दिल्ली में अक्टूबर-नवंबर का महीना आते ही मौसम बदलने लगता है. सुबह और शाम हल्की ठंड महसूस होने लगती है. इसी दौरान दिल्ली की कई सड़कों, पार्कों और रिहायशी इलाकों में एक अलग तरह की खुशबू भी महसूस होने लगती है. कुछ लोगों को यह खुशबू अच्छी लगती है, तो कुछ को इससे अजीब सी खुशबू आती है. कई बार लोगों को लगता है कि आसपास कहीं इत्र छिड़का गया है या किसी फूल की महक हवा में घुल गई है.
लेकिन क्या आप जानते हैं कि दिल्ली की हवा में अचानक घुलने वाली इस खुशबू के पीछे किसी इत्र या फूल का नहीं, बल्कि एक खास पेड़ का हाथ है? इस पेड़ का नाम है सप्तपर्णी. इसे अंग्रेजी में डेविल ट्री (Devil Tree) भी कहा जाता है. खास बात यह है कि साल के ज्यादातर समय सामान्य दिखने वाला यह पेड़ ठंड शुरू होने से ठीक पहले अपनी खुशबू से आसपास के माहौल को बदल देता है. आइए समझते हैं कि सप्तपर्णी का पेड़ कैसा होता है, इसमें फूल कब आते हैं और इसकी खुशबू इतनी दूर तक कैसे फैल जाती है.
सप्तपर्णी के फूलों से आती है यह खुशबू
सप्तपर्णी का वैज्ञानिक नाम Alstonia scholaris है. यह एक सदाबहार पेड़ है, यानी इसकी पत्तियां पूरे साल हरी रहती हैं. इसकी सबसे खास बात यह है कि इसके फूल खिलने का समय आम पेड़ों से थोड़ा अलग होता है. आमतौर पर दिल्ली में सितंबर के आखिरी दिनों से इस पेड़ पर फूल आने शुरू हो जाते हैं. अक्टूबर से दिसंबर तक इसमें फूल खिले रहते हैं. इसके फूल बहुत छोटे होते हैं और हल्के सफेद, क्रीम या हरे रंग के दिखाई देते हैं. ये फूल अकेले नहीं, बल्कि गुच्छों में खिलते हैं.
जब एक पेड़ पर हजारों छोटे-छोटे फूल खिलते हैं, तो उनकी खुशबू आसपास के बड़े इलाके में फैलने लगती है. शाम के समय इसकी महक और ज्यादा महसूस हो सकती है. यही वजह है कि दिल्ली में कई बार सड़क से गुजरते हुए भी लोगों को इस पेड़ की खुशबू आने लगती है.
आखिर इसकी खुशबू कैसी होती है?
सप्तपर्णी के फूलों की खुशबू को एक शब्द में बताना मुश्किल है. कुछ लोगों को इसमें मीठे इत्र जैसी महक आती है, तो कुछ को यह इलायची और मसालों जैसी तेज खुशबू लगती है. कई लोग इसकी तुलना रातरानी के फूलों से भी करते हैं. लेकिन दिलचस्प बात यह है कि हर किसी को इसकी खुशबू अच्छी नहीं लगती. कुछ लोगों को यह महक बहुत तेज और भारी महसूस होती है. ऐसे लोगों को इसके आसपास से गुजरते समय सिरदर्द, जी मिचलाने या एलर्जी जैसी परेशानी भी महसूस हो सकती है. इसलिए जहां कुछ लोगों के लिए सप्तपर्णी की खुशबू सर्दियों और त्योहारों के आने का संकेत है, वहीं कुछ लोग इसके फूल खिलने के मौसम का इंतजार नहीं करते.
सात पत्तियों की वजह से पड़ा सप्तपर्णी नाम
इस पेड़ का नाम भी इसकी एक खास पहचान से जुड़ा है. संस्कृत में 'सप्त' का मतलब सात और 'पर्णी' का मतलब पत्तियों से है. इसकी पत्तियां अक्सर एक ही जगह से सात के समूह में निकलती हैं. इसी वजह से इसका नाम सप्तपर्णी पड़ा. हालांकि, इसकी हर शाखा पर हमेशा सात ही पत्तियां हों, ऐसा जरूरी नहीं है. कई बार इनकी संख्या चार से आठ तक भी हो सकती है. इसकी पत्तियां लंबी, चिकनी और चमकदार होती हैं. ये एक ही बिंदु से चारों तरफ फैली होती हैं. दूर से देखने पर इसकी शाखाओं पर पत्तियों का गोल गुच्छा दिखाई देता है.
हिमालय से दिल्ली की सड़कों तक कैसे पहुंचा यह पेड़?
सप्तपर्णी भारत का ही पेड़ है. यह मुख्य रूप से हिमालय के कई इलाकों के अलावा देश के कई दूसरे हिस्सों में भी पाया जाता है. हालांकि, दिल्ली की स्थानीय वनस्पति में यह मूल रूप से शामिल नहीं था. दिल्ली में इसे बड़े पैमाने पर लगाने की शुरुआत 1940 के दशक में हुई थी. खासकर गोल्फ लिंक्स जैसे इलाकों में इसके पेड़ लगाए गए. धीरे-धीरे यह राजधानी की सड़कों, पार्कों और रिहायशी इलाकों में भी नजर आने लगा. शहरों में इसे लगाने की एक वजह इसकी मजबूती भी है. यह पेड़ अलग-अलग मौसमी परिस्थितियों में बढ़ सकता है और शहरी वातावरण में भी अच्छी तरह विकसित होता है. इसकी सदाबहार पत्तियां इसे सालभर हरा-भरा बनाए रखती हैं. आज दिल्ली के कई इलाकों में सप्तपर्णी के पुराने और बड़े पेड़ देखने को मिल जाते हैं. लोधी गार्डन और गोल्फ लिंक्स के आसपास भी इसके पेड़ मौजूद हैं.
इसे डेविल ट्री यानी शैतान का पेड़ क्यों कहते हैं?
सप्तपर्णी की कहानी सिर्फ इसकी खुशबू और पत्तियों तक सीमित नहीं है. इसे अंग्रेजी में डेविल ट्री यानी शैतान का पेड़ भी कहा जाता है. इसके पीछे कई पुरानी लोक कथाएं और मान्यताएं जुड़ी हुई हैं. दक्षिण भारत के कुछ इलाकों में ऐसी मान्यता रही है कि इस पेड़ पर यक्षिणियां रहती हैं. लोककथाओं में यक्षिणियों को रहस्यमयी और सुंदर महिलाओं के रूप में बताया गया है. कुछ कहानियों में उन्हें जंगलों और पेड़ों से जुड़ी आत्माओं के रूप में भी दिखाया गया है. कहा जाता था कि सप्तपर्णी के पेड़ के आसपास रात के समय एक अजीब सी तेज खुशबू आती है. इसी महक और पेड़ से जुड़ी रहस्यमयी कहानियों के कारण लोगों के मन में इसे लेकर डर पैदा हुआ. हालांकि, इन कहानियों का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है. ये पुरानी लोक मान्यताएं हैं, जो पीढ़ियों से सुनाई जाती रही हैं.
कभी बच्चों की स्लेट बनाने में भी इस्तेमाल होती थी इसकी लकड़ी
सप्तपर्णी को अंग्रेजी में ब्लैकबोर्ड ट्री भी कहा जाता है. इसकी एक दिलचस्प वजह है. पुराने समय में इसकी हल्की लकड़ी का इस्तेमाल बच्चों के लिखने वाली स्लेट और ब्लैक बोर्ड बनाने में किया जाता था. इसके वैज्ञानिक नाम में शामिल 'स्कॉलरिस' शब्द भी शिक्षा से जुड़ा है. यही नहीं, पश्चिम बंगाल के शांतिनिकेतन स्थित विश्व भारती विश्वविद्यालय में दीक्षांत समारोह के दौरान विद्यार्थियों को सप्तपर्णी की पत्तियां देने की परंपरा भी रही है. इस तरह जिस पेड़ को कभी रहस्यमयी कहानियों और डर से जोड़कर देखा जाता था, वही पेड़ धीरे-धीरे शिक्षा और सम्मान का प्रतीक भी बन गया.
दिल्ली में सप्तपर्णी की खुशबू कब तक रहती है?
दिल्ली में सप्तपर्णी के फूल आमतौर पर सितंबर के आखिरी दिनों से दिसंबर तक दिखाई देते हैं. अक्टूबर और नवंबर के दौरान इसकी खुशबू ज्यादा महसूस होती है. इसके बाद धीरे-धीरे फूल कम होने लगते हैं और हवा में इसकी महक भी घट जाती है. यानी दिल्ली में सर्दियों की दस्तक के साथ आने वाली यह अजीब सी खुशबू महज मौसम का एहसास नहीं है. इसके पीछे शहर के पेड़ों की भी एक दिलचस्प कहानी है. अगली बार अक्टूबर या नवंबर में दिल्ली की किसी सड़क से गुजरते हुए आपको हवा में कोई अलग सी मीठी या तेज खुशबू महसूस हो, तो आसपास जरूर देखिएगा. हो सकता है कि उसके पास ही सप्तपर्णी का कोई पेड़ खड़ा हो.
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