जब फोन नहीं थे, तब पहाड़ों पर आई आपदा का अलर्ट नीचे कैसे भेजा जाता था

पहले के जमाने में जब कम्युनिकेशन के इतने साधन नहीं थे. तब पहाड़ों पर आने वाली आपदाओं जैसे लैंड स्लाइडिंग, एवेलांच और फ्लैश फ्लड की सूचना नीचे के गांवों तक कैसे पहुंचाई जाती थी.

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पहले के जमाने में पहाड़ों पर आई आपदा का संकेत नीचे कैसे भेजा जाता था (Photo - AI Generated) पहले के जमाने में पहाड़ों पर आई आपदा का संकेत नीचे कैसे भेजा जाता था (Photo - AI Generated)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 31 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 6:10 PM IST

आज स्मार्ट फोन के दौर में कम्युनिकेशन काफी आसान हो गया है. हजारों किलोमीटर दूर से भी लोग आराम से ऑडियो- विजुअल माध्यम से यानी वीडियो कॉलिंग के जरिए भी बात कर सकते हैं. सूचना का प्रवाह तेज हो गया है. खासकर अब तो ऐसे- ऐसे सिस्टम आ गए हैं कि मौसम का पूर्वानुमान और किसी भी आपदा का अलर्ट हम तक पहले ही पहुंच जाता है. 

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जब मोबाइल फोन, सैटेलाइट कम्युनिकेशन सिस्टम या और भी दूसरे तकनीक ईजाद नहीं हुए थे. तब पर्वतीय इलाकों में किसी आपदा के वक्त पहाड़ों से नीचे सूचना कैसे पहुंचाई जाती थी? बाढ़ या लैंड स्लाइडिंग जैसे आपदा को लेकर लोगों की कैसे सतर्क किया जाता था? 

आधुनिक दूरसंचार से पहले, पहाड़ों में आपदा की जानकारी नीचे घाटियों तक कई तरीके से दी जाती थी. इसमें प्रमुख था आग लगाकर आपदा का संकेत देना.ऊंचे पहाड़ों पर जलती आग नीचे दूर- दूर तक कई गांवों में दिखाई दे जाते थे. रात के समय आग की जलती रोशनी और दिन में निकलने वाला धुआं दूर- दूर तक दिखाई देता था.  

पहले पहाड़ों पर आग जलाकर करते थे लोगों को सतर्क
भारत के हिमालयी क्षेत्र के पहाड़ों पर हिमस्खलन, लैंड स्लाइडिंग, बाढ़ या किसी भी तरह की प्राकृतिक आपदा का संकेत देने के लिए 'खडपटिया' का इस्तेमाल होता था. यह सूखी लकड़ियों का ढेर होता था. किसी भी तरह का खतरा होने पर तुरंत इसमें आग लगा दिया जाता था. इससे आसपास के गांवों को संकेत जाता था कि ऊपर कुछ गड़बड़ है.

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इसी तरह बाद में पटाखों और तेज आवाजों का इस्तेमाल किया जाने लगा. आपदा के खतरे  की चेतावनी देने के लिए शंख या तुरही बजाकर खास तरह की आवाज निकालते थे. इससे नीचे के गांव वाले अलर्ट हो जाते थे. 

इसी तरह विदेशों में आल्पस की पहाड़ों पर आने वाली आपदों का संकेत भी ध्वनि और रोशनी से दिया जाता था. पहाड़ों पर बने चर्च में जोर- जोर से घंटी बजाकर खतरे की चेतावनी आम था. बाढ़ या हिमस्खलन का संकेत देने के लिए विशिष्ट लयबद्ध घंटी बजाने के पैटर्न थे.

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इसके अलावा चेतावनी देने के लिए अल्पाइन हॉर्न का भी इस्तेमाल किया जाता था.  ये लंबे लकड़ी के सींग गहरी घाटियों में सांकेतिक चेतावनी संदेश पहुंचा सकते थे. यह तुरही की तरह ही काम करता था. कुछ जगहों पर बंदूक की गोलियां या विस्फोटक से भी अलर्ट भेजे जाते थे. ऐसे संकेत पहाड़ों पर बस्ती बसाने वाले और माइनिंग संकट यानी खदान से जुड़ी आपदा का संकेत देने के लिए काले पाउडर के विस्फोट या राइफल की गोलियों का इस्तेमाल करते थे. 

आल्प्स जैसे क्षेत्रों में, पहाड़ों की तेज हवाओं को भेदने और आस-पास की चोटियों को सचेत करने के लिए विशिष्ट, ऊंची आवाज वाली आवाज का भी इस्तेमाल किया जाता था. पहाड़ों पर धुआं करना, निचले इलाके व आसपास के पहाड़ों को सतर्क करने का सबसे बढ़िया तरीका था. 

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