ब्रिक्स देश शनिवार को नई दिल्ली में 18वें शिखर सम्मेलन के लिए जुटने की तैयारी कर रहे हैं. इसी बीच, पूर्व राजनयिक अजय बिसारिया ने कहा कि इस बार अमेरिका के ब्रिक्स शिखर सम्मेलन को पश्चिम-विरोधी मंच के रूप में देखने का खतरा है. हालांकि, उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत ब्रिक्स को खुले तौर पर पश्चिम-विरोधी मंच में बदलने की किसी भी कोशिश का स्पष्ट रूप से विरोध करता है.
इंडिया टुडे ब्रिक्स राउंडटेबल में बोलते हुए कनाडा में भारत के पूर्व उच्चायुक्त अजय बिसारिया ने कहा कि नई दिल्ली ने ब्रिक्स की छवि को पश्चिम-विरोधी समूह के बजाय गैर-पश्चिमी देशों के समूह के रूप में पेश करने की कोशिश की है.
जब उनसे अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ब्रिक्स के विरोध और समूह को अमेरिका-विरोधी बताए जाने के बारे में पूछा गया, तो बिसारिया ने कहा, "अमेरिका के इसे गलत तरीके से समझने का थोड़ा खतरा है, क्योंकि व्हाइट हाउस और ट्रंप दोनों ही काफी अस्थिर हैं. उन्होंने इस संदर्भ में चीन और रूस की ब्रिक्स में भूमिका का भी जिक्र किया.
उन्होंने कहा भारत इस मुद्दे पर रक्षात्मक रुख नहीं अपनाएगा. भारत रणनीतिक स्वायत्तता और ब्रिक्स की रक्षा के मुद्दे पर मजबूती से आगे रहेगा. हालांकि, इसके गलत अर्थ निकाले जाने का थोड़ा खतरा हमेशा बना रहेगा. हालांकि, बिसारिया ने कहा कि इस ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से किसी मजबूत पश्चिम-विरोधी संदेश के निकलने का बड़ा खतरा नहीं है. उन्होंने कहा कि अतीत में ब्रिक्स को पश्चिम-विरोधी रुख की ओर ले जाने की कोशिशें हुई थीं, लेकिन यह भारत के हित में नहीं था. उन्होंने कहा, "अतीत में ब्रिक्स के भीतर कुछ ऐसे रुझान थे, जो इसे पश्चिम-विरोधी रुख की ओर ले जाने की कोशिश कर रहे थे. यह भारत के अनुकूल नहीं है और भारत इसे उस दिशा में नहीं ले जाता."
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उन्होंने कहा कि भारत ने इसके बजाय ब्रिक्स की ब्रांडिंग बदलने और इसे पश्चिमी देशों के खिलाफ खड़े समूह के बजाय गैर-पश्चिमी देशों के ऐसे समूह के रूप में पेश करने की कोशिश की है, जिसका ध्यान आर्थिक और विकास से जुड़े मुद्दों पर है. उन्होंने कहा, भारत ने सफलतापूर्वक इसकी ब्रांडिंग को पश्चिम-विरोधी समूह के बजाय गैर-पश्चिमी समूह के रूप में बदलने का काम किया है.
बिसारिया ने यह भी कहा कि शिखर सम्मेलन में भारत के लिए चुनौतियां उस समय के मुकाबले अधिक जटिल होंगी, जब उसने जी20 की मेजबानी की थी. इसकी वजह दो सक्रिय संघर्षों की मौजूदगी और ब्रिक्स की बढ़ी हुई सदस्य संख्या है. इसके बावजूद उन्होंने उम्मीद जताई कि भारत शिखर सम्मेलन के दस्तावेज पर आम सहमति बनाने में सफल रहेगा. हालांकि, उन्होंने आगाह किया कि ईरान या यूक्रेन से जुड़े किसी एक विवादित पैराग्राफ को पूरे शिखर सम्मेलन की सफलता का पैमाना नहीं बनाया जाना चाहिए.
इंडिया टुडे ब्रिक्स राउंडटेबल में बिसारिया के साथ शामिल हुए भू-राजनीतिक विश्लेषक अशोक मलिक ने कहा कि मूल ब्रिक्स में लंबे समय से दो अलग-अलग सोच के बीच खींचतान रही है. एक सोच ब्रिक्स को मुख्य रूप से आर्थिक और विकास से जुड़ा मंच मानती है, जबकि दूसरी इसे अधिक मजबूत भू-राजनीतिक पहचान देने के पक्ष में रही है.
मलिक के मुताबिक, भारत ने लगातार पहली सोच का समर्थन किया है, जबकि रूस और चीन ने कई बार ब्रिक्स को अधिक स्पष्ट भू-राजनीतिक दिशा में ले जाने की कोशिश की है. उन्होंने कहा, चीन और रूस ने समूह को दूसरी दिशा में ले जाने की कोशिश की है, लेकिन उन्हें ज्यादा सफलता नहीं मिली. यह एक कूटनीतिक खींचतान रही है. मेरा मानना है कि विस्तारित ब्रिक्स में किसी एक साझा राजनीतिक या भू-राजनीतिक रुख, चाहे वह पश्चिम-विरोधी हो या किसी के पक्ष में अथवा किसी के खिलाफ, बनाना और भी मुश्किल होगा. आखिर केवल पश्चिम और पश्चिम-विरोधी समीकरण पर ही ध्यान क्यों दिया जाए?
अमेरिका के रणनीतिक सलाहकार मंच द एशिया ग्रुप के पार्टनर मलिक ने कहा कि ब्रिक्स के विस्तार से किसी एक भू-राजनीतिक रुख पर सहमति बनाना और मुश्किल हो जाएगा, क्योंकि सदस्य देशों के हितों में काफी अंतर है. उन्होंने कहा कि सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और ईरान जैसे देशों के शामिल होने से भू-राजनीतिक मुद्दों पर आम सहमति बनाना विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण हो गया है.
उनके मुताबिक, इसका भारत के लिए मतलब यह है कि ब्रिक्स को उन क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करना होगा, जहां सदस्य देशों के बीच साझा सहमति बन सकती है. इनमें आर्थिक सहयोग, आपूर्ति श्रृंखला, विकास, जलवायु परिवर्तन और संकटों से निपटने की क्षमता जैसे मुद्दे शामिल हैं. इसके बजाय ब्रिक्स को पश्चिम के खिलाफ किसी साझा रुख को स्थापित करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए.
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