन उड़ाते वक्त सो जाते हैं कई  पायलट (Photo - Pexels) प्लेन उड़ाते वक्त सो जाते हैं कई पायलट (Photo - Pexels)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 29 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 1:16 PM IST

जब आप फ्लाइट में 30 हजार फीट से भी ज्यादा ऊंचाई पर आराम से नीचे के नजारे देख रहे होते हैं. तब हो सकता है प्लेन का पायलट झपकी ले रहा हो. यह सुनकर आप चौंक सकते हैं, लेकिन एक स्टडी में ऐसे दावा किया गया है. 7200 पायलट पर किए गए एक सर्वे में ऐसी कई चौंकाने वाली बातें सामने आई हैं. चलिए जानते हैं यह स्टडी क्या है और क्या सच में पायलट प्लेन उड़ाते समय सो जाते हैं?

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न्यूयॉर्क पोस्ट की एक रिपोर्ट के मुताबिक, हाल ही में आई एक रिपोर्ट में पाया गया कि बहुत सारे पायलट उड़ान भरते समय सो गए. यूरोपियन कॉकपिट एसोसिएशन (ECA) के सर्वे के अनुसार, चार में से तीन से ज्यादा पायलट एयरक्राफ्ट चलाते समय सो जाते हैं.

7200 पायलट पर किया गया सर्वे
इस हफ्ते जारी हुई स्टडी में पाया गया कि सर्वे किए गए 7,200 पायलटों में से 76.8% पिछले चार हफ्तों में कम से कम एक बार कंट्रोल से भटक गए. रिपोर्ट में उड़ान के बीच में आने वाली इन झपकियों को 'माइक्रोस्लीप' कहा गया है. जिसे नेशनल स्लीप फाउंडेशन कई सेकंड तक चलने वाली छोटी नींद के तौर पर परिभाषित करते हैं. 

इसे सोने वाला व्यक्ति पहचान नहीं पाता है. इससे वाहन या विमान चलाने वालों के लिए भारी सुरक्षा जोखिम पैदा हो सकता है. कुछ मामलों में, इस तरह से झपकी लेने वाले जगे हुए लग सकते हैं. भले ही उनकी आंखें खुली हों, लेकिन उनका दिमाग जानकारी प्रोसेस नहीं कर रहा होता है.

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स्लीप फाउंडेशन के अनुसार, माइक्रोस्लीप नींद की कमी का एक आम लक्षण है. इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि उड़ान के दौरान थकान की वजह से माइक्रोस्लीपिंग होती है. 38.8% पायलटों ने बताया कि उन्हें आमतौर पर या हमेशा पूरा आराम नहीं मिलता, जिससे उन्हें लगातार थकान होती है.

क्यों आती है पायलट को नींद
कॉकपिट में चुप्पी और थकान के बावजूद काम करने का कल्चर बना हुआ है. सिर्फ़ 37.2% पायलटों ने कहा कि जब वे अनफिट या थका हुआ महसूस करते हैं तो वे रिपोर्ट करते हैं. वहीं 24.2% ने कहा कि वे रिपोर्ट नहीं करते और फिर भी उड़ते हैं. इन पायलटों ने ऐसा करने की वजह सज़ा और मैनेजमेंट के गुस्से के डर को बताया.

ECA स्टडी में कमांडर के डिस्क्रीशन के बारे में चिंताएं बताई गई हैं. यह एक सेफ्टी नियम है जो पायलट-इन-कमांड को कानूनी तौर पर अपना फ्लाइट ड्यूटी पीरियड बढ़ाने और जरूरी रेस्ट पीरियड कम करने की इजाज़त देता है.

सर्वे में शामिल लोगों में से 38.3% ने बताया कि उन्होंने पिछले महीने कम से कम एक बार कमांडर्स डिस्क्रीशन का इस्तेमाल किया.  वहीं 15.2% ने बताया कि उन्होंने इसे दो या उससे ज़्यादा बार इस्तेमाल किया. लगभग 69.1% ने चिंता जताई कि अगर उन्होंने एक्सटेंशन देने से मना कर दिया तो इसके बुरे नतीजे हो सकते हैं.क

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करियर और एडमिनिस्ट्रेशन का रहता है दबाव  
ECA बोर्ड के डायरेक्टर कैप्टन कोएन जॉर्ज ने एक बयान में कहा कि जब पायलट में अपने करियर को लेकर डर होता है तो वो रिपोर्ट नहीं करते. फिर रिस्क कॉकपिट में वापस आ जाता है.  एयरलाइंस और अधिकारियों को यह पक्का करना चाहिए कि रिपोर्टिंग सही मायने में बिना सजा के हो और कमांडर के विवेक का इस्तेमाल हो.

जॉर्ज ने यह भी कहा कि कुछ एयरलाइंस क्रू पर फ्लाइट ड्यूटी बढ़ाने, देरी की भरपाई करने और ड्यूटी बढ़ाने से मना करने पर उन्हें सजा देने का दबाव डालती हैं. हमने एविएशन अथॉरिटीज़ को ऐसे प्रेशर के बारे में कई बार अलर्ट किया है.

जवाब में, यूरोपियन यूनियन एविएशन सेफ्टी एजेंसी ने एक बयान में कहा कि वह इन नतीजों को गंभीरता से ले रही है. उसने एयरलाइंस से सही रिपोर्टिंग, ऑपरेशनल उपायों और एक ऐसे सेफ्टी कल्चर के ज़रिए थकान के रिस्क को पहचानने और मैनेज करने की अपील की, जिसमें क्रू मेंबर बुरे नतीजों के डर के बिना अपनी चिंताएं बता सकें. यह नई रिपोर्ट एविएशन स्टाफिंग संकट के बीच आई है. क्योंकि इंडस्ट्री पायलटों को हायर करने की तुलना में तेज़ी से खो रही है.

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