30 अगस्त 1918 का दिन रूस की क्रांति के इतिहास में बेहद अहम और खौफनाक घटना के लिए याद किया जाता है. इसी दिन मॉस्को की एक फैक्ट्री में भाषण देने के बाद सोवियत नेता व्लादिमीर लेनिन पर हमला हुआ था. फान्या कपलान नाम की महिला ने उन पर दो गोलियां चलाईं. लेनिन गंभीर रूप से घायल हुए, लेकिन उनकी जान बच गई. इस हमले के बाद बोल्शेविकों ने अपने राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ बड़े पैमाने पर दमन शुरू कर दिया. रूस पहले ही गृहयुद्ध की आग में जल रहा था और इस घटना ने हालात को और हिंसक बना दिया.
लेनिन मॉस्को की एक फैक्ट्री में भाषण देकर बाहर निकल रहे थे. तभी फान्या कपलान ने उन पर गोली चला दी. वह सोशल रिवोल्यूशनरी पार्टी से जुड़ी हुई थीं. कपलान ने लेनिन पर दो गोलियां चलाईं. हमले में लेनिन बुरी तरह घायल हो गए. उनकी हालत गंभीर थी, लेकिन डॉक्टरों के इलाज के बाद वह बच गए.
इस हमले ने रूस की राजनीति को हिला दिया. बोल्शेविक सरकार ने इसे अपने खिलाफ बड़ी साजिश के तौर पर देखा. इसके बाद सोशल रिवोल्यूशनरियों और दूसरे राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ बड़े पैमाने पर कार्रवाई शुरू हुई. रूस में हजारों लोगों को मौत की सजा दी गई और राजनीतिक दमन का दौर और तेज हो गया.
भाई की फांसी ने बदली लेनिन की जिंदगी
लेनिन का जन्म 1870 में हुआ था. उनका नाम व्लादिमीर इलिच उल्यानोव रखा गया. उनकी जिंदगी में क्रांति का विचार बहुत जल्दी आया. 1887 में उनके बड़े भाई को जार अलेक्जेंडर तृतीय की हत्या की साजिश रचने के आरोप में फांसी दे दी गई. इस घटना का लेनिन पर गहरा असर पड़ा और वह क्रांतिकारी आंदोलन की तरफ बढ़ते चले गए.
उन्होंने कानून की पढ़ाई की और पेट्रोग्राद, जिसे आज सेंट पीटर्सबर्ग कहा जाता है, में वकालत शुरू की. इसी दौरान वह मार्क्सवादी विचारधारा से जुड़े क्रांतिकारियों के संपर्क में आए. 1895 में उन्होंने मार्क्सवादी समूहों को एकजुट करके 'यूनियन फॉर द स्ट्रगल फॉर द लिबरेशन ऑफ द वर्किंग क्लास' बनाया. इसका मकसद मजदूरों को मार्क्सवादी विचारधारा से जोड़ना था.
लेकिन क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण दिसंबर 1895 में लेनिन और संगठन के दूसरे नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया. करीब एक साल जेल में रहने के बाद उन्हें तीन साल के लिए साइबेरिया भेज दिया गया. साइबेरिया से निर्वासन खत्म होने के बाद 1900 में लेनिन पश्चिमी यूरोप चले गए. यहीं उन्होंने अपनी क्रांतिकारी गतिविधियां जारी रखीं और 'लेनिन' नाम को अपने छद्म नाम के तौर पर अपनाया.
1903 में लंदन में रूसी मार्क्सवादियों की बैठक हुई. यहां रूसी सोशल-डेमोक्रेटिक वर्कर्स पार्टी का गठन हुआ. लेकिन जल्द ही पार्टी दो धड़ों में बंट गई. एक तरफ लेनिन के बोल्शेविक थे, जो ज्यादा सख्त और क्रांतिकारी रास्ते के पक्ष में थे. दूसरी तरफ मेंशेविक थे, जो समाजवाद की ओर लोकतांत्रिक तरीके से बढ़ने की वकालत करते थे. दोनों गुटों के बीच मतभेद लगातार बढ़ते गए.
दुनिया के पहले मार्क्सवादी राज्य के नेता बने लेनिन
नवंबर 1917 बोल्शेविकों के नेतृत्व में रेड गार्ड्स ने अंतरिम सरकार को हटा दिया और सोवियत शासन की घोषणा कर दी. सत्ता में आने के बाद लेनिन दुनिया के पहले मार्क्सवादी राज्य के वास्तविक शासक बन गए. उनकी सरकार ने जर्मनी के साथ शांति समझौता किया, उद्योगों का राष्ट्रीयकरण किया और जमीन का बंटवारा किया.
लेकिन रूस में शांति नहीं आई. 1918 से बोल्शेविक सरकार को जार समर्थक ताकतों के खिलाफ भीषण गृहयुद्ध लड़ना पड़ा. 1920 तक जार समर्थक सेनाएं हार गईं. इसके बाद बोल्शेविकों की सत्ता मजबूत होती गई और 1922 में सोवियत संघ यानी USSR का गठन हुआ.
लेनिन की सेहत बाद के वर्षों में खराब होती गई और 1924 की शुरुआत में उनकी मौत हो गई. उनकी मौत के बाद उनके शरीर को सुरक्षित रखा गया और मॉस्को के क्रेमलिन के पास एक मकबरे में रखा गया. उनके सम्मान में पेट्रोग्राद शहर का नाम बदलकर लेनिनग्राद कर दिया गया.
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