मोटर एक्सीडेंट के मुआवजे से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है. कोर्ट ने देशभर की अदालतों के लिए गाइडलाइंस तय की हैं कि मृतक पीड़ितों या घायल दावेदारों की सालाना इनकम कैसे तय की जानी चाहिए. कोर्ट ने कहा कि मुआवजे का आकलन करते समय इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) एक जरूरी रेफरेंस पॉइंट होगा.
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की बेंच ने कहा कि मोटर व्हीकल एक्ट के तहत सालाना इनकम कैलकुलेट करने का कोई एक फिक्स फॉर्मूला नहीं हो सकता. हालांकि कोर्ट ने नौकरीपेशा लोगों और सेल्फ-एम्प्लॉयड लोगों के लिए अलग-अलग तरीका बताया. सैलरी पाने वाले लोगों के लिए सिर्फ पिछले साल का ITR पर्याप्त होगा.
कोर्ट ने कहा कि पिछले साल के ITR को आधार मानने की वजह यह है कि प्रमोशन या सैलरी रिविजन का आर्थिक असर उसी साल के रिटर्न में दिखाई दे सकता है. बेंच ने कहा, "सैलरी पाने वाले लोगों के लिए, उससे सालाना इनकम दिखाने के लिए सिर्फ पिछले साल का ITR ही काफी होगा." कोर्ट प्रमोशन लेटर पर भी विचार कर सकता है.
कोर्ट ने ऐसे इसलिए कहा क्योंकि कुछ केस में एक्सीडेंट से पहले प्रमोशन या सैलरी रिविजन हो सकता है, जो कि लेटेस्ट ITR में नहीं दिखता. सेल्फ-एम्प्लॉयड लोगों और बिजनेसवालों के लिए अलग तरीका तय किया गया है. बिजनेस में उतार-चढ़ाव होता है. इसलिए तीन साल तक के ITR में बताई गई औसत इनकम रेफरेंस पॉइंट माना जाना चाहिए.
शीर्ष अदालत ने कहा कि कई बार ऐसा भी हो सकता है कि व्यक्ति ने सिर्फ एक या दो ITR ही फाइल किए हों. ऐसे मामलों में इनकम के उतार-चढ़ाव और आसपास के हालात को ध्यान में रखना होगा. सेल्फ-एम्प्लॉयड पीड़ितों की इनकम तय करते समय कई पहलुओं पर ध्यान देना होगा. इनमें कई बातों को जरूरी रूप से शामिल करना होगा.
जैसे बिजनेस का नेचर, ग्रोथ पैटर्न, मौत या चोट का बिजनेस पर असर और भविष्य की संभावित ग्रोथ शामिल होगी. कोर्ट ने नेगेटिव इनकम और बिजनेस से जुड़े दूसरे जरूरी फैक्टर को भी ध्यान में रखने की बात कही. ये भी कहा कि ITR फाइल करने की तारीख भी अहम है. ऐसा हो सकता है कि मौत के बाद इनकम को बढ़ाकर दिखाया गया हो.
ऐसे मामलों में बिजनेस से जुड़े दूसरे फैक्टर ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाएंगे. हालांकि, यदि फाइनेंशियल स्टेटमेंट से पर्याप्त समर्थन मिलता है तो ऐसे ITR पर भी विचार किया जा सकता है. कोर्ट ने कहा कि देशभर की अलग-अलग अदालतें इनकम तय करने के लिए अलग-अलग तरीके अपना रही थीं. कुछ अदालतें सिर्फ लेटेस्ट ITR पर भरोसा करती थीं.
कुछ अदालतें पिछले सालों की इनकम का औसत निकालती थीं. इस वजह से मुआवजे की रकम में अंतर आ रहा था. इसी को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक सामान्य तरीका तय किया है. यह फैसला एक कंस्ट्रक्शन बिजनेसमैन रश्मिरेखा त्रिपाठी के परिवार की ओर से श्रीराम जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड के खिलाफ दायर अपील पर आया.
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने क्लेम करने वालों को मिलने वाला मुआवजा भी बढ़ा दिया. इस मामले में सामने आया कि मृतक ने पिछले दो असेसमेंट ईयर में करीब 11.6 लाख और 15.06 लाख रुपए की सालाना इनकम दिखाई थी. उड़ीसा हाई कोर्ट ने दोनों रिटर्न का औसत निकालकर सालाना इनकम 13.33 लाख रुपए तय की थी.
सुप्रीम कोर्ट ने लेकिन कंस्ट्रक्शन बिजनेस की प्रकृति को देखते हुए सालाना इनकम 14 लाख रुपए तय की है. इसके बाद मृतक के परिवार को मिलने वाला मुआवजा बढ़ा दिया. हाई कोर्ट द्वारा तय 1.87 करोड़ की रकम को बढ़ाकर 1.97 करोड़ कर दिया गया. कोर्ट ने 6 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से ब्याज जारी रखने का आदेश दिया.
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