ममता के भरोसेमंद से कट्टर विरोधी तक... कौन हैं शुभेंदु जो बनेंगे बंगाल के 'अधिकारी'

बंगाल विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने जीत हासिल कर सरकार बनाने की दिशा में कदम बढ़ाया है. 9 मई को शपथ ग्रहण की तारीख तय हो चुकी है. शुभेंदु अधिकारी, जो नंदीग्राम से ममता बनर्जी को दो बार हरा चुके हैं, बंगाल की राजनीति में अब प्रमुख चेहरा बन चुके हैं.

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शुभेंदु अधिकारी कभी टीएमसी के कद्दावर नेता थे और ममता बनर्जी के भरोसेमंद माने जाते थे शुभेंदु अधिकारी कभी टीएमसी के कद्दावर नेता थे और ममता बनर्जी के भरोसेमंद माने जाते थे

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 08 मई 2026,
  • अपडेटेड 5:16 PM IST

बंगाल विधानसभा चुनाव में जीत के बाद बीजेपी अब सरकार बनाने की ओर है. 9 मई की तारीख शपथ ग्रहण के लिए तय हो चुकी है. शुक्रवार शाम केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने पश्चिम बंगाल के नए सीएम के नाम का ऐलान किया. उन्होंने कहा कि शुभेंदु अधिकारी पश्चिम बंगाल के सीएम होंगे.

बंगाल की राजनीति में शुभेंदु अधिकारी बड़े दिलचस्प नाम हैं. इसकी वजह है उनका पूरा राजनीतिक करियर. जो नंदीग्राम से शुरू हुआ और उसी नंदीग्राम से उन्होंने विरोध और जीत की एक अलग ही इबारत भी लिखी है. शुभेंदु अधिकारी की राजनीतिक जिंदगी सिर्फ उनकी कहानी भर नहीं है, बल्कि इस बात का उदाहरण भी है कि राजनीति का पहिया किस कदर घूमता है. जो व्यक्ति कभी ममता बनर्जी का सबसे बड़ा हितैषी और भऱोसेमंद सहयोगी था, वही उनका सबसे बड़ा राजनीतिक विरोधी बन गया और उन्हें दो बार हराया भी.

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नंदीग्राम से भवानीपुर तक की उनकी यात्रा सिर्फ राजनीतिक उतार-चढ़ाव की कहानी नहीं, बल्कि बंगाल की बदलती राजनीति का भी प्रतीक है. लगातार दो बार ममता बनर्जी को चुनावी मुकाबले में हराने के बाद अब शुभेंदु अधकारी को बंगाल की राजनीति का ‘जायंट किलर’ कहा जा रहा है. लेकिन यहां तक पहुंचने का उनका रास्ता बिल्कुल आसान नहीं था.

शुभेंदु अधकारी का जन्म पूर्व मेदिनीपुर के प्रभावशाली अधकारी परिवार में हुआ. कहा जाता है कि बचपन से ही उनका झुकाव आध्यात्मिकता की ओर था. वे नियमित रूप से रामकृष्ण मिशन जाया करते थे और घर में जमा किए गए छोटे-छोटे पैसे भी वहां दान कर देते थे. परिवार के लोग तक यह सोचने लगे थे कि शुभेंदु कभी भी सांसारिक जीवन छोड़कर संन्यास का रास्ता चुन सकते हैं.

हालांकि बाद में उन्होंने गृहस्थ जीवन से दूरी बनाए रखने का फैसला किया, लेकिन राजनीति को ही अपना जीवन बना लिया. उन्होंने शादी न करने का संकल्प लिया और पूरी तरह सार्वजनिक जीवन में उतर गए.

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छात्र राजनीति से शुरुआत

शुभेंदु अधकारी की राजनीतिक यात्रा 1980 के दशक के आखिर में शुरू हुई. उन्होंने कांथी के प्रभात कुमार कॉलेज से छात्र राजनीति में कदम रखा. शुरुआत में वे कांग्रेस की छात्र इकाई छात्र परिषद से जुड़े. उस समय कांग्रेस में सोमेन मित्रा गुट का प्रभाव था और शुभेंदु ने उसी धड़े के साथ राजनीति की बारीकियां सीखीं. इसके बाद 1995 में उन्होंने कांथी नगरपालिका चुनाव कांग्रेस के टिकट पर लड़ा और पार्षद बने. यह उनकी पहली बड़ी चुनावी सफलता थी. उस समय तक बंगाल में वाम मोर्चे का दबदबा था और कांग्रेस लगातार कमजोर हो रही थी.

ममता बनर्जी के साथ बढ़ता कद
1998 में ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस बनाई. शुरुआत में शुभेंदु अधकारी तुरंत पार्टी में शामिल नहीं हुए, लेकिन कुछ समय बाद वे टीएमसी में आ गए. उनके पिता शिशिर अधकारी भी ममता के साथ थे. 1999 के लोकसभा चुनाव में कांथी सीट से तृणमूल उम्मीदवार नितीश सेनगुप्ता की जीत में अधकारी परिवार की बड़ी भूमिका रही. इसके बाद ममता ने शुभेंदु पर भरोसा बढ़ाया और 2001 में उन्हें मुगबेड़िया विधानसभा सीट से उम्मीदवार बनाया. हालांकि वे वाम मोर्चा नेता किरणमय नंदा से हार गए.

2004 में तामलुक लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने पर भी उन्हें सीपीएम के लक्ष्मण सेठ के हाथों हार का सामना करना पड़ा. लगातार दो बड़ी हारों ने शुभेंदु को झटका जरूर दिया, लेकिन उन्होंने राजनीति नहीं छोड़ी.

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नंदीग्राम आंदोलन से बने बड़ा चेहरा

2006 का चुनाव शुभेंदु के लिए टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ. वे दक्षिण कांथी सीट से जीतकर पहली बार विधायक बने. लेकिन असली पहचान उन्हें 2007 के नंदीग्राम आंदोलन से मिली. उस समय राज्य में वाम मोर्चा सरकार उद्योग परियोजनाओं के लिए जमीन अधिग्रहण कर रही थी. नंदीग्राम में इसका बड़ा विरोध हुआ और आंदोलन ने हिंसक रूप ले लिया. शुभेंदु अधकारी इस आंदोलन का सबसे बड़ा चेहरा बनकर उभरे.

25 नवंबर 2007 को नंदीग्राम में तृणमूल कार्यकर्ताओं पर हमले के आरोप लगे और इसके बाद अधकारी परिवार ने वामपंथियों के खिलाफ आक्रामक आंदोलन शुरू किया. नंदीग्राम आंदोलन ने पूरे बंगाल में ममता बनर्जी को नई ताकत दी और शुभेंदु को राज्यव्यापी पहचान दिलाई.

2008 के पंचायत चुनाव में शुभेंदु अधकारी की रणनीति के दम पर तृणमूल कांग्रेस ने पूर्व मेदिनीपुर जिला परिषद पर कब्जा कर लिया. उसी साल ममता बनर्जी ने उन्हें युवा तृणमूल कांग्रेस का अध्यक्ष बना दिया. 2009 के लोकसभा चुनाव में शुभेंदु ने अपने पुराने प्रतिद्वंद्वी लक्ष्मण सेठ को हराकर तामलुक सीट जीत ली. इसके बाद अधकारी परिवार का प्रभाव पूर्व मेदिनीपुर में और बढ़ गया.

2011 में पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन हुआ और 34 साल पुरानी वाम सरकार गिर गई. तृणमूल कांग्रेस सत्ता में आई. इस दौर में अधकारी परिवार को पार्टी के सबसे ताकतवर राजनीतिक घरानों में गिना जाने लगा. 2014 में भी शुभेंदु ने लोकसभा चुनाव जीता. लेकिन इसी दौरान पार्टी के भीतर बदलाव शुरू हो गए.

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अभिषेक बनर्जी के उभार के बाद बढ़ी दूरी

2014 के बाद तृणमूल कांग्रेस में अभिषेक बनर्जी का कद तेजी से बढ़ने लगा. पार्टी संगठन में नई पीढ़ी को आगे लाने की रणनीति अपनाई गई. इसी दौरान शुभेंदु अधकारी को युवा तृणमूल अध्यक्ष पद से हटाकर सौमित्र खां को जिम्मेदारी दी गई. साथ ही अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व में ‘युवा’ नाम का अलग संगठन बनाया गया. यहीं से शुभेंदु और पार्टी नेतृत्व के बीच दूरी बढ़ने लगी.

 2016 में शुभेंदु नंदीग्राम से विधायक बने और ममता सरकार में मंत्री भी बनाए गए. लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में पश्चिम मेदिनीपुर में तृणमूल का प्रदर्शन खराब रहने के बाद उनसे कई जिम्मेदारियां वापस ले ली गईं. 2020 तक आते-आते उन्हें जिला पर्यवेक्षक समेत कई अहम पदों से हटा दिया गया. यह साफ संकेत था कि पार्टी में उनका प्रभाव कम किया जा रहा है.

बीजेपी में शामिल होकर बदला बंगाल का समीकरण

आखिरकार 19 दिसंबर 2020 को शुभेंदु अधकारी ने तृणमूल कांग्रेस छोड़कर बीजेपी का दामन थाम लिया. यह बंगाल राजनीति का बड़ा मोड़ था. बीजेपी को एक ऐसा नेता मिल गया, जो जमीनी संगठन, हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण और तृणमूल की अंदरूनी राजनीति—तीनों को अच्छी तरह समझता था. 2021 के विधानसभा चुनाव में नंदीग्राम सीट पर सीधे ममता बनर्जी और शुभेंदु अधकारी के बीच मुकाबला हुआ. पूरे देश की नजर इस सीट पर थी. आखिरकार शुभेंदु ने बेहद करीबी मुकाबले में ममता बनर्जी को हरा दिया.

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यह जीत सिर्फ एक सीट की जीत नहीं थी, बल्कि प्रतीकात्मक रूप से बंगाल की राजनीति में बीजेपी के उभार की सबसे बड़ी घटना मानी गई. इसके बाद शुभेंदु पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता बने.

भवानीपुर में भी ममता को दी चुनौती

इसके बाद शुभेंदु अधकारी लगातार ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस पर हमलावर रहे. हिंदुत्व, भ्रष्टाचार और कथित तुष्टिकरण की राजनीति के मुद्दे पर उन्होंने बीजेपी के लिए माहौल तैयार किया. 2026 के चुनाव में बीजेपी की बड़ी जीत के पीछे भी शुभेंदु की रणनीति को अहम माना जा रहा है. खासकर हिंदू वोटों को एकजुट करने और तृणमूल के खिलाफ मजबूत संगठन खड़ा करने में उनकी बड़ी भूमिका रही.

भवानीपुर जैसे इलाके में ममता बनर्जी को कड़ी चुनौती देकर उन्होंने यह संदेश भी दिया कि तृणमूल को हराना संभव है. बीजेपी कार्यकर्ताओं के बीच भी शुभेंदु अब सबसे बड़े जननेता के रूप में उभर चुके हैं.

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