'मायके लौट आईं मां नंदा-सुनंदा…' नैनीताल में गूंजा जयकारा, तड़के 3 बजे से दर्शन को लगी कतार

कुमाऊं की धरती पर एक बार फिर आस्था का वह रंग दिखाई दिया, जिसका श्रद्धालुओं को पूरे साल इंतजार रहता है. मां नंदा-सुनंदा अपने मायके लौट आई हैं. नैनीताल के ऐतिहासिक मां नयना देवी मंदिर में कुमाऊं की कुलदेवी मां नंदा-सुनंदा की प्रतिमाओं की विधि-विधान और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ प्राण प्रतिष्ठा की गई. जैसे ही प्राण प्रतिष्ठा संपन्न हुई, पूरा मंदिर परिसर मां के जयकारों से गूंज उठा.

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नैनीताल के ऐतिहासिक मां नयना देवी मंदिर में कुमाऊं की कुलदेवी मां नंदा-सुनंदा की प्रतिमाओं की विधि-विधान और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ प्राण प्रतिष्ठा की गई (Photo: ITG) नैनीताल के ऐतिहासिक मां नयना देवी मंदिर में कुमाऊं की कुलदेवी मां नंदा-सुनंदा की प्रतिमाओं की विधि-विधान और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ प्राण प्रतिष्ठा की गई (Photo: ITG)

लीला सिंह बिष्ट

  • नैनीताल ,
  • 19 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 11:40 AM IST

कुमाऊं की धरती पर एक बार फिर आस्था का वह रंग दिखाई दिया, जिसका श्रद्धालुओं को पूरे साल इंतजार रहता है. मां नंदा-सुनंदा अपने मायके लौट आई हैं. नैनीताल के ऐतिहासिक मां नयना देवी मंदिर में कुमाऊं की कुलदेवी मां नंदा-सुनंदा की प्रतिमाओं की विधि-विधान और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ प्राण प्रतिष्ठा की गई. जैसे ही प्राण प्रतिष्ठा संपन्न हुई, पूरा मंदिर परिसर मां के जयकारों से गूंज उठा.

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मां के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं का पहुंचना देर रात से ही शुरू हो गया था. तड़के करीब तीन बजे से मंदिर के बाहर भक्तों की कतारें लग गईं. सुबह होते-होते मंदिर परिसर और आसपास का इलाका श्रद्धालुओं से भर गया. हाथों में पूजा की थाली, चेहरे पर भक्ति और जुबां पर मां के जयकारे लिए लोग अपनी कुलदेवी के दर्शन के लिए पहुंचे.

मायके आई हैं मां नंदा-सुनंदा

कुमाऊं की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा में मां नंदा-सुनंदा का विशेष स्थान है. मान्यता है कि चंद राजाओं के समय से ही मां नंदा की आराधना की परंपरा चली आ रही है. आज भी कुमाऊं के बड़ी संख्या में परिवार मां नंदा-सुनंदा को अपनी कुलदेवी मानकर पूजा-अर्चना करते हैं. लोक मान्यता के मुताबिक मां नंदा-सुनंदा साल में एक बार अपने ससुराल से मायके यानी कुमाऊं की धरती पर आती हैं. इसी भाव के साथ नंदाष्टमी के अवसर पर मां की प्रतिमाएं तैयार की जाती हैं. इसके बाद विधि-विधान से प्राण प्रतिष्ठा कर उनके मायके आगमन का उत्सव मनाया जाता है. यही वजह है कि नंदाष्टमी का पर्व सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि कुमाऊं की संस्कृति और भावनाओं से जुड़ा बड़ा पर्व माना जाता है.

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दर्शन के लिए उमड़ा आस्था का सैलाब

प्राण प्रतिष्ठा के बाद मंदिर में दर्शन और पूजा-अर्चना का सिलसिला शुरू हो गया. दूर-दराज से पहुंचे श्रद्धालु मां नंदा-सुनंदा के दर्शन कर परिवार की सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना कर रहे हैं. मंदिर परिसर में लगातार मां के जयकारे सुनाई दे रहे हैं. पूरा वातावरण भक्तिमय नजर आ रहा है. श्रद्धालुओं के लिए यह सिर्फ मां की प्रतिमाओं के दर्शन का अवसर नहीं, बल्कि अपनी सदियों पुरानी परंपरा से जुड़ने का भी मौका है.

23 सितंबर को निकलेगा मां का भव्य डोला

नैनीताल में मां नंदा-सुनंदा के आगमन का उत्सव आने वाले दिनों में भी जारी रहेगा. 23 सितंबर को मां का भव्य डोला नगर भ्रमण पर निकलेगा. इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के शामिल होने की उम्मीद है. डोले के नगर भ्रमण के दौरान नैनीताल का माहौल पूरी तरह धार्मिक और उत्सवी हो जाएगा. श्रद्धालु मां के दर्शन करेंगे और उनके जयकारों से शहर गूंजता नजर आएगा. उत्सव का सबसे भावुक हिस्सा इसके बाद आएगा. नगर भ्रमण के बाद मां नंदा-सुनंदा की प्रतिमाओं का नैनी झील में विसर्जन किया जाएगा. कुमाऊं की लोक परंपरा में इसे महज प्रतिमा विसर्जन के तौर पर नहीं देखा जाता. इसे मायके आई बेटी की विदाई से जोड़कर देखा जाता है. मान्यता और भावनाओं के अनुसार मां कुछ दिनों के लिए अपने मायके आती हैं, भक्तों को दर्शन देती हैं और फिर डोले में सवार होकर वापस विदा हो जाती हैं. यानी नंदाष्टमी का यह उत्सव केवल पूजा और दर्शन तक सीमित नहीं है. इसमें बेटी के मायके आने की खुशी भी है और विदाई का भाव भी.

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सदियों पुरानी परंपरा का जीवंत रूप

नैनीताल में इन दिनों मां नंदा-सुनंदा के जयकारों के बीच कुमाऊं की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत जीवंत होती दिखाई दे रही है. मंदिर परिसर में उमड़ती भीड़, पूजा-अर्चना, डोले की तैयारी और मां की विदाई की परंपरा इस पर्व को खास बनाती है. कुछ दिनों के लिए मायके आईं मां नंदा-सुनंदा अब अपने भक्तों को दर्शन देंगी. फिर 23 सितंबर को नगर भ्रमण के बाद विदाई का समय आएगा. यहां सिर्फ एक धार्मिक उत्सव नहीं मनाया जा रहा, बल्कि कुमाऊं की उस भावनात्मक परंपरा को जिया जा रहा है, जिसमें मां बेटी बनकर मायके आती हैं और फिर भक्तों को आशीर्वाद देकर ससुराल लौट जाती हैं.

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