सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्जल भुइयां के मतदाता सूची के SIR को लेकर आए बयान के बाद देश के पूर्व जज भी दो खेमों में बंटते दिख रहे हैं. पूर्व चीफ जज जस्टिस बी आर गवई ने इस तरह के बयान की आलोचना की तो पूर्व जज अभय एस ओक ने समर्थन किया है.
जस्टिस ने हैदराबाद की नाल्सार यूनिवर्सिटी में एक कार्यक्रम के दौरान कहा था कि लाखों भारतीय नागरिकों को वोट के अधिकार से वंचित करने वाली कोई भी प्रक्रिया मनमानी है. संविधान नागरिकों को दो वर्गों में नहीं बांटता है.
बता दें कि SIR का मामला इस समय सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है. इसलिए पूर्व जजों और कानूनी विशेषज्ञों के बीच इस पर तीखा समर्थन और विरोध देखने को मिल रहा है.
जस्टिस गवई ने जस्टिस भुइयां के बयान पर जताई आपत्ति
आलोचना करने वाले जजों और न्यायविदों का मुख्य तर्क ये है कि विचाराधीन मामले पर सार्वजनिक बयान देना न्यायिक मर्यादा Judicial Propriety के खिलाफ है. भारत के 52वें मुख्य न्यायाधीश रह चुके जस्टिस बीआर गवई ने जस्टिस भुइयां के बयान पर कड़ी आपत्ति जताई. उन्होंने कहा कि न्यायिक मर्यादा किसी सिटिंग जज को ऐसे मामले पर सार्वजनिक टिप्पणी करने की अनुमति नहीं देती जो पहले से ही अदालत के सामने लंबित हो.
दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व जज जस्टिस एस. एन. ढींगरा ने कहा कि जस्टिस भुइयां का ये बयान एक शीर्ष अदालत के सिटिंग जज की सीमाओं से बहुत परे था. उन्हें एक सार्वजनिक मंच पर ऐसा बोलने से पहले हजार बार सोचना चाहिए था, खासकर तब जब उन्हें मामले के पूरे तथ्य भी नहीं पता थे.
दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व जज जस्टिस आर. एस. सोढ़ी ने बयान की परिपक्वता पर सवाल उठाते हुए कहा कि वोट देने का अधिकार पूरी तरह से वैधानिक ढांचे पर निर्भर करता है. पात्रता के दायरे में आने वाले को वोट का अधिकार मिलता है और जो नहीं आता, उसे नहीं मिलता. ऐसे में इसे 'दोयम दर्जे का नागरिक बनाना' या 'मताधिकार छीनना' कहना तर्कहीन और कट्टर सोच को दिखाता है.
42 पूर्व जजों का ओपन लेटर
सीनियर एडवोकेट हरीश साल्वे ने भी जस्टिस भुइयां के बयान का विरोध करते हुए कहा कि जजों को सिर्फ अपने फैसलों के जरिए ही बोलना चाहिए, समसामयिक या विचाराधीन घटनाओं पर सार्वजनिक रूप से नहीं. अब तक कुल 42 पूर्व जजों ने एक खुला पत्र जारी कर चुनाव आयोग की SIR प्रक्रिया और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का समर्थन किया है.
बयान की मुखालिफत के साथ ही इसका समर्थन करने वाले पूर्व जज भी आगे आए हैं. समर्थन करने वाले खेमे का मानना है कि नागरिकों के मताधिकार की रक्षा पर बात करना किसी भी तरह से न्यायिक मर्यादा का उल्लंघन नहीं है.
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस अभय एस. ओक खुलकर जस्टिस भुइयां के बचाव में आए हैं. उन्होंने साफ किया कि बड़े पैमाने पर वोटरों के मताधिकार छिनने के खिलाफ आवाज उठाने में कुछ भी गलत नहीं है.
जस्टिस ओका के मुताबिक, किसी लंबित मामले के गुण-दोष पर टिप्पणी करना गलत हो सकता है. लेकिन जस्टिस भुइयां के भाषण में ऐसा कुछ नहीं था, उन्होंने कोई न्यायिक अनुचित काम नहीं किया है.
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पूर्व कानून मंत्री और सीनियर एडवोकेट डॉ. अश्वनी कुमार ने जस्टिस भुइयां की टिप्पणी की तारी की. उन्होंने कहा कि उनका ये बयान बड़े पैमाने पर लोगों को मताधिकार से वंचित किए जाने के खिलाफ देश की अंतरात्मा को दिखाता है.
राज्यसभा सांसद और सीनियर एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी ने जस्टिस भुइयां को न्यायपालिका के सबसे सम्मानित और बेबाक व्यक्तियों में से एक बताते हुए उनके नजरिए का समर्थन किया है.
संजय शर्मा