पंजाब में कांग्रेस का पोस्टर वॉर... मोगा में भूपेश बघेल और राजा वडिंग का विरोध

पंजाब में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस पार्टी के अंदर गुटबाजी और संगठनात्मक विवाद बढ़ रहे हैं. पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी और पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वडिंग के समर्थकों के बीच तीखी नारेबाजी और पोस्टर वार जारी हैं. पार्टी आलाकमान के फैसलों से असंतोष फैल चुका है, जिससे संगठनात्मक बैठकों में हंगामा हो रहा है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस अंदरूनी कलह से कांग्रेस की चुनावी संभावनाएं कमजोर हो सकती हैं.

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 मोगा में भूपेश बघेल, राजा वडिंग के खिलाफ पोस्टर लगे. वहीं फिरोजपुर में चन्नी के खिलाफ पोस्टर लगाए गए. (फाइल फोटो-PTI) मोगा में भूपेश बघेल, राजा वडिंग के खिलाफ पोस्टर लगे. वहीं फिरोजपुर में चन्नी के खिलाफ पोस्टर लगाए गए. (फाइल फोटो-PTI)

कमलजीत संधू

  • मोगा,
  • 05 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 7:37 PM IST

पंजाब में साल 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस पार्टी के अंदर अंदरूनी कलह खुलकर सामने आ रही है. पार्टी का संगठनात्मक अभियान ‘हर बूथ कांग्रेस मजबूत’ इस समय आपसी गुटबाजी का शिकार हो गया है. पूर्व मुख्यमंत्री और जलधंर से सांसद चरणजीत सिंह चन्नी और पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वडिंग के समर्थकों के बीच जमकर घमासान चल रहा है. हालात यह हैं कि बैठकों के दौरान कुर्सियां तक फेंकी जा रही हैं और तीखी नारेबाजी हो रही है.

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दरअसल, पंजाब के अलग-अलग जिलों में इन दिनों एक-दूसरे के खिलाफ तीखे पोस्टर लगाए जा रहे हैं. फिरोजपुर में चन्नी के खिलाफ पोस्टर लगाए गए, जिन पर उन्हें आरएसएस से जोड़ते हुए 'चन्नी भगाओ, कांग्रेस बचाओ' जैसे नारे लिखे गए. 

अमृतसर और श्री मुक्तसर साहिब में भी ऐसे कई पोस्टर देखे गए. इनमें पार्टी के पंजाब प्रभारी भूपेश बघेल की तुलना अंग्रेजों के जमाने के जनरल डायर से तुलना कर दी गई. वहीं बठिंडा में चन्नी समर्थकों ने राहुल गांधी से मांग की है कि आगामी सरकार के लिए चन्नी को मुख्यमंत्री का चेहरा बनाया जाए.

आलाकमान के फैसलों से कार्यकर्ताओं में असंतोष

दरअसल, यह सारा विवाद तब शुरू हुआ जब पार्टी आलाकमान ने राजा वडिंग को राज्य अध्यक्ष पद पर बनाए रखा और चरणजीत सिंह चन्नी को चुनाव समिति का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया. इस फैसले के बाद से ही दोनों खेमों के बीच खींचतान शुरू हो गई. कई कार्यकर्ता खुलेआम राजा वडिंग को कमजोर नेता बता रहे हैं. वहीं राजा वडिंग का कहना है कि खुली नारेबाजी लोकतंत्र का हिस्सा है. वे अपने पद से पीछे नहीं हटेंगे.

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मोगा और अन्य जगहों पर हो रही संगठनात्मक बैठकों के दौरान दोनों गुटों के कार्यकर्ताओं में जमकर हंगामा हुआ. कई जगहों पर समर्थकों को धक्का देकर बाहर निकालना पड़ा. बैठकों में लगातार लग रहे नारों के कारण पार्टी के एजेंडे पर काम करना मुश्किल हो गया है. हालांकि पार्टी के बड़े नेता अभी भी कैमरे के सामने सब कुछ ठीक होने का दावा कर रहे हैं. इसके पीछे किसी बाहरी साजिश या 'स्लीपर सेल' का हाथ बता रहे हैं.

वहीं पार्टी की इस पूरी अंदरूनी कलह पर पॉलिटिकल एक्सपर्ट्स ने गंभीर चिंता जताई है. राजनीतिक विश्लेषक कुलदीप सिंह का कहना है कि कांग्रेस इस अंदरूनी कलह से अपनी जीत की संभावनाओं को बहुत बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचा रही है. अलग-अलग गुटों को लगता है कि पंजाब में कांग्रेस की जीत तय है और पार्टी का ही मुख्यमंत्री बनेगा. यही सोच उन्हें अपने-अपने नेताओं के पीछे पूरी ताकत झोंकने के लिए उकसा रही है.

उन्होंने कहा कि चन्नी के पक्ष में पोस्टर वार, नारेबाजी और भूपेश बघेल की बैठकों से चन्नी की गैर-मौजूदगी यह दिखाती है कि यह विवाद कितना गंभीर हो चुका है. राजस्थान और हरियाणा में भी इसी तरह की गुटबाजी ने पार्टी को डुबोया था.

वहीं एक अन्य वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक मनजीत सिंह ने कहा कि कांग्रेस को संगठनात्मक मामलों को पहले ही सुलझा लेना चाहिए था, न कि उन्हें लटकाए रखना चाहिए था. इससे नेताओं के मन में झूठी उम्मीदें पैदा हो गई हैं कि वे पार्टी का चेहरा बन सकते हैं.

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यह भी पढ़ें: बघेल ने नहीं मानी चन्नी गुट की बात... पंजाब कांग्रेस में तल्ख हुई रार, अब आगे क्या?

मनजीत का कहना है कि पार्टी का मुखिया सिर्फ एक ही हो सकता है. मौजूदा चयन दूसरे दावेदारों को पसंद नहीं आ रहा है. इसके परिणाम शांत असंतोष से लेकर इस्तीफे या यहां तक कि एक नए दल के गठन के रूप में भी सामने आ सकते हैं. हम इस बात से भी इनकार नहीं कर सकते कि क्या यह सिर्फ सत्ता की लड़ाई है या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश है.

पंजाब में हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि दोनों पक्षों की तरफ से पुलिस में शिकायतें भी दर्ज कराई जा चुकी हैं. राजनीतिक विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि पार्टी आलाकमान का अपने नेताओं पर नियंत्रण कमजोर हो गया है. अगर इस कलह को जल्द नहीं रोका गया, तो साल 2022 के चुनाव जैसी स्थिति फिर से पैदा हो सकती है, जब आपसी फूट के कारण कांग्रेस 77 सीटों से गिरकर सिर्फ 18 सीटों पर सिमट गई थी.

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