रेलवे ट्रैक के ऊपर आपने अक्सर बिजली के तार लगे हुए देखे होंगे. इन तारों के ठीक नीचे से हर दिन सैकड़ों ट्रेनें गुजरती हैं. खास बात यह है कि ट्रेन के ऊपर लगा पेंटोग्राफ लगातार इस तार के संपर्क में रहता है. ट्रेन तेज रफ्तार से चलती है और पेंटोग्राफ तार को छूता हुआ आगे बढ़ता रहता है. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर इतनी सारी ट्रेनें गुजरने के बावजूद ये तार जल्दी घिसता क्यों नहीं है? दरअसल, इसके पीछे रेलवे की एक खास तकनीक काम करती है. यह तार कोई सामान्य बिजली का तार नहीं होता. इसे इस तरह बनाया और लगाया जाता है कि ट्रेन के पेंटोग्राफ के साथ लगातार संपर्क में रहने के बावजूद इसका घिसाव कम से कम हो.
ट्रेन को बिजली मिलती कैसे है?
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि ऊपर लगातार करता क्या है. इलेक्ट्रिक ट्रेन में इंजन को चलाने के लिए बिजली की जरूरत होती है. रेलवे ट्रैक के ऊपर लगे इस तार को ओवरहेड इक्विपमेंट या कॉन्टैक्ट वायर कहा जाता है. ट्रेन की छत पर एक उपकरण लगा होता है, जिसे पेंटोग्राफ कहते हैं. यह ऊपर उठकर बिजली के तार को छूता रहता है. तार से बिजली पेंटोग्राफ के जरिए ट्रेन के इलेक्ट्रिक सिस्टम तक पहुंचती है और फिर इसी बिजली से ट्रेन की मोटर चलती है. अब यहां सबसे दिलचस्प बात आती है. पेंटोग्राफ और तार के बीच लगातार संपर्क रहता है, इसलिए दोनों के बीच फ्रिक्शन भी होता है. अगर सामान्य तार इस्तेमाल किया जाए तो वह कुछ ही समय में काफी घिस सकता है.
फिर तार घिसता क्यों नहीं?
तार घिसता है, लेकिन बहुत धीरे-धीरे. इसे पूरी तरह घिसने से बचाया नहीं जाता, बल्कि इसके घिसाव को कंट्रोल किया जाता है. इसके लिए तार को खास धातु से बनाया जाता है. आमतौर पर कॉपर आधारित मजबूत और अच्छी इलेक्ट्रिकल कंडक्टिविटी वाली सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है. इसमें ऐसी खूबियां होती हैं जिससे यह बिजली भी अच्छी तरह पहुंचाए और लगातार होने वाले घर्षण को भी सह सके. इसके अलावा पेंटोग्राफ के जिस हिस्से का संपर्क तार से होता है, उसमें भी एक खास कॉन्टैक्ट स्ट्रिप लगी होती है. यह हिस्सा इस तरह बनाया जाता है कि जरूरत पड़ने पर इसे आसानी से बदला जा सके. यानी रेलवे सिर्फ तार को मजबूत नहीं बनाता, बल्कि पेंटोग्राफ के उस हिस्से को भी ऐसा रखता है जो घिसने के लिए बनाया गया है. इसका फायदा यह होता है कि महंगे और बड़े सिस्टम को बदलने के बजाय सिर्फ घिसने वाले हिस्से को बदला जा सकता है.
तार को सीधा एक ही जगह क्यों नहीं लगाया जाता?
यह भी इस सिस्टम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. अगर तार पूरी तरह सीधा होकर पेंटोग्राफ के एक ही हिस्से को लगातार छूता रहे, तो पेंटोग्राफ की कॉन्टैक्ट स्ट्रिप का एक ही हिस्सा जल्दी घिस सकता है. इसलिए ओवरहेड तार को ट्रैक के ऊपर हल्का-सा जिग-जैग रखा जाता है. यानी तार पूरी तरह एक सीधी लाइन में नहीं रहता, बल्कि थोड़ा दाएं-बाएं होता रहता है. जब ट्रेन आगे बढ़ती है तो पेंटोग्राफ का संपर्क वाला हिस्सा भी अलग-अलग जगहों पर तार को छूता है. इससे घिसाव एक ही जगह पर नहीं होता, बल्कि पूरे हिस्से में फैल जाता है. इसे ऐसे समझिए जैसे आप किसी लकड़ी की सतह को बार-बार एक ही जगह रगड़ेंगे तो वहां जल्दी निशान पड़ जाएगा. लेकिन अगर रगड़ने की जगह थोड़ी-थोड़ी बदलती रहे तो पूरी सतह धीरे-धीरे घिसेगी.
ट्रेन की रफ्तार से भी फर्क पड़ता है
ट्रेन की स्पीड बढ़ने पर तार और पेंटोग्राफ के बीच संपर्क बनाए रखना आसान काम नहीं होता. तेज रफ्तार में तार ऊपर-नीचे हिल सकता है और पेंटोग्राफ भी उसके साथ लगातार संपर्क बनाए रखने की कोशिश करता है. इसीलिए रेलवे ओवरहेड सिस्टम की ऊंचाई, तनाव और तार की स्थिति को बहुत सावधानी से तय करता है. तार को उचित तनाव में रखा जाता है, ताकि वह ट्रेन के पेंटोग्राफ के संपर्क में सही तरीके से बना रहे. इसके अलावा रेलवे समय-समय पर इन तारों की जांच भी करता है. जहां ज्यादा घिसाव दिखाई देता है, वहां जरूरी रखरखाव किया जाता है.
तार घिसता है, लेकिन सामान्य तार की तरह तेजी से नहीं. मजबूत सामग्री, खास डिजाइन, जिग-जैग व्यवस्था, सही तनाव और नियमित रखरखाव की वजह से इसकी लाइफ काफी लंबी हो जाती है.
और सबसे खास बात यह है कि रेलवे को पहले से पता होता है कि तार और पेंटोग्राफ के बीच घर्षण होगा. इसलिए पूरे सिस्टम को इसी बात को ध्यान में रखकर डिज़ाइन किया जाता है. यानी एक के बाद एक ट्रेन गुजरती रहती हैं, पेंटोग्राफ लगातार तार को छूता रहता है, फिर भी सिस्टम लंबे समय तक काम करता रहता है. इसके पीछे कोई जादू नहीं, बल्कि इंजीनियरिंग, सही डिजाइन और लगातार रखरखाव है.
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