मुस्कान को मौत की सजा... क्या फांसी सुनाने के बाद पेन की निब तोड़ते हैं जज?

फांसी की सजा सुनाने के बाद जज के पेन की निब तोड़ने की बात आपने फिल्मों और टीवी सीरियल में जरूर देखी होगी. लेकिन क्या भारत की अदालतों में भी ऐसा होता है? क्या इसके पीछे कोई कानूनी नियम है? चलिए जानते हैं.

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क्या भारत की अदालतों में फांसी की सजा सुनाने के बाद पेन की निब तोड़ना जरूरी होता है? ( Photo: AI) क्या भारत की अदालतों में फांसी की सजा सुनाने के बाद पेन की निब तोड़ना जरूरी होता है? ( Photo: AI)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 15 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 11:46 AM IST

मेरठ के सौरभ राजपूत हत्याकांड में उनकी पत्नी मुस्कान रस्तोगी और उसके साथी साहिल शुक्ला को हत्या के मामले में मौत की सजा सुनाई गई है. इस फैसले के बाद एक बार फिर चर्चा शुरू हो गई है कि जब किसी जज की ओर से किसी को फांसी की सजा सुनाई जाती है, तो क्या वह अपने पेन की निब तोड़ देता है? आपने भी फिल्मों और टीवी सीरियल में ऐसा होते हुए देखा होगा. लेकिन क्या असल जिंदगी में भी ऐसा होता है? आखिर फांसी की सजा सुनाने के बाद पेन की निब क्यों तोड़ी जाती है?

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लेकिन क्या असल जिंदगी में भी जज ऐसा करते हैं? क्या भारत की अदालतों में फांसी की सजा सुनाने के बाद पेन की निब तोड़ना जरूरी होता है? अगर ऐसा किया जाता है, तो इसके पीछे क्या वजह बताई जाती है? आइए, आसान भाषा में समझते हैं, क्या सच में ऐसा होता हैं, अगर ऐसा होता है तो इसके पीछे कारण है.

क्या सच में जज पेन की निब तोड़ देते हैं?
आपने फिल्मों में देखा होगा कि जज अदालत में बैठकर किसी आरोपी को फांसी की सजा सुनाते हैं. इसके बाद वह अपने पेन की निब तोड़ देते हैं. इस दृश्य को देखकर ऐसा लगता है कि फांसी की सजा सुनाने के बाद जज को अपना पेन तोड़ना ही पड़ता है. लेकिन सच्चाई यह है कि भारत में ऐसा करना कोई कानूनी नियम नहीं है. यानी अगर कोई जज किसी दोषी को मौत की सजा सुनाता है, तो उसके लिए पेन की निब तोड़ना जरूरी नहीं है.

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पेन की निब तोड़ने की बात एक पुरानी प्रथा या परंपरा की कहानी के रूप में प्रचलित है. इसे मौत की सजा की गंभीरता से जोड़कर देखा जाता है. हालांकि, भारत की अदालतों में यह जरूरी रस्म है, इस बात का कोई ठोस प्रमाण नहीं है.

आखिर पेन की निब तोड़ने की बात कहां से आई?
कई कानून के जानकार बताते हैं कि पेन की निब तोड़ने की कहानी को अक्सर ब्रिटेन की पुरानी न्याय व्यवस्था से जोड़कर बताया जाता है. कहा जाता है कि मौत की सजा सुनाने के बाद पेन की निब तोड़ दी जाती थी, ताकि यह दिखाया जा सके कि उस पेन से अब किसी दूसरे व्यक्ति को मौत की सजा नहीं सुनाई जाएगी. मान लीजिए कि किसी जज ने एक व्यक्ति को बहुत गंभीर अपराध के लिए मौत की सजा सुनाई. इस सजा के बाद पेन की निब तोड़ने को एक प्रतीक के रूप में देखा गया, जो बताता है कि यह फैसला बहुत गंभीर है. हालांकि, यह परंपरा कितनी पुरानी है और क्या ब्रिटेन की अदालतों में ऐसा आधिकारिक रूप से किया जाता था, इसकी पक्की ऐतिहासिक पुष्टि स्पष्ट नहीं है. 

कई बार यह भी सुनने को मिलता है कि पेन की निब तोड़ने के बाद जज अपने फैसले को बदल नहीं सकते. लेकिन ऐसा नहीं है. पेन की निब तोड़ने से किसी जज के कानूनी अधिकार खत्म नहीं होते. किसी फैसले में बदलाव या उसकी समीक्षा कानून और अदालत के नियमों के अनुसार होती है. पेन तोड़ने से कानून नहीं बदल जाता. अगर किसी व्यक्ति को अदालत से सजा मिली है, तो वह कानून के अनुसार ऊपरी अदालत में अपील कर सकता है. पेन की निब टूटने से उसका यह अधिकार खत्म नहीं हो जाता.

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भारत में किन अपराधों के लिए मिल सकती है मौत की सजा?
भारत में हर अपराध के लिए मौत की सजा नहीं दी जाती. यह सबसे गंभीर सजा है और अदालत इसे बहुत ही असाधारण मामलों में देती है. सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, 'ऐसे बेहद गंभीर मामले, जिनमें मौत की सजा दी जा सकती है' मामलों में दी जानी चाहिए. आसान भाषा में इसका मतलब है कि मामला बेहद गंभीर होना चाहिए और अदालत को यह देखना होता है कि क्या दूसरी सजा देकर न्याय किया जा सकता है. अदालत अपराध की गंभीरता, उससे जुड़े हालात और दूसरे जरूरी पहलुओं पर विचार करती है. इसके बाद ही कानून के अनुसार फैसला सुनाया जाता है.

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