पुतिन, जिनपिंग भारत में! कौनसी है वो टीम, जो तय करती है, वो किस रास्ते से जाएंगे और कहां रुकेंगे?

जब रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन या चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग जैसे बड़े नेता भारत आते हैं, तो उनकी यात्रा आम दौरे जैसी नहीं होती. एयरपोर्ट से लेकर मीटिंग की जगह तक हर चीज पहले से तय और व्यवस्थित होती है. उनका काफिला किस रास्ते से जाएगा, सुरक्षा कैसे रहेगी और यात्रा से जुड़ी तमाम व्यवस्थाएं कैसे होंगी? ये सारी जिम्मेदारियां आखिर किनके जिम्मे होती है?

Advertisement
विदेशी राष्ट्राध्यक्षों के आने पर उनके पूरे दौरे की जिम्मेदारी भारत में विदेश मंत्रालय की इस टीम के पास होती है (Photo - Reuters) विदेशी राष्ट्राध्यक्षों के आने पर उनके पूरे दौरे की जिम्मेदारी भारत में विदेश मंत्रालय की इस टीम के पास होती है (Photo - Reuters)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 11 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 2:13 PM IST

अभी दिल्ली में हो रहे ब्रिक्स समिट 2026 के लिए रूस, चीन और अन्य देशों के राष्ट्राध्यक्ष भारत पहुंच रहे हैं. ऐसे में आपने देखा होगा कि जब किसी दूसरे देश के राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री का भारत आते हैं तो एयरपोर्ट से लेकर होटल या सरकारी मेहमाननवाजी की जगह तक सुरक्षा का बड़ा इंतजाम किया जाता है. सड़क पर ट्रैफिक रोक दी जाती है, काफिले के लिए खास रूट तय होता है और जिस जगह विदेशी मेहमान ठहरते हैं, वहां भी सुरक्षा की कई लेयर लगा दी जाती हैं.

Advertisement

लेकिन सवाल है कि आखिर यह सब तय कौन करता है? क्या विदेशी नेता की अपनी टीम रास्ता और होटल तय करती है या भारत सरकार की कोई खास टीम इसकी जिम्मेदारी संभालती है? विदेश मंत्रालय की प्रोटोकॉल हैंडबुक में इसका जवाब मिलता है. इसके पीछे सरकारी मशीनरी का पूरा नेटवर्क काम करता है. विदेश मंत्रालय की खास टीम पूरी व्यवस्था करती है.

ऐसे सभी कामों के लिए विदेश मंत्रालय में एक अलग  प्रोटोकॉल डिविजन है. इसके अंदर अलग-अलग सेक्शन हैं और हर सेक्शन का अपना काम है. इनमें से प्रोटोकॉल-1 सेक्शन  सबसे अहम है. खासकर जब बात किसी विदेशी राष्ट्राध्यक्ष या सरकार के प्रमुख की भारत यात्रा की हो. यानी आसान भाषा में समझें तो विदेशी राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री के भारत दौरे के लिए विदेश मंत्रालय की यही प्रोटोकॉल टीम सबसे अहम समन्वयकारी भूमिका निभाती है.

Advertisement

प्रोटोकॉल हैंडबुक के मुताबिक, प्रोटोकॉल-1 सेक्शन के जिम्मे भारत आने वाले  राष्ट्राध्यक्ष, दूसरे देशों के सरकार प्रमुख, उपराष्ट्रपति या उनके समकक्ष और विदेश मंत्रियों की यात्राओं की व्यवस्था होती है. यानी अगर रूस के राष्ट्रपति पुतिन या चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग भारत आते हैं, तो उनकी यात्रा की प्रोटोकॉल व्यवस्था में विदेश मंत्रालय का यही सेक्शन सबसे अहम भूमिका निभाता है.

इस टीम का बॉस कौन होता है?
प्रोटोकॉल-1 सेक्शन, विदेश मंत्रालय के  डेपुटी चीफ ऑफ प्रोटोकॉल (सेरेमनीज) के अंदर होता है. इनके ऊपर चीफ ऑफ प्रोटोकॉल होते हैं, जिनके अंदर सारे प्रोटोकॉल सेक्शंस  होते हैं. हैंडबुक में प्रोटोकॉल-1 सेक्शन के काम में विदेशी राष्ट्राध्यक्षों और सरकार प्रमुखों की भारत यात्रा की व्यवस्था के साथ-साथ उनके स्वागत और विदाई से जुड़ी व्यवस्थाएं भी शामिल हैं.

यानी किसी बड़े विदेशी नेता के भारत पहुंचने से पहले प्रोटोकॉल से जुड़ी तैयारियों को एक तय सरकारी चैनल के जरिए संभाला जाता है.

काफिला किस रास्ते से जाएगा, कैसे तय होता है?
विदेशी राष्ट्राध्यक्ष या प्रधानमंत्री के काफिले के लिए कौन सा रास्ता इस्तेमाल होगा, इसे सिर्फ सामान्य ट्रैफिक के हिसाब से नहीं देखा जाता. सुरक्षा और ट्रैफिक की जरूरतों को ध्यान में रखकर संबंधित एजेंसियों के बीच समन्वय किया जाता है.

विदेशी मेहमानों की यात्रा और उनसे जुड़े सुरक्षा इंतजाम भी प्रोटोकॉल डिविजन के दायरे में आते हैं. सुरक्षा व्यवस्था के लिए संबंधित अधिकारियों और पुलिस के बीच तालमेल किया जाता है. इसका मतलब है कि राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री का काफिला जिस सड़क से गुजरेगा, उसका रूट तय करने की प्रक्रिया में विदेश मंत्रालय की प्रोटोकॉल व्यवस्था के साथ पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों की भूमिका होती है.

Advertisement

सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए रास्ते में ट्रैफिक मैनेजमेंट, सुरक्षा घेरा और जरूरत के मुताबिक दूसरे इंतजाम किए जाते हैं. यानी यह फैसला अकेले विदेश मंत्रालय या अकेले दिल्ली पुलिस का नहीं होता, बल्कि संबंधित एजेंसियां मिलकर व्यवस्था तैयार करती हैं.

यहां एक जरूरी बात समझनी होगी. हैंडबुक में यह नहीं लिखा है कि फलां अधिकारी अकेले बैठकर तय करता है कि पुतिन या जिनपिंग किस सड़क से जाएंगे, बल्कि दस्तावेज में यात्रा की व्यवस्था और सुरक्षा-ट्रैफिक से जुड़े इंतजामों के लिए अलग-अलग सरकारी जिम्मेदारियां बताई गई हैं.

प्रोटोकॉल -1 सेक्शन विदेशी राष्ट्राध्यक्षों और सरकार प्रमुखों की यात्राओं की व्यवस्था संभालता है. वहीं प्रोटोकॉल डिविजन के तहत सुरक्षा से जुड़े काम और बड़े आयोजनों में सिक्योरिटी और ट्रैफिक अरेंजमेंट्स का भी प्रावधान है.

इसका सीधा मतलब है कि विदेशी नेता के काफिले का रूट सिर्फ एक सामान्य ट्रैफिक फैसला नहीं होता. यात्रा के पूरे कार्यक्रम, सुरक्षा जरूरतों और स्थानीय इंतजामों को ध्यान में रखकर संबंधित एजेंसियों के बीच तालमेल किया जाता है. यानी सड़क पर आपको सिर्फ पुलिस का काफिला दिखाई देता है, लेकिन उसके पीछे कई स्तर पर तैयारी होती है.

विदेशी नेता कहां रुकेंगे, यह कैसे तय होता है?
विदेशी राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री की यात्रा में ठहरने की जगह भी यात्रा के पूरे कार्यक्रम का हिस्सा होती है. फिर भी यह हिस्सा थोड़ा अलग है. प्रोटोकॉल हैंडबुक में यह नहीं कहा गया है कि हर विदेशी राष्ट्राध्यक्ष के लिए कोई एक अधिकारी अकेले होटल चुनता है.

Advertisement

 हैंडबुक के मुताबिक, राष्ट्राध्यक्षों और सरकार के प्रमुखों की यात्राओं की व्यवस्था प्रोटोकॉल-1 सेक्शन  के जिम्मे है. वहीं विदेशी मिशनों से जुड़े आवास और सरकारी हॉस्पिटैलिटी के लिए प्रोटोकॉल डिविजन में अलग व्यवस्थाएं भी मौजूद हैं.

हैंडबुक में विदेशी नेताओं की यात्रा के लिए पूरा कार्यक्रम, यात्रा का उद्देश्य, रुकने की अवधि और ठहरने की जगह जैसी जानकारी के प्रोटोकॉल चैनल में दिए जाने का प्रावधान है. बाहर से आने वाले अधिकारियों और राजनयिकों की यात्राओं के मामले में भी इन सारी चीजों की जानकारी के साथ रुकने की जगह के बारे में भी पहले से जानकारी देने की बात कही गई है.

यह भी पढ़ें: रूस की एडवांस सिक्योरिटी टीम.. पुतिन जहां भी जाते हैं, वहां बना लेती है नेटवर्क!

इसलिए किसी विदेशी राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री के ठहरने की जगह तय होना भी उनकी यात्रा के पूरे प्रोटोकॉल और सुरक्षा प्लान का हिस्सा माना जा सकता है. इसमें मेहमान की यात्रा का कार्यक्रम, सुरक्षा जरूरत, कार्यक्रम स्थल से दूरी और दूसरी व्यवस्थाओं को ध्यान में रखा जाता है.

हालांकि, उपलब्ध प्रोटोकॉल हैंडबुक यह नहीं बताता कि किसी खास यात्रा में किस होटल का नाम किस अधिकारी ने अंतिम रूप से तय किया. इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि हर बार एक ही अधिकारी या एक ही एजेंसी होटल चुनती है.इसलिए इसे ऐसे समझना ज्यादा सही होगा कि ठहरने की जगह भी पूरे दौरे की प्रोटोकॉल और सुरक्षा योजना का हिस्सा होती है, जिसे संबंधित सरकारी व्यवस्था के साथ समन्वय में संभाला जाता है.

Advertisement

विदेशी नेता की सिक्योरिटी कैसे मैनेज होती है?
यहां एक बात समझना जरूरी है. यात्रा का प्रोटोकॉल और सुरक्षा व्यवस्था एक ही चीज नहीं है. दोनों के लिए अलग-अलग एजेंसियां और अधिकारी मिलकर काम करते हैं.पुतिन या जिनपिंग जैसे नेताओं के साथ उनकी अपनी सुरक्षा टीम भी भारत आती है. लेकिन भारत में आने के बाद सुरक्षा व्यवस्था भारतीय नियमों और यहां की सुरक्षा एजेंसियों के साथ तालमेल से चलती है.

प्रोटोकॉल हैंडबुक में विदेशी प्रतिनिधिमंडलों की सुरक्षा व्यवस्था के लिए संबंधित अधिकारियों और एजेंसियों के साथ को-ऑर्डिनेशन का प्रावधान है. विदेश मंत्रालय के प्रोटोकॉल डिविजन में में डेपुटी चीफ ऑफ प्रोटोकॉल (प्रिविलेज) और प्रोटोकॉल अफसर -2  जैसे अधिकारी सुरक्षा व्यवस्था के को-ऑर्डिनेशन के लिए जिम्मेदार होते हैं. जरूरत पड़ने पर पुलिस और दूसरी सुरक्षा एजेंसियों के साथ भी तालमेल किया जाता है.

यह भी पढ़ें: पहले ही आ गए बड़े-बड़े रूसी प्लेन... पुतिन जहां जाते हैं, अपने साथ क्या-क्या लेकर चलते हैं?

नई दिल्ली में विदेशी दूतावासों और राजनयिक परिसरों की सुरक्षा से जुड़ी व्यवस्था के लिए डिप्लोमेटिक सिक्योरिटी फोर्स (DSF) भी हैं. हालांकि पुलिस सहायता से जुड़े रिक्वेस्ट प्रोटोकॉल -2 सेक्शन के जरिए किए जाते हैं. विदेशी राष्ट्राध्यक्ष या प्रधानमंत्री के साथ आमतौर पर उनकी अपनी सुरक्षा टीम भी आती है. खास तौर पर हथियार लेकर आने वाले सुरक्षा अधिकारियों के मामले में भारत की अनुमति जरूरी होती है. यानी विदेशी नेता की अपनी सुरक्षा टीम हो सकती है, लेकिन भारत में उनका दौरा भारतीय प्रोटोकॉल और सुरक्षा व्यवस्था से अलग होकर नहीं चलता.
 

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement
Latest News in Hindi »