सुप्रीम कोर्ट ने धर्म परिवर्तन और जाति आधारित आरक्षण को लेकर एक मामले में फैसला सुनाया है. एससी ने कहा है कि हिंदू धर्म से इस्लाम में परिवर्तित होने वाला व्यक्ति पिछड़े वर्ग के मुस्लिम दर्जे का दावा नहीं कर सकता.
सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले में फिर दोहराया कि एक व्यक्ति जो हिंदू धर्म, सिख धर्म या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म में कन्वर्ट होने का दावा करता है. उसे अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जा सकता है.
भारतीय संविधान में अनुसूचित जातियों को सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक रूप से आगे बढ़ाने के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं. लेकिन SC का दर्जा और उससे जुड़े लाभ पाने के लिए कुछ शर्तें भी तय हैं. इन्हीं में एक अहम शर्त धर्म से जुड़ी है. आइए, आसान भाषा में समझते हैं कि संविधान क्या कहता है और धर्म परिवर्तन करने पर आरक्षण के नियम कैसे लागू होते हैं.
संविधान में क्या है जाति और आरक्षण का नियम?
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 366(24) में अनुसूचित जातियों की परिभाषा दी गई है. इसके मुताबिक, अनुसूचित जातियां वे जातियां, नस्लें या जनजातियां हैं, जिन्हें संविधान के अनुच्छेद 341 के तहत SC के रूप में मान्यता दी गई है.
अब सवाल है कि किसी जाति को अनुसूचित जाति की सूची में शामिल कौन करता है? संविधान के अनुच्छेद 341 के तहत राष्ट्रपति किसी राज्य या केंद्रशासित प्रदेश के लिए अनुसूचित जातियों की सूची अधिसूचित करते हैं. किसी जाति को इस सूची में शामिल करने या उससे बाहर करने का अधिकार संसद को कानून के जरिए है. यानी किसी जाति को SC की सूची में जोड़ने या हटाने का फैसला मनमाने तरीके से नहीं किया जा सकता.
आखिर SC आरक्षण के लिए क्या आधार है? अनुसूचित जातियों को आरक्षण देने के पीछे एक बड़ी वजह सदियों से चला आ रहा जातिगत भेदभाव और छुआछूत है. इस व्यवस्था के कारण कई समुदायों को सामाजिक बराबरी, शिक्षा और आर्थिक अवसरों से दूर रखा गया.
ऐसे समुदायों को आगे बढ़ाने और उनके साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय को दूर करने के लिए संविधान में विशेष प्रावधान किए गए. परंपरागत छुआछूत से पैदा हुई सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक पिछड़ेपन की स्थिति को SC की पहचान और संरक्षण के संदर्भ में अहम माना गया है.
हालांकि, किसी समुदाय का सामाजिक रूप से पिछड़ा होना और उसका कानूनी तौर पर अनुसूचित जाति की सूची में शामिल होना दो अलग बातें हैं. SC आरक्षण का लाभ लेने के लिए संबंधित संवैधानिक नियमों और सूची में शामिल होने की शर्तों को पूरा करना जरूरी है.
धर्म बदलने पर क्या कहता है संविधान?
इस मामले में संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 का पैरा 3 बेहद अहम है. इसमें अनुसूचित जाति का दर्जा पाने के लिए धर्म से जुड़ी शर्त तय की गई है. इस प्रावधान के तहत हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म मानने वाले लोग, दूसरी जरूरी शर्तें पूरी करने पर, SC का दर्जा पाने के पात्र हो सकते हैं. इसलिए इन्हीं तीन में धर्म बदलने पर एसी आरक्षण का लाभ मिल सकता है.
इसके उलट, ईसाई और इस्लाम जैसे दूसरे धर्म को मानने वाले व्यक्ति को केवल इस आधार पर SC का दर्जा नहीं मिल सकता कि उसका जन्म किसी अनुसूचित जाति में हुआ था. यही वजह है कि अगर धर्म बदलकर कोई ईसाई या इस्लाम में परिवर्तित होता है तो उसे जातिगत आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा.
यानी यहां केवल जन्म की जाति नहीं, बल्कि संविधान में तय शर्तें भी मायने रखती हैं. इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि किसी व्यक्ति की जाति जन्म से तय है, तो धर्म बदलने के बाद भी उसे हर हाल में SC आरक्षण मिलता रहेगा.
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था?
सुप्रीम कोर्ट ने सुसई बनाम भारत संघ मामले में संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के पैरा 3 की वैधता पर विचार किया था. यह मामला 1985 में आया था और इसमें ईसाई धर्म अपनाने वाले व्यक्ति के SC से जुड़े अधिकारों का सवाल उठा था.
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि जाति व्यवस्था ऐतिहासिक रूप से हिंदू समाज की संरचना से जुड़ी रही है. इस व्यवस्था में कुछ समुदायों को जन्म के आधार पर सामाजिक भेदभाव और छुआछूत का सामना करना पड़ा. इससे उन्हें शिक्षा, आर्थिक अवसरों और सामाजिक सम्मान के मामले में गंभीर नुकसान हुआ.
कोर्ट ने यह भी कहा कि राष्ट्रपति ने हिंदू और सिख समुदायों के उन वंचित वर्गों की स्थिति से जुड़े उपलब्ध तथ्यों को ध्यान में रखते हुए 1950 का आदेश जारी किया था. इन समुदायों के लोगों को सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन से उबारने के लिए संवैधानिक संरक्षण जरूरी माना गया था.
इसी आधार पर कोर्ट ने यह नहीं माना कि 1950 के आदेश में हिंदू और सिख धर्म को शामिल करना राष्ट्रपति का मनमाना फैसला था. इस मामले में कोर्ट ने आदेश के पैरा 3 को मनमाना ठहराने की दलील स्वीकार नहीं की.
तो क्या धर्म बदलने वाले हर व्यक्ति का आरक्षण खत्म हो जाता है? इसका जवाब आरक्षण की श्रेणी पर निर्भर करता है. SC आरक्षण के मामले में 1950 के आदेश की धर्म संबंधी शर्त लागू होती है. इसलिए हिंदू धर्म छोड़कर ईसाई या इस्लाम धर्म अपनाने वाला व्यक्ति केवल अपनी जन्मजात जाति के आधार पर SC का दर्जा और उससे जुड़े लाभ पाने का दावा नहीं कर सकता.
हालांकि, आरक्षण की सभी श्रेणियों के नियम एक जैसे नहीं हैं. OBC और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए अलग प्रावधान और पात्रता के नियम हैं. इसलिए यह निष्कर्ष निकालना गलत होगा कि धर्म परिवर्तन करते ही हर तरह का आरक्षण खत्म हो जाता है.
कुल मिलाकर, अनुसूचित जाति का दर्जा केवल जन्म से जुड़ी पहचान का मामला नहीं है. इसके लिए संविधान और 1950 के आदेश में तय शर्तें भी जरूरी हैं. धर्म परिवर्तन के बाद व्यक्ति की सामाजिक पहचान का सवाल अलग हो सकता है, लेकिन SC आरक्षण का लाभ लेने के लिए लागू कानूनी प्रावधानों का पालन करना अनिवार्य है.
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