नीट-यूजी विवाद के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद कॉकरोच जनता पार्टी के खेमे में जश्न है, लेकिन आंदोलन यहीं खत्म होता नहीं दिख रहा. सीजेपी के फाउंडर अभिजीत दीपके ने वीडियो जारी कर कहा कि 'यह पहला विकेट है. हम यहां रुकने वाले नहीं हैं. यह सिर्फ शुरुआत है. मैं उन सभी छात्रों और वॉलंटियर्स को सलाम करता हूं, जो पिछले 36 दिनों से यहां बैठे हैं.' वहीं, सीजेपी के प्रवक्ता आशुतोष रांका ने भी आगे की रणनीति की ओर इशारा करते हुए कहा, 'वादा है, बहुत जल्द फिर मुलाकात होगी.'
धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा सीजेपी की सबसे बड़ी मांगों में शामिल था. इसके पूरा होने के बाद अब आंदोलन एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां सवाल सिर्फ यह नहीं है कि सीजेपी युवाओं को अपने साथ जोड़ सकती है या नहीं. बड़ा सवाल यह है कि अब इन युवाओं को किस मुद्दे पर एकजुट किया जाएगा. क्या सीजेपी का आंदोलन परीक्षा व्यवस्था में सुधार तक सीमित रहेगा या फिर रोजगार, भर्तियों में देरी, युवाओं के लिए अवसर और संस्थानों की जवाबदेही जैसे मुद्दे भी इसके एजेंडे में आएंगे? आने वाले दिनों में आंदोलन की दिशा काफी हद तक इसी सवाल के जवाब से तय होगी.
सीजेपी की खास बात यह रही कि इसकी शुरुआत किसी पारंपरिक छात्र संगठन की तरह नहीं हुई. न इसकी जिला स्तर पर कमेटियां हैं, न कैंपस यूनिट और न ही पीछे कोई वैचारिक संगठन. इंस्टाग्राम रील्स, टेलीग्राम और व्हाट्सऐप ग्रुप के जरिए युवा इससे जुड़ते गए. वॉलंटियर्स ने ग्राफिक्स तैयार किए, अलग-अलग राज्यों में प्रदर्शनों के बीच तालमेल बनाया और ऑनलाइन फंड भी जुटाया.
कितना आगे की सफर तय होगा
हालांकि यही मॉडल अब सीजेपी के सामने चुनौती भी है. सवाल है कि सोशल मीडिया और डिसेंट्रलाइजेशन नेतृत्व के दम पर खड़ा हुआ आंदोलन क्या लंबे समय तक टिकने वाले ऐसे दबाव समूह में बदल पाएगा, जो सरकारी नीतियों पर भी असर डाल सके?. भारत में जेपी आंदोलन से लेकर अन्ना हजारे के आंदोलन तक कई जन आंदोलनों ने आगे चलकर अलग-अलग रास्ते पकड़े. अब सीजेपी भी उसी तरह के एक चौराहे पर खड़ी दिखाई दे रही है. जंतर-मंतर के टेंट भले ही एक दिन हट जाएं, लेकिन दीपके का दावा है कि आंदोलन खत्म नहीं होगा. ऐसे में धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा सीजेपी के आंदोलन का अंत नहीं, बल्कि युवाओं के रोजगार, भर्ती और भविष्य से जुड़े बड़े सवाल उठाने की शुरुआत भी बन सकता है.
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