क्या AAP अब भी पलट सकती है बाजी? सात में से 3 सांसदों पर सस्पेंस, क्या कहता है दल-बदल कानून

आम आदमी पार्टी को अपने इतिहास का बड़ा झटका लगा है. देश की संसद के ऊपरी सदन राज्यसभा में पार्टी के 10 में से 7 सांसद पार्टी छोड़कर बीजेपी में शामिल हो गए है. इनमें पार्टी के बड़े चेहरे राघव चड्ढा, हरभजन सिंह जैसे नाम शामिल है. यूं तो ये संख्या संवैधानिक बाध्यता को पूरा करती है, लेकिन इन सात में 3 सांसदों का अब तक प्रत्यक्ष रूप से कुछ नहीं बोलना कई सवाल खड़े करता है.

Advertisement
राज्यसभा सांसद संदीप पाठक, अशोक मित्तल और राघव चड्ढा BJP अध्यक्ष नितिन नवीन के साथ. (Photo: X/NitinNabin) राज्यसभा सांसद संदीप पाठक, अशोक मित्तल और राघव चड्ढा BJP अध्यक्ष नितिन नवीन के साथ. (Photo: X/NitinNabin)

अनीषा माथुर / संजय शर्मा

  • नई दिल्ली,
  • 24 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 10:45 PM IST

आम आदमी पार्टी के 7 सांसदों का पार्टी से इस्तीफा देने का दावा राघव चड्ढा ने किया. लेकिन तस्वीरों में सिर्फ तीन सांसद दिखे. राघव चड्ढा, अशोक मित्तल और संदीप पाठक. राघव चड्ढा ने कहा कि संविधान के अनुसार किसी पार्टी के कुल सांसदों में से दो-तिहाई सांसद दूसरी पार्टी में शामिल हो सकते हैं. AAP से इस्तीफा देने के बाद ये तीनों सांसद बीजेपी में शामिल हो गए हैं.

Advertisement

चड्ढा ने आगे कहा कि हमने आज (शक्रवार) इस संबंध में राज्यसभा के सभापति सी.पी. राधाकृष्णन को एक पत्र सौंपा है. जिसमें सभी ज़रूरी दस्तावेज़ भी जमा किए गए हैं. चड्ढा ने कहा कि AAP के अन्य राज्यसभा सांसद जो BJP में शामिल हो रहे हैं, वे हैं हरभजन सिंह, राजिंदर गुप्ता, विक्रम साहनी और स्वाति मालीवाल . राघव चड्ढा ने दावा किया कि सभी सांसदों ने राज्यसभा के सभापति को सौंपे गए पत्र पर पहले ही हस्ताक्षर कर दिए हैं. 

उन्होंने कहा, "उन्होंने पहले ही हस्ताक्षर कर दिए हैं, और आज सुबह हमने सभी ज़रूरी दस्तावेज़, जिनमें हस्ताक्षरित पत्र और अन्य औपचारिक कागज़ात शामिल हैं- राज्यसभा के सभापति को सौंप दिए हैं." 

पार्टी में शामिल होने के बाद BJP ने सांसदों का गर्मजोशी से स्वागत किया और पार्टी अध्यक्ष नितिन नवीन ने उन्हें मिठाइयां खिलाई. 

Advertisement

पार्टी अध्यक्ष नवीन ने X पर एक पोस्ट में कहा, "आज पार्टी मुख्यालय में राघव चड्ढा जी, संदीप पाठक जी और अशोक मित्तल जी का BJP परिवार में स्वागत किया."

AAP से इस्तीफा देने वाले बाकी 4 सांसदों के बारे में नितिन नवीन ने लिखा, "साथ ही, हरभजन सिंह जी, स्वाति मालीवाल जी, विक्रम साहनी जी और राजिंदर गुप्ता जी को PM नरेंद्र मोदी के गतिशील नेतृत्व में 'विकसित भारत 2047' के लक्ष्य की दिशा में काम करने के लिए शुभकामनाएं."

लेकिन आम आदमी पार्टी ने इस्तीफे के इस प्रकरण पर सवाल उठाया है और इसे नियमों के विपरीत करार दिया है. 

AAP के राज्यसभा व्हिप एनडी गुप्ता ने कहा कि वे राघव चड्ढा, संदीप पाठक और अशोक मित्तल के खिलाफ राज्यसभा के सभापति को पत्र सौंपेंगे. 

गुप्ता ने कहा है कि अपने पत्र में दलबदल विरोधी कानून के तहत कार्रवाई की मांग करेंगे. इन तीनों नेताओं को सार्वजनिक रूप से BJP में शामिल होते हुए देखा गया था. 

बाकी चार नेताओं ने अबतक बीजेपी में शामिल होने की घोषणा नहीं की है. हालांकि स्वाति मालीवाल ने पार्टी छोड़ने की घोषणा कर दी है.  इसलिए मुख्य व्हिप केवल उन तीन सांसदों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराएंगे जिन्हें BJP कार्यालय में देखा गया था.

Advertisement

AAP सांसद संजय सिंह ने एक्स पर लिखा, "मैं माननीय राज्यसभा सभापति को एक पत्र प्रस्तुत करूंगा, जिसमें राघव चड्ढा, अशोक मित्तल और संदीप पाठक को भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने के कारण राज्यसभा की सदस्यता से अयोग्य घोषित करने की मांग की जाएगी, क्योंकि यह संविधान की दसवीं अनुसूची के अंतर्गत स्वेच्छा से अपनी पार्टी की सदस्यता त्यागने के समान है."

AAP ने चार सांसदों के स्टैंड पर सवाल उठाया है लेकिन सांसद स्वाति मालीवाल ने पार्टी छोड़ने की घोषणा कर दी है. उन्होंने एक्स पर लिखा, "केजरीवाल जी के संरक्षण में आम आदमी पार्टी में बढ़ता बेहिसाब भ्रष्टाचार, महिलाओं के साथ उत्पीड़न और मारपीट की घटनाएं, गुंडा तत्वों को बढ़ावा और पंजाब के साथ हो रही धोखेबाजी और लूट को देखते हुए मैंने आज पार्टी छोड़ने का निर्णय लिया है."

लेकिन बाकी के तीन सांसद हरभजन सिंह, विक्रमजीत साहनी और राजिंदर गुप्ता ने कोई बयान जारी नहीं किया है. 

सवाल यह भी है कि क्या पार्टी छोड़ने वाले AAP सांसदों की राज्यसभा सदस्यता जाएगी?

भारत के संविधान की 10वीं अनुसूची के तहत परिभाषित दल-बदल विरोधी कानून कहता है कि कोई भी विधायक/सांसद जो अपनी पार्टी की सदस्यता से इस्तीफ़ा दे देता है, उसे अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा. 

Advertisement

लेकिन 10वीं अनुसूची का खंड 4 जिसका उद्देश्य "पार्टी के भीतर के मतभेदों को संरक्षण देना" था. कुछ ऐसी शर्तें निर्धारित करता है, जो किसी विधायक/सांसद को दल-बदल विरोधी कानून के तहत अयोग्य घोषित होने से बचाता है. 

दल-बदल के आधार पर तब कोई सांसद/विधेयक अयोग्य नहीं होगा

1.जब उसकी मूल राजनीतिक पार्टी किसी दूसरी राजनीतिक पार्टी के साथ विलय कर लेती है और वह यह दावा करता है कि वह और उसकी मूल राजनीतिक पार्टी के कोई अन्य सदस्य:-

(a) उस विलय से बनी किसी नई राजनीतिक पार्टी के सदस्य बन गए हैं; या
(b) उन्होंने विलय को स्वीकार नहीं किया है और एक अलग समूह के रूप में काम करने का विकल्प चुना है

(2) किसी सदन के सदस्य की मूल राजनीतिक पार्टी का विलय तब हुआ माना जाएगा, यदि और केवल यदि, संबंधित विधायी पार्टी के कम से कम दो-तिहाई सदस्यों ने ऐसे विलय पर सहमति व्यक्त की हो. 

वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल जिन्होंने इससे पहले शिवसेना में विभाजन के मामले में महाराष्ट्र के नेता एकनाथ शिंदे का प्रतिनिधित्व किया था, का कहना है कि यह  प्रावधान सांसदों को अयोग्य ठहराए जाने और अपनी सीट गंवाने से बचाएगा. 

कौल ने कहा, "अनुसूची 10 के खंड 4(2) में कहा गया है कि यदि सदन के दो-तिहाई सदस्य सहमत हों तो यह माना जाता है कि ‘पार्टी’ का विलय हो गया है. ‘मूल राजनीतिक पार्टी’ के विलय की आवश्यकता नहीं है."

Advertisement

वरिष्ठ वकील संजय हेगड़े इस विश्लेषण से सहमत नहीं हैं. हेगड़े का कहना है कि जहां पार्टी के स्वामित्व का दावा करने से विलय अलग है वहीं इस बात पर अभी भी विचार किया जाना बाकी है कि "सदन" (House) का अर्थ संसद का कोई एक सदन है, या इसका अर्थ संसद में सदस्यों की कुल संख्या है. 

संजय हेगड़े कहते हैं, "एक सदन में विधायी दल के 2/3 सदस्यों ने दावा किया है कि वे विलय कर रहे हैं. यह तर्क दिया जा सकता है कि दलबदल विरोधी कानून से बचने के लिए आपको संसद में कुल सदस्यों की संख्या का 2/3 हिस्सा चाहिए. मेरी राय में, दलबदल विरोधी कानून के प्रावधान लागू होंगे, क्योंकि विधायकों के मामले इतर जहां एकसदनीय विधायिका होती है और विधायक अलग होने या आपस में मिलने का दावा कर सकते हैं. संसद में दो सदन होते हैं."

हालांकि कौल का कहना है कि चूंकि संवैधानिक भाषा में स्पष्ट रूप से “सदन” (House) शब्द का प्रयोग किया गया है न कि “विधायिका” (legislature) का. कौल कहते हैं, “राज्यसभा और लोकसभा अलग-अलग सदन हैं और उनमें अलग-अलग विधायी दल होते हैं.”

वरिष्ठ अधिवक्ता निज़ाम पाशा ने भी यह सवाल उठाया है कि क्या इस विलय के लिए “मूल पार्टी” की सहमति जरूरी है. पाशा कहते हैं, “कानून के बारे में मेरी समझ यह है कि उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा, क्योंकि इस मामले में मूल पार्टी का कोई विलय नहीं हुआ है. केवल राज्यसभा के 2/3 सांसदों ने ही आपस में विलय किया है. उन्होंने खुद को ‘मूल राजनीतिक पार्टी’ होने का दावा नहीं किया है.”

Advertisement

क्या इसका मतलब यह है कि पार्टी में फूट पड़ गई है और अब विधायकों को किसी एक पक्ष को चुनना होगा?

जानकारों का कहना है कि कानूनी तौर पर यह एक अलग मसला है. एन.के. कौल के अनुसार किसी दूसरी पार्टी में विलय करना और अपनी मूल पार्टी से इस्तीफ़ा देना कानूनी तौर पर पार्टी के "स्वामित्व" का दावा करने से अलग बात है. 

सीनियर एडवोकेट देवदत्त कामत ने कहा कि लेजिस्लेचर पार्टी (विधायी दल) अनुसूची 10 के तहत आवश्यक परिभाषा के दायरे में 'मूल राजनीतिक दल' नहीं है. मेरी राय में राजनीतिक दल का विलय हुए बिना, विधायी दल के दो-तिहाई सदस्यों का विलय होना, 10वीं अनुसूची के तहत एक वैध विलय नहीं कहा जा सकता. यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है और इस पर अभी तक कोई अंतिम फैसला नहीं आया है. 

राज्यसभा के सभापति का फैसला अहम

आम आदमी पार्टी को तोड़कर अपने गुट का बीजेपी में विलय करने वाले राज्य सभा के सात सांसदों का भविष्य फिलहाल तो सभापति के विवेकाधिकार पर निर्भर ह. सभापति इनके विलय को अपने विशिष्ट अधिकार के तहत मान्यता दे सकते हैं. हालांकि इनको मान्यता मिलने के बाद सभापति के निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है.

Advertisement

सुप्रीम कोर्ट में वकील और विधि व संविधान के जानकार ज्ञानंत सिंह के मुताबिक भी इन सातों बागी सांसदों की सदस्यता पर फिलहाल कोई संकट नहीं दिख रहा. क्योंकि संविधान के दसवें शेड्यूल में किए गए संशोधन और दल बदल कानून में स्पष्ट लिखा है कि मर्जर इज एक्सेप्शन यानी संसदीय दल के सदस्यों के दूसरी पार्टी के संसदीय दल में विलय करने पर ही इस कानून के दायरे से बाहर रहते हुए सुरक्षा कवच में रह सकते हैं. यानी वो मूल पार्टी से टूट कर अलग अस्तित्व नहीं बनाए रख सकते हैं लेकिन दो तिहाई सदस्य चाहें तो किसी दूसरी पार्टी में विलय जरूर कर सकते हैं.

नंबर गेम अहम

मतलब ये कि इन सांसदों के आगे यही वो रास्ता है जिस पर चलते हुए वो अपनी सांसदी और मूल पार्टी के साथ रह गए सांसदों की कुर्सी भी बचा सकते हैं. हां, इस पूरी प्रक्रिया में आम आदमी पार्टी एक ही सूरत में बाधा डाल सकती है. अगर इन सात में से दो एक को भी पार्टी वापस लाने में कामयाब हो जाए तो बागियों का सपना टूट सकता है. अगर इनका नंबर गेम अपसेट हुआ तो फिर सभापति भी इनको कानूनी संरक्षण नहीं दे सकेंगे. 

राजनीतिक तौर पर राघव चड्ढा और अन्य लोगों का इस्तीफा संकट में फंसी AAP के लिए एक बड़ा झटका है. विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि अगर AAP अपने बागी सांसदों के खिलाफ अयोग्यता याचिकाएं दायर करने का फैसला करती है, तो अंतिम फैसला राज्यसभा के सभापति लेंगे. 

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement