कांग्रेस में सुधार की जरूरत! थरूर के वोट गांधी परिवार को दे रहे अहम संदेश

कांग्रेस में प्रेसिंडेट पद के लिए चुनाव तो पूरा हो गया. लेकिन इस चुनाव ने पार्टी और गांधी परिवार की मुश्किलों को और बढ़ा दिया है. थरूर इस चुनाव में भले हार गए हों लेकिन उनके 1072 वोट भी गांधी परिवार के लिए स्ट्रॉन्ग मैसेज हैं. अब अगर थरूर को कोई अच्छा पद नहीं दिया गया तो पार्टी के लिए मुसीबतें बढ़ सकती हैं.

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पार्टी प्रेसिडेंट का चुनाव हारे शशि थरूर पार्टी प्रेसिडेंट का चुनाव हारे शशि थरूर

रशीद किदवई

  • नई दिल्ली,
  • 19 अक्टूबर 2022,
  • अपडेटेड 6:38 PM IST

कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव खत्म हो गया है और मल्लिकार्जुन खड़गे को नया प्रेसिडेंट चुना गया है. इस चुनाव में शशि थरूर की हार हुई है. इस चुनाव में 9385 वोट पड़े जिनमें से खड़गे को 7897 वोट मिले तो थरूर को 1072 वोटों से ही संतोष करना पड़ा. जबकि 416 वोट अमान्य थे. थरूर की इस हार ने देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस के सामेन एक स्ट्रॉन्ग मैजेस दिया है. इस चुनाव में हार का जो अंतर है वो कांग्रेस में बदलाव की इच्छा को साफ दर्शाता है. ऐसे में सवाल यह है कि क्या मल्लिकार्जुन खड़गे भी शशि थरूर को उसी तरह से सराहेंगे जिस तरह से हिलेरी क्लिंटन को बराक ओबामा ने डेमोक्रेट प्राइमरी में लंबी लड़ाई के बाद भी एक ऊंचा पद दिया था?

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थरूर की हार ने दे दिया पार्टी को मैसेज

थरूर के लिए 1072 वोटों की संख्या प्रभावशाली है और गांधी परिवार के लिए एक मैसेज है. मैसेज है कि पार्टी में सुधार करें. अगर 9000 में से 1072 लोग अपनी पसंद के व्यक्ति को वोट दे सकते हैं तो ऐसी संभावना है कि इसी सोच वाले कांग्रेस प्रतिनिधियों का नंबर और भी रहा होगा, लेकिन वो वोट देते समय नंबर दो पर टिक करने की हिम्मत नहीं जुटा पाए. ऐसे में ये संभावना है कि 2024 के बाद होने वाले चुनाव में यह आंकड़ा उलट भी सकता है. मतलब 8000 वोट गांधी परिवार के खिलाफ वाले उम्मीदवार को जा सकता है और गांधी समर्थित उम्मीदवार को 1072 वोट ही मिल सकते हैं.

रोमांचक रहा है कांग्रेस में चुनावों का इतिहास

कांग्रेस के इतिहास और विरासत में ऐसे लोगों को समायोजित करने और उन्हें दरकिनार करने की मिसालें हैं, जिन्होंने स्थापित पार्टी नेतृत्व की ताकत को चुनौती देने की कोशिश की थी. सुभाष चंद्र बोस ने 1939 का चुनाव जीता लेकिन महात्मा गांधी खुद व्यक्तिगत तौर पर उनके उम्मीदवारी के खिलाफ थे. 1950 में, जवाहरलाल नेहरू के न चाहने के बाद भी पीडी टंडन जीते तो नेहरू ने भी कई पत्र लिखे, जिससे टंडन को अचानक पद छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा. 1977 में, डी के बरुआ के इस्तीफे के बाद पार्टी प्रमुख बने ब्रह्मानंद रेड्डी ने इंदिरा गांधी को कांग्रेस से निष्कासित कर दिया था. यह एक अलग कहानी है कि इंदिरा ने एक अलग समूह बनाकर बड़े पैमाने पर वापसी की और अंततः 'असली कांग्रेस' तैयार हो गई.

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1997 में, शरद पवार और राजेश पायलट दोनों ने मौजूदा सीताराम केसरी का मुकाबला किया था. हालांकि, एआईसीसी प्रमुख केसरी ने उन लोगों के प्रति उदारता दिखाई, जिन्हें उन्होंने हराया था. उन्होंने सुनिश्चित किया कि राजेश पायलट को कांग्रेस कार्य समिति का सदस्य बनाया जाय और 1998 की शुरुआत में लोकसभा में विपक्ष के नेता के रूप में शरद पवार के नाम की सिफारिश की गई, इससे पहले केसरी खुद सोनिया गांधी से हार गए थे.

सोनिया ने खुद जितेंद्र प्रसाद के खिलाफ लड़ाई लड़ी जो एआईसीसी के उपाध्यक्ष के रूप में कार्यरत थे. यह एकतरफा मुकाबला था. इससे पहले कि जितेंद्र प्रसाद सदमे से उबर पाते या सोनिया गांधी उनके लिए एक राजनीतिक भूमिका को औपचारिक रूप दे पातीं, उनकी मौत हो गई.

चुनाव में हार से तैयार हुई थरूर की जमीन
 
ऐसे में शशि थरूर, अपने कौशल, संयुक्त राष्ट्र में अनुभव और चुनावी मैदान में सफलता के एक अच्छे ट्रैक रिकॉर्ड के साथ, पार्टी में सभी ताकतों, दबाव समूहों को घेरने की क्षमता रखते हैं. वो बदलाव की सोच रखते हैं. थरूर द्वारा खींचे गए वोटों की वास्तविक संख्या कांग्रेस के भीतर 'प्रो चेंज' तत्वों की एक झलक मात्र है. कुछ अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि वास्तविक भावनाओं को प्राप्त करने के लिए इसे दो या तीन से गुणा करने की आवश्यकता है. इस सोच के साथ सच्चाई और विश्वसनीयता का घेरा जुड़ा हुआ है.

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इससे खड़गे-थरूर समीकरणों में गांधी परिवार की भूमिका पर सवाल खड़ा होता है. 10, जनपथ के पास अपने विवेक से थरूर को लोकसभा में एक कमजोर अधीर रंजन चौधरी की जगह पर पार्टी के नेता के रूप में शामिल करने का विकल्प है. अधीर रंजन चौधरी दो पदों पर रहे हैं, यानी बंगाल कांग्रेस पार्टी के प्रमुख और लोकसभा में कांग्रेस के नेता. यह 'एक आदमी, एक पद' मानदंड का स्पष्ट उल्लंघन है जो कांग्रेस में माना जाता है. वैकल्पिक रूप से, थरूर के पास नई कांग्रेस कार्यसमिति का हिस्सा बनने और 24, अकबर रोड पर एक पदाधिकारी होने के लिए पूरी साख है.

यदि थरूर को सभी पार्टी और संसदीय पदों से बाहर रखा जाता है, तो उनमें एक प्रमुख असंतुष्ट नेता बनने और G-23 से कहीं अधिक करने की क्षमता है. पार्टी प्रेसिडेंट पद के चुनाव ने उन्हें अपनी प्रतिष्ठा के अलावा कांग्रेस परिवार के भीतर एक बड़ा नाम बना दिया है. स्वतंत्र दिमाग वाले थरूर 2024 की लोकसभा के बाद खड़गे और गांधी दोनों के लिए एक बड़ा खतरा पैदा करेंगे.
 

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