सोचकर देखिए... आपका कोई दोस्त, यार, रिश्तेदार या करीबी पड़ोसी आपकी गाड़ी लेकर गया और रास्ते में उसका एक्सीडेंट हो गया. अब सवाल है कि गलती गाड़ी चलाने वाले की थी, लेकिन गाड़ी तो आपके नाम पर है... तो क्या पुलिस आपके खिलाफ भी केस दर्ज कर सकती है? क्या आपको भी जेल जाना पड़ सकता है? और क्या हादसे के बाद मुआवजे की जिम्मेदारी भी आपके सिर आ सकती है?
दरअसल, ऐसा ही सवाल गुरुग्राम के एक हिट एंड रन केस के बाद उठा है. इस मामले में हादसा जब हुआ, जब भी कार मालिक कार नहीं चला रहा था. यहीं से सवाल उठता है कि अगर आपकी गाड़ी कोई दूसरा व्यक्ति चलाए और उससे एक्सीडेंट हो जाए, तो क्या गाड़ी के मालिक को भी जिम्मेदार ठहराया जा सकता है?
एक्सीडेंट की आपराधिक जिम्मेदारी किसकी?
देश के कानून और मोटर व्हीकल एक्ट के नियमों के मुताबिक, अगर किसी गाड़ी से दुर्घटना होती है तो पहली नजर में आपराधिक लापरवाही की जिम्मेदारी उस व्यक्ति की होती है जो हादसे के वक्त गाड़ी चला रहा था. यानी अगर ड्राइवर की गलती से दुर्घटना हुई है तो पुलिस ड्राइवर के खिलाफ लापरवाही से गाड़ी चलाने और चोट पहुंचाने जैसी कार्रवाई कर सकती है. जरूरत पड़ने पर एफआईआर में हत्या के प्रयास की धारा 109 बीएएस भी जोड़ी जा सकती है.
अगर गाड़ी चलाने वाले के पास वैलिड ड्राइविंग लाइसेंस है, तो आम तौर पर सिर्फ गाड़ी का मालिक होने की वजह से उसे आपराधिक सजा या जेल नहीं होगी. लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती.
गाड़ी मालिक भी फंस सकता है?
लल्लनटॉप की रिपोर्ट के अनुसार, अगर मालिक ने बिना सोचे-समझे अपनी गाड़ी ऐसे व्यक्ति को दे दी, जिसके पास वैलिड ड्राइविंग लाइसेंस नहीं था या जो शराब के नशे में था, तो गाड़ी मालिक को भी अप्रत्यक्ष तौर पर जिम्मेदार ठहराया जा सकता है. नाबालिग के गाड़ी चलाने के मामलों में भी गाड़ी मालिक या अभिभावक के लिए मुश्किल खड़ी हो सकती है. इसका उदाहरण पुणे पोर्श केस में देखने को मिला था. आरोपी नाबालिग के पिता विशाल अग्रवाल को भी गिरफ्तार किया गया था. उनके खिलाफ मोटर वाहन अधिनियम की धारा 199ए और जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत लापरवाही बरतने और नाबालिग को गाड़ी सौंपने का मामला दर्ज किया गया था.
गाड़ी के कागजात में गड़बड़ी तो?
सिर्फ ड्राइवर का लाइसेंस ही नहीं, गाड़ी के दस्तावेज भी महत्वपूर्ण हैं. अगर गाड़ी का इंश्योरेंस या फिटनेस सर्टिफिकेट अवैध निकला, तो ऐसी स्थिति में ड्राइवर के साथ गाड़ी का मालिक भी कार्रवाई की चपेट में आ सकता है. यानी अपनी गाड़ी किसी को देने का मतलब सिर्फ चाबी उसके हाथ में देना नहीं है. यह भी देखना जरूरी है कि वह व्यक्ति गाड़ी चलाने के लिए वैध है या नहीं और गाड़ी के कागजात भी ठीक हैं या नहीं.
अब इंश्योरेंस का मामला समझिए
मान लीजिए आपकी गाड़ी का थर्ड पार्टी इंश्योरेंस है और गाड़ी चलाने वाले के पास वैलिड ड्राइविंग लाइसेंस भी है. ऐसी स्थिति में हादसे में पीड़ित पक्ष के क्लेम का भुगतान इंश्योरेंस कंपनी कर सकती है. लेकिन अगर इन शर्तों में गड़बड़ी है तो मामला पेचीदा हो सकता है. पीड़ित पक्ष को मिलने वाले मुआवजे को लेकर गाड़ी के मालिक और उसकी बीमा कंपनी की जिम्मेदारी सामने आ सकती है.
बीमा कंपनी यह भी कह सकती है कि गाड़ी लापरवाही से चलाई गई या ऐसी स्थिति में किसी दूसरे व्यक्ति को दी गई, जहां ऐसा नहीं किया जाना चाहिए था. ऐसे मामलों में क्लेम को लेकर विवाद खड़ा हो सकता है और गाड़ी के मालिक को आर्थिक परेशानी उठानी पड़ सकती है.
मतलब चाबी देने से पहले सोचिए
तो पूरी बात का मतलब यह है कि किसी दूसरे व्यक्ति के आपकी गाड़ी चलाने और उससे एक्सीडेंट होने भर से गाड़ी का मालिक अपने आप आरोपी नहीं बन जाता. हादसे के वक्त गाड़ी चला रहे व्यक्ति की आपराधिक जिम्मेदारी सबसे पहले देखी जाती है. लेकिन अगर मालिक ने गाड़ी किसी ऐसे व्यक्ति को दी थी जिसके पास वैलिड लाइसेंस नहीं था, जो नशे में था या मामला नाबालिग के गाड़ी चलाने जैसा था, तो गाड़ी मालिक के लिए भी कानूनी मुश्किल खड़ी हो सकती है.
इसलिए अगली बार अपनी गाड़ी की चाबी किसी दोस्त, रिश्तेदार या करीबी को देने से पहले सिर्फ यह मत सोचिए कि 'अपना ही आदमी है'... यह भी देख लीजिए कि वह गाड़ी चलाने के लिए वैध है या नहीं और आपकी गाड़ी के कागजात पूरे हैं या नहीं.
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