केरल के मुख्यमंत्री वी. डी. सतीशन ने इंडिया टुडे राउंडटेबल 'केरलम' में अडाणी समूह से जुड़े सवालों से लेकर विधानसभा चुनाव में यूडीएफ के 100 सीटों के दावे, सरकार के शुरुआती कामकाज और राज्य की आर्थिक चुनौतियों पर खुलकर बात की.
जब सतीशन से पूछा गया कि दिल्ली में कांग्रेस नेतृत्व अडाणी समूह का विरोध करता है, जबकि केरल में उनकी सरकार अडाणी के साथ करीबी संबंध रखती है और उनके निवेश को बढ़ावा देने के लिए तैयार है, तो उन्होंने कहा कि तिरुवनंतपुरम एयरपोर्ट अडाणी को देने का फैसला उनकी सरकार ने नहीं किया है. उन्होंने कहा, "मैंने अडाणी को एयरपोर्ट नहीं दिया है. यह केंद्र सरकार की नीति का हिस्सा है. उन्होंने तिरुवनंतपुरम एयरपोर्ट लिया है."
विझिंजम बंदरगाह को लेकर सतीशन ने कहा कि यह समझना जरूरी है कि बंदरगाह का मालिक कौन है. उनके मुताबिक, ओमन चांडी के समय अडाणी समूह के साथ विझिंजम बंदरगाह को लेकर रियायत समझौता हुआ था. यह करीब 12-13 साल पहले की बात है. उन्होंने कहा कि अडाणी समूह बंदरगाह का मालिक नहीं है, बल्कि वह केवल रियायतधारी है, बंदरगाह की मालिक राज्य सरकार है.
जब राज्य सरकार बंदरगाह की मालिक है, तो उसका काम उसकी गतिविधियों को बढ़ावा देना है. उन्होंने कहा, "हम बंदरगाह के मालिक हैं, इसलिए उसकी गतिविधियों को क्यों रोकेंगे? हमें बंदरगाह से जुड़ी सभी गतिविधियों को बढ़ावा देना है, लेकिन राज्य के हितों को ध्यान में रखते हुए."
2021 की हार से सीखा, उपचुनावों पर किया फोकस
सतीशन ने विधानसभा चुनाव में यूडीएफ के प्रदर्शन को लेकर कहा कि गठबंधन ने 2021 के विधानसभा चुनाव के बाद अपनी रणनीति में कई बदलाव किए. लगातार दो चुनाव हारने के कारण यूडीएफ के नेता और कार्यकर्ता निराश थे. इसके बाद गठबंधन ने जमीनी स्तर पर काम शुरू किया और विधानसभा तथा स्थानीय निकायों के उपचुनावों पर खास ध्यान दिया.
उन्होंने कहा कि पार्टी ने हर निर्वाचन क्षेत्र में काम किया, सामाजिक समीकरणों को समझा और अलग-अलग मुद्दों को लेकर अपना राजनीतिक नैरेटिव तैयार किया. उनके मुताबिक, इस दौरान संगठन ने काफी कुछ सीखा और यही अनुभव आगे के चुनावों में काम आया.
लोकसभा चुनाव में 20 में से 18 सीटों का दावा
सतीशन ने कहा कि इसके बाद हुए लोकसभा चुनाव में यूडीएफ ने केरल की 20 में से 18 सीटों पर जीत दर्ज की. इसके अलावा उपचुनावों और स्थानीय निकाय चुनावों में भी गठबंधन के प्रदर्शन से कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ा.
उनके मुताबिक, इन चुनावी नतीजों और जमीनी फीडबैक के आधार पर उन्हें विश्वास था कि विधानसभा चुनाव में यूडीएफ 100 या उससे ज्यादा सीटें हासिल कर सकता है. हालांकि, उन्होंने कहा कि देशभर में हुए अधिकांश चुनावी सर्वेक्षणों में यूडीएफ की हार का अनुमान लगाया गया था.
110 सीटें था सतीशन का असली लक्ष्य
सतीशन ने बताया कि उनके मन में सिर्फ 100 सीटों का लक्ष्य नहीं था, बल्कि उनका वास्तविक लक्ष्य 110 सीटें हासिल करना था. उन्होंने कहा कि उम्मीदवारों के चयन और कुछ अन्य समस्याओं के कारण गठबंधन 110 के आंकड़े तक नहीं पहुंच सका.
मुख्यमंत्री के चयन में लगे समय और कांग्रेस के भीतर कथित खींचतान को लेकर सवाल पर सतीशन ने कहा कि कई राज्यों में मुख्यमंत्री चुनने में 10 से 15 दिन तक का समय लग जाता है. उन्होंने कहा कि मीडिया में अलग-अलग नेताओं के समर्थन में विधायकों की संख्या को लेकर कई तरह की खबरें चल रही थीं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मुख्यमंत्री पद को लेकर कोई लड़ाई थी.
सतीशन ने माना कि कांग्रेस में मुख्यमंत्री पद के कई संभावित दावेदार थे और वे सभी उनके वरिष्ठ नेता हैं. उन्होंने कहा कि वह यह दावा नहीं करते कि मुख्यमंत्री बनने के योग्य सिर्फ वही थे. उनके मुताबिक, पार्टी ने उन्हें मुख्यमंत्री के रूप में चुना.
वरिष्ठ नेताओं से आगे निकलने पर क्या बोले
अपनी उम्र और वरिष्ठ नेताओं से आगे निकलने के सवाल पर सतीशन ने केरल कांग्रेस के पुराने उदाहरण का जिक्र किया. उन्होंने कहा कि ए. के. एंटनी 36 साल की उम्र में केरल के मुख्यमंत्री बने थे और 32 साल की उम्र में प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष बन चुके थे.
सतीशन ने कहा कि केवल वरिष्ठता के आधार पर मुख्यमंत्री का चयन नहीं होता. उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्हें पार्टी ने मुख्यमंत्री के रूप में चुना है.
'नए केरल' के लिए बुनियादी ढांचे पर जोर
बातचीत के दौरान सतीशन ने अपनी सरकार के विकास एजेंडे पर भी विस्तार से बात की. उन्होंने कहा कि चुनाव के दौरान उन्होंने 'भविष्य के केरल' और 'नए युग के केरल' को लेकर अपना विजन सामने रखा था. उन्होंने कहा कि विपक्ष में रहते हुए यूडीएफ ने सरकार की नाकामियों की आलोचना करने के साथ-साथ वैकल्पिक नीतियों पर भी काम किया. इसके लिए शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में सम्मेलन आयोजित किए गए और विशेषज्ञों के साथ चर्चा की गई.
सतीशन के मुताबिक, केरल की अपनी कुछ भौगोलिक और कानूनी सीमाएं हैं. पश्चिमी घाट, वन कानून, धान की जमीन से जुड़े कानून और तटीय नियमन जैसे प्रावधानों के कारण राज्य में जमीन के इस्तेमाल को लेकर कई तरह की पाबंदियां हैं. इसके अलावा राज्य में जनसंख्या घनत्व भी काफी अधिक है, जिससे बड़े औद्योगिक प्रोजेक्ट शुरू करना चुनौतीपूर्ण होता है.
सतीशन ने कहा कि इन चुनौतियों के बावजूद केरल की अपनी कई बड़ी ताकतें हैं. उन्होंने राज्य की लंबी तटरेखा और बंदरगाहों को आर्थिक विकास का महत्वपूर्ण आधार बताया.
उन्होंने कहा कि राज्य के अलग-अलग बंदरगाहों और कंटेनर टर्मिनल को एकीकृत कर पूरे केरल को एक बड़े पोर्ट नेटवर्क के रूप में विकसित करना उनका सपना है. मुख्यमंत्री ने केरल की आर्थिक स्थिति को भी बड़ी चुनौती बताया. उन्होंने कहा कि सरकार ने राज्य की वित्तीय स्थिति का अध्ययन करने के लिए विशेषज्ञ समिति बनाई और विधानसभा में वित्तीय स्थिति पर श्वेत पत्र पेश किया.
टैक्स बढ़ाए बिना राजस्व बढ़ाने की चुनौती
सतीशन के मुताबिक, राज्य के राजस्व का बड़ा हिस्सा पहले से तय खर्चों में चला जाता है. इसमें कर्मचारियों के वेतन, पेंशन और कर्ज से जुड़े भुगतान शामिल हैं. ऐसे में भविष्य की बड़ी विकास परियोजनाओं के लिए वित्तीय संसाधन जुटाना चुनौतीपूर्ण है.
उन्होंने कहा कि उनकी सरकार टैक्स बढ़ाने के बजाय राजस्व बढ़ाने के दूसरे रास्ते तलाशना चाहती है. उनके मुताबिक, बिना टैक्स बढ़ाए सरकारी खजाने में अधिक राजस्व लाना सरकार के सामने बड़ी चुनौती है.
सतीशन ने कहा कि राज्य की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए सरकार का फोकस निवेश और आर्थिक गतिविधियां बढ़ाने पर है. उन्होंने कहा कि केवल टैक्स बढ़ाकर राजस्व बढ़ाना समाधान नहीं है, बल्कि बाजार में पैसा पहुंचाने और आर्थिक गतिविधियों को गति देने से भी सरकारी राजस्व बढ़ाया जा सकता है.
बिजली संकट और युवाओं के रोजगार पर फोकस
सतीशन ने बिजली संकट और युवाओं के रोजगार को भी बड़ी चुनौती बताया. बिजली संकट के लिए उन्होंने बढ़ती मांग और पिछली सरकार के 465 मेगावाट वाले दीर्घकालिक बिजली खरीद समझौते के रद्द होने का मुद्दा उठाया.
उनके मुताबिक, तत्काल जरूरत के लिए अतिरिक्त बिजली की व्यवस्था की गई है, जबकि लंबे समय के लिए ऊर्जा क्षमता बढ़ाने पर काम किया जाएगा. युवाओं के पलायन को रोकने के लिए उन्होंने 'Global Job Watchtower' का जिक्र किया. इसके जरिए अलग-अलग क्षेत्रों में भविष्य में पैदा होने वाली नौकरियों की जरूरतों पर नजर रखी जाएगी और उसी के अनुसार शिक्षा और पाठ्यक्रम में बदलाव किया जाएगा.
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